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जल सुरक्षा: एक सतत् भविष्य की कुंजी

Lokesh Pal March 27, 2026 02:00 36 0

संदर्भ

हाल ही में विश्व जल दिवस (22 मार्च 2026) के आयोजन ने जल सुरक्षा की बढ़ती चुनौती पर वैश्विक ध्यान पुनः केंद्रित किया, विशेष रूप से ‘वॉटर एंड जेंडर(Water and Gender) विषय के अंतर्गत, जो जल की उपलब्धता और इसके उपयोग के संबंध में असमानताओं को संदर्भित करता है।

संबंधित तथ्य

  • मीठे जल तंत्रों पर अस्थिर दबाव: यह उस समय सामने आया है जब वैश्विक स्तर पर यह चिंता बढ़ रही है कि मीठे जल तंत्र अस्थिर सीमाओं के निकट पहुँच रहे हैं, जिसका प्रमाण भूजल क्षरण, नदी प्रदूषण, अनियमित वर्षा, तथा जलवायु-प्रेरित जलवैज्ञानिक दबाव के रूप में देखा जा रहा है।
  • भारत में बढ़ते जल तनाव संबंधी परिदृश्य: वैश्विक जनसंख्या का बड़ा हिस्सा होने के बावजूद, भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता निरंतर कम हो रही है, जिससे यह जल-संकटग्रस्त देशों की श्रेणी में आ गया है।
    • इस प्रकार, जल के संबंध में विमर्श अब केवल विकासात्मक मुद्दे से आगे बढ़कर रणनीतिक, पारिस्थितिक और मानव सुरक्षा के प्रश्न के रूप में परिवर्तित हो रहा है।

विश्व जल दिवस के बारे में

  • आयोजन: इसका आयोजन प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को किया जाता है, जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 1992 (रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन) में घोषित किया गया था; इसका प्रथम आयोजन वर्ष 1993 में हुआ।
  • उद्देश्य: वैश्विक जल मुद्दों (जैसे जल की कमी, प्रदूषण, स्वच्छता, और सतत् प्रबंधन) पर जागरूकता को बढ़ाना तथा सुरक्षित जल की सार्वभौमिक पहुँच के लिए कार्यवाही को प्रोत्साहित करना।
  • थीम-आधारित दृष्टिकोण: प्रत्येक वर्ष एक विशिष्ट विषय निर्धारित किया जाता है (जैसे हिमनद, भूजल, अपशिष्ट जल), जो वैश्विक प्राथमिकताओं के अनुरूप होता है और ‘यूएन-वॉटर’ पहलों से जुड़ा होता है।
  • सतत् विकास लक्ष्यों से संबंध: यह सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) के अंतर्गत लक्ष्य 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता) से निकटता से जुड़ा है, जो समान और सतत् जल उपलब्धता पर केंद्रित है।
  • वैश्विक सहभागिता: इसे विश्वभर में अभियानों, नीतिगत संवादों, सामुदायिक कार्यक्रमों और शैक्षणिक आयोजनों के माध्यम से मनाया जाता है, जिसमें सरकारें, गैर-सरकारी संगठन और नागरिक समाज भाग लेते हैं।
  • भारत के संदर्भ में: यह भूजल क्षरण, जल तनाव, नदी प्रदूषण, और जलवायु प्रभावों जैसी गंभीर चुनौतियों को उजागर करता है, साथ ही जल जीवन मिशन और जल संरक्षण अभियानों जैसे प्रयासों को सुदृढ़ करता है।

जल सुरक्षा के बारे में

  • अवधारणा और परिभाषा: जल सुरक्षा से आशय किसी समाज की उस क्षमता से है जिसके माध्यम से वह पर्याप्त, विश्वसनीय, समान और सतत् रूप से स्वीकार्य गुणवत्ता वाले जल की उपलब्धता सुनिश्चित करे, साथ ही पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करते हुए सूखा, बाढ़ और प्रदूषण जैसे जोखिमों का प्रबंधन करे।
    • यह केवल जल की भौतिक उपलब्धता तक सीमित न होकर संसाधन प्रबंधन, सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय स्थिरता और आपदा सहनशीलता को समाहित करने वाला एक समग्र शासन ढाँचा है।
  • ‘जल की कमी’ से ‘जल असुरक्षा’ की ओर परिवर्तन: वर्तमान विमर्श केवल भौतिक रूप से उपलब्ध आभाव तक सीमित न रहकर जल असुरक्षा की व्यापक अवधारणा तक विकसित हो चुका है, जिसमें शामिल हैं:-
    • गुणवत्ता में गिरावट (प्रदूषण और संदूषण)
    • क्षेत्रों और समुदायों के बीच असमान पहुँच
    • मौसमी और जलवायु परिवर्तन के कारण आपूर्ति की अनिश्चितता
    • संस्थागत और शासन संबंधी विफलताएँ
      • इस प्रकार, जल-समृद्ध क्षेत्र भी मौसमी उपलब्धता की कमी और असुरक्षित जल का सामना कर सकते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि जल सुरक्षा मूलतः प्रबंधन की चुनौती है।

