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चावल उत्पादन के कारण जल संकट

Lokesh Pal January 02, 2026 04:15 56 0

संदर्भ

विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक होने के कारण भारत की कृषि सफलता उसी भूजल को तीव्र गति से समाप्त कर रही है, जिस पर उसकी जनसंख्या और भविष्य की फसलें निर्भर हैं।

भारत में चावल उत्पादन और निर्यात में वृद्धि

  • भारत ने वर्ष 2025 में चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बनने का गौरव प्राप्त किया।
  • पिछले एक दशक में चावल निर्यात लगभग दोगुना हो गया है और नवीनतम वित्तीय वर्ष में यह 20 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक हो गया।
  • वैश्विक चावल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है, जिससे वह विश्व खाद्य व्यापार में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
  • देश अपनी 1.4 अरब की जनसंख्या की आवश्यकता से अधिक चावल का उत्पादन करता है, जिससे निर्यात हेतु अधिशेष उपलब्ध होता है।

प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में भूजल का ह्रास

  • भारत के अग्रणी चावल उत्पादक राज्य पंजाब और हरियाणा मुख्यतः भूजल आधारित सिंचाई पर निर्भर हैं।
  • जल-स्तर: पिछले एक दशक में भूजल स्तर में भारी गिरावट आई है—लगभग 30 फीट से घटकर अब 80–200 फीट तक।
  • किसानों पर लागत: अधिक गहराई तक बोरवेल, पाइप लगाने के कारण लागत बढ़ी है, जिसके लिए किसानों को प्रायः अत्यधिक ऋण लेना पड़ता है।
  • बड़े क्षेत्रों में जलभृतअतिदोहित” या “गंभीर” श्रेणी में हैं; वर्ष 2024–2025 में पुनर्भरण की तुलना में निकासी 35–57 प्रतिशत अधिक रही।

भारत में भूजल ह्रास में चावल उत्पादन की भूमिका

  • चावल की उच्च जल-आवश्यकता: प्रति किलोग्राम चावल उत्पादन के लिए 3,000–5,000 लीटर जल की आवश्यकता होती है, जो अधिकांश फसलों की तुलना में कहीं अधिक है (जैसे- मोटे अनाजों में जल-आवश्यकता काफी कम होती है)।
  • यहअत्यधिक जल-आवश्यक’ फसल बड़े पैमाने पर भूजल निकासी को प्रेरित करती है, विशेषकर इसलिए, क्योंकि हरित क्रांति के दौरान गैर-पारंपरिक चावल क्षेत्रों में भी चावल–गेहूँ प्रणाली को बढ़ावा दिया गया।
  • वर्तमान ह्रास के आँकड़े (2024–2025)
    • पंजाब: भूजल निकासी पुनर्भरण का 156 प्रतिशत (भारत में सर्वाधिक)।
    • हरियाणा: भूजल निकासी पुनर्भरण का 137 प्रतिशत।

भूजल ह्रास में सरकारी नीतियों की भूमिका

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी सब्सिडियाँ (पिछले एक दशक में लगभग 70 प्रतिशत वृद्धि) तथा निःशुल्क/रियायती बिजली, कम जल-आवश्यक फसलों की तुलना में चावल को प्रोत्साहित करती हैं।
  • अकाल के दौर में अपनाई गई खाद्य सुरक्षा नीतियों की विरासत ने अब निर्यातोन्मुख अधिक उत्पादन को प्रोत्साहित किया है, जिसका प्रमाण यह है कि भारत वैश्विक चावल व्यापार में लगभग 40% हिस्सेदारी रखता है।

भारत में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के प्रयास

  • भारत जल-गहन चावल और गेहूँ पर निर्भरता कम करने, भूजल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य सुधार और किसानों की आय बढ़ाने हेतु फसल विविधीकरण को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रहा है।
  • फसल विविधीकरण कार्यक्रम: वर्ष 2013–14 से राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत एक उप-योजना, जिसका उद्देश्य पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान क्षेत्र को दालों, तिलहनों, मक्का, कपास और पोषक अनाजों की ओर स्थानांतरित करना है।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM): दालों, मोटे अनाजों और पोषक अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा देकर विविधीकरण को प्रोत्साहित करता है।
  • हरियाणा की ‘मेरा पानी, मेरी विरासत’ योजना: हरियाणा सरकार की प्रमुख योजना, जिसके अंतर्गत धान से मक्का, दालें, कपास, मोटे अनाज और सब्जियों जैसी फसलों की ओर स्थानांतरण करने वाले किसानों को ₹8,000 प्रति एकड़ (2025 के बजट में ₹7,000 से बढ़ाकर) की सहायता प्रदान की जाती है।
    • तथापि, यह प्रोत्साहन अल्पकालिक (एक मौसम तक सीमित) होने के कारण व्यापक स्तर पर अपनाए जाने में बाधा उत्पन्न करता है।

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