जल सुरक्षा के प्रमुख स्तंभ

  • उपलब्धता → जल संसाधनों की पर्याप्तता: जल सुरक्षा के लिए पर्याप्त सतही और भूजल संसाधनों की आवश्यकता होती है ताकि कृषि, उद्योग, घरेलू उपयोग और पारिस्थितिकी की प्रतिस्पर्द्धी माँगों को पूरा किया जा सके।
    • भारत में, प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता जनसंख्या वृद्धि और अत्यधिक दोहन के कारण तेजी से घटी है।
    • भूजल पर अत्यधिक निर्भरता (60% से अधिक सिंचाई) ने विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत में जलभृत क्षरण को बढ़ाया है।
    • जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक उपयोग और अस्थिर दोहन पैटर्न के कारण उपलब्धता पर दबाव बढ़ता है।
  • सुलभता → वितरण में समानता: सुलभता का अर्थ है जल का समान और समावेशी वितरण, जिससे समाज के सभी वर्ग—भौगोलिक या सामाजिक-आर्थिक स्थिति की चिंता किए बिना जल तक पहुँच सुनिश्चित  कर सकें।
    • जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं के तहत ग्रामीण नल जल कवरेज में विस्तार के बावजूद, क्षेत्रीय और सामाजिक असमानताएँ बनी हुई हैं।
    • महिलाएँ और वंचित समुदाय जल संग्रहण का असमान भार वहन करते हैं, जो लैंगिक असमानता को दर्शाता है।
      • जल असुरक्षा प्राय: पूर्ण कमी के बजाय असमान पहुँच का परिणाम होती है।
  • गुणवत्ता → सुरक्षा और पेयजल योग्यता: जल सुरक्षा के लिए जल का मानव उपभोग और पारिस्थितिक स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होना आवश्यक है, अर्थात यह संदूषकों से मुक्त हो।
    • भारत में रासायनिक संदूषण (आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट) और जैविक प्रदूषण व्यापक हैं।
    • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, केवल लगभग 29% शहरी अपशिष्ट जल का उपचार होता है, जिससे नदियों और भूजल का प्रदूषण बढ़ता है।
      • जल खराब गुणवत्ता संसाधन समस्या को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट में बदल देती है, जिससे रोगों का भार और आर्थिक लागत में वृद्धि होती है।
  • लचीलापन और स्थिरता → दीर्घकालिक सुरक्षा: यह स्तंभ जल प्रणालियों की आघात सहने की क्षमता और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
    • बाढ़, सूखा और चरम मौसम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति घटते लचीलेपन को दर्शाती है।
    • नीति आयोग का समेकित जल प्रबंधन सूचकांक दर्शाता है कि करोड़ों लोग उच्च जल तनाव की समस्या का सामना कर रहे हैं।
      • सतत् जल सुरक्षा के लिए पारिस्थितिकी संरक्षण, माँग प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल योजना आवश्यक है।

केस स्टडी– ‘जल सहेली’ आंदोलन

  • संदर्भ (बुंदेलखंड जल तनाव): उत्तर प्रदेश–मध्य प्रदेश का यह सूखा-प्रवण क्षेत्र, जहाँ तीव्र जल संकट के कारण महिलाओं को जल लाने में घंटों व्यतीत करने पड़ते थे, जिससे समय का अभाव, स्वास्थ्य जोखिम और लैंगिक असमानता उत्पन्न होती थी।
  • मुख्य समस्या: जल संग्रहण का असमान भार महिलाओं पर था, निर्णय-निर्माण में उनकी भूमिका सीमित थी, अवसंरचना कमजोर थी, तथा कृषि संकट और पलायन बढ़ रहा था।
  • हस्तक्षेप (जल सहेली पहल): महिलाओं के नेतृत्व में समूहों का गठन (लगभग 1500+ महिलाएँ, 300+ गाँव), जो सामुदायिक-आधारित जल शासन, जल बजट और स्थानीय योजना पर केंद्रित हैं।
  • मुख्य कार्य
    • पारंपरिक जल स्रोतों (तालाब, कुएँ, चेक डैम) का पुनर्जीवन
    • वर्षा जल संचयन एवं भूजल पुनर्भरण
    • हैंडपंपों की मरम्मत और रखरखाव
    • जल संरक्षण प्रथाओं पर जागरूकता
  • लैंगिक प्रभाव
    • जल लाने में श्रम और समय में कमी
    • महिलाओं के नेतृत्व और सहभागिता में वृद्धि
    • ‘जल वाहक’ से ‘जल प्रबंधक’ की भूमिका में परिवर्तन
  • जल एवं आजीविका परिणाम
    • स्थानीय जल उपलब्धता और स्थिरता में सुधार
    • स्वास्थ्य, स्वच्छता और आजीविका में सुधार
    • पलायन और स्थानीय संघर्षों में कमी
  • मुख्य अंतर्दृष्टि: यह दर्शाता है कि लैंगिक समावेशी, समुदाय-नेतृत्वित जल शासन अधिक प्रभावी, समान और सतत् जल प्रबंधन की ओर ले जाता है, जो SDG 5 एवं SDG 6 तथा अटल भूजल योजना जैसे कार्यक्रमों के अनुरूप है।

भारत में जल असुरक्षा के प्रेरक

  • प्रति व्यक्ति घटती उपलब्धता और माँग में वृद्धि: भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर लगभग 1486 घन मीटर (2021, केंद्रीय जल आयोग) रह गई है और आगे और घटने का अनुमान है, जिससे यह जल-अभाव की सीमा के निकट पहुँच रही है।
    • यह गिरावट जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण और औद्योगिक माँग के विस्तार के संयुक्त प्रभाव को दर्शाती है।
  • अत्यधिक दोहन और क्षेत्रीय भूजल असंतुलन: भारत वैश्विक स्तर पर भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है (लगभग 245.64 अरब घन मीटर, केंद्रीय भूजल बोर्ड 2024), जिसमें दोहन मुख्यतः पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे उत्तर-पश्चिमी राज्यों में केंद्रित है।
    • प्रशासनिक इकाइयों का एक बड़ा हिस्सा ‘अतिदोहन ब्लॉक’ के रूप में वर्गीकृत है, जहाँ निकासी पुनर्भरण से अधिक है।
      • उदाहरण के लिए, गुरुग्राम में निकासी स्तर लगभग 195% है, जो अस्थिर उपयोग को दर्शाता है।
    • यह प्रवृत्ति फसल पैटर्न और सब्सिडी युक्त विद्युत की उपलब्धता से संबंधित है, जो अत्यधिक पंपिंग को प्रोत्साहित करती है, जिससे जलभृत क्षरण और दीर्घकालिक जल असुरक्षा बढ़ती है।
  • अप्रभावी कृषि पद्धतियाँ और नीतिगत विकृतियाँ: कृषि क्षेत्र लगभग 80–87% भूजल का उपभोग करता है, जिसमें धान और गन्ने जैसी जल-गहन फसलें जल-अभाव वाले क्षेत्रों में भी उगाई जाती हैं।
    • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सिंचाई हेतु मुफ्त बिजली जैसी नीतियाँ प्रोत्साहनों को विकृत करती हैं, जिससे जल के निरंतर अनिश्चितपूर्ण उपयोग में वृद्धि होती है।
  • जल गुणवत्ता में गिरावट और प्रदूषण: भारत के जल स्रोतों का बड़ा हिस्सा अशोधित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि अपवाह के कारण प्रदूषित है।
    • पंजाब के भूजल में यूरेनियम की उपस्थिति जैसे उदाहरण गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम को दर्शाते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि जल की गुणवत्ता भी उसकी मात्रा जितनी ही महत्त्वपूर्ण है।
  • जलवायु परिवर्तन और कमजोर पुनर्भरण प्रणाली: अंतरसरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) के अनुसार जलवायु परिवर्तन वर्षा में अनिश्चितता, सूखे की आवृत्ति और चरम घटनाओं को बढ़ा रहा है, जबकि आर्द्रभूमि और पुनर्भरण क्षेत्रों की हानि प्राकृतिक पुनर्भरण को कम कर रही है।
  • संस्थागत विखंडन और व्यवहारगत अंतर: जल शासन में संस्थागत जिम्मेदारियों का विखंडन, कमजोर प्रवर्तन और सीमित जन-जागरूकता नीति की प्रभावशीलता को कम करते हैं।

जल सुरक्षा के प्रति चिंताएँ क्यों बढ़ रही हैं?

  • जल की कमी से बहुआयामी जल असुरक्षा की ओर परिवर्तन: वैश्विक स्तर पर जल विमर्श भौतिक कमी से आगे बढ़कर गुणवत्ता, सुलभता, वहनीयता और विश्वसनीयता जैसे आयामों को शामिल करने लगा है।
    • पर्याप्त संसाधनों वाले क्षेत्र भी मौसमी कमी, प्रदूषण और असमान वितरण का सामना कर रहे हैं, जो शासन और अवसंरचना की विफलताओं को दर्शाता है।
    • यह समग्र जल सुरक्षा की ओर परिवर्तन को दर्शाता है, जहाँ समान और सतत् पहुँच तक उपलब्धता जितनी ही महत्त्वपूर्ण है।
  • भारत में संरचनात्मक और माँग-पक्षीय दबाव: भारत में जल तनाव गहरे संरचनात्मक कारणों से उत्पन्न है, जैसे भूजल पर अत्यधिक निर्भरता, अप्रभावी कृषि पद्धतियाँ (बाढ़ सिंचाई, जल-गहन फसलें), तथा नगरीकरण और औद्योगिकीकरण से बढ़ती माँग।
    • प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में गिरावट और अंतर-राज्यीय नदी विवाद (जैसे- कावेरी, यमुना) स्थिति को और जटिल बनाते हैं।
    • यह संकट पूर्ण कमी से अधिक अस्थिर उपयोग, नीतिगत विकृतियों और संस्थागत विखंडन का परिणाम है।
  • नगरीय जल संकट और बढ़ती असमानता: शहरों में “डे-जीरो” जैसे संकट, निजी टैंकरों और भूजल पर निर्भरता, तथा पुराने और अक्षम वितरण नेटवर्क (उच्च रिसाव ह्रास) देखे जा रहे हैं।
    • अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोग जल पहुँच में अधिक बाधाओं का सामना करते हैं, जिससे सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ बढ़ती हैं।
    • यह एकीकृत शहरी योजना और समावेशी अवसंरचना की कमी को दर्शाता है।
  • जलवायु परिवर्तन एक जलवैज्ञानिक व्यवधान के रूप में: जलवायु परिवर्तन वर्षा की अनिश्चितता, बारंबार बाढ़ और लंबे सूखे, तथा हिमालयी हिमनदों के पिघलने के माध्यम से जल चक्र को प्रभावित कर रहा है।
    • इससे गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों की दीर्घकालिक स्थिरता पर संकट उत्पन्न होता है।
    • अतः जल सुरक्षा अब जलवायु सहनशीलता, अनुकूलनशील शासन और आपदा प्रबंधन से जुड़ी हुई है।
  • जल पहुँच में सामाजिक और लैंगिक असमानताएँ: विशेषकर ग्रामीण और अर्द्ध-नगरीय क्षेत्रों में महिलाएँ जल संग्रहण और प्रबंधन का मुख्य भार वहन करती हैं।
    • इससे समय की कमी, स्वास्थ्य जोखिम, शिक्षा में बाधा और गरिमा से जुड़े मुद्दे (जैसे मासिक धर्म स्वच्छता) उत्पन्न होते हैं।
    • इस प्रकार, जल केवल संसाधन नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और मानव अधिकार का प्रश्न है।
  • पारिस्थितिक क्षरण और शासन की कमी: अशोधित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि अपवाह के कारण जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं, जबकि आर्द्रभूमियों की हानि से प्राकृतिक जल भंडारण और शुद्धिकरण क्षमता कम हो रही है।
    • यह संकट संस्थागत विखंडन, जलभृत-आधारित प्रबंधन की कमी, कमजोर माँग-पक्षीय नियमन, और बांध व नदी जोड़ परियोजनाओं जैसे आपूर्ति-पक्षीय उपायों पर अत्यधिक निर्भरता से और बढ़ता है।
    • अंततः, यह बढ़ता संकट एक शासन संबंधी कमी को दर्शाता है, जहाँ पारिस्थितिक स्थिरता और कुशल प्रबंधन बढ़ती माँग के अनुरूप विकसित नहीं हो पाए हैं।

जल सुरक्षा का महत्त्व 

  • आर्थिक स्थिरता और विकास: जल सुरक्षा आर्थिक स्थिरता के लिए मूलभूत है, क्योंकि यह सीधे कृषि उत्पादकता, खाद्य आपूर्ति और मुद्रास्फीति की गतिशीलता को प्रभावित करती है।
    • कृषि, जिसमे जल संसाधनों का बड़ा हिस्सा उपयोग होता है, जल उपलब्धता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जिससे किसान आय, ग्रामीण माँग और समग्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि प्रभावित होती है।
    • जल संकट आपूर्ति संबंधी संकट उत्पन्न कर सकता है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति और व्यापक आर्थिक अस्थिरता बढ़ती है।
  • मानव विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य: सुरक्षित और पर्याप्त जल तक पहुँच मानव विकास, विशेषकर स्वास्थ्य, पोषण और उत्पादकता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • असुरक्षित जल से डायरिया, हैजा और टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियाँ फैलती हैं, जो कुपोषण, अवरुद्ध वृद्धि (स्टंटिंग) और बच्चों में संज्ञानात्मक क्षति का कारण बनती हैं।
    • इसके अतिरिक्त, रासायनिक प्रदूषकों और भारी धातुओं के संपर्क से दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं।
      • इस प्रकार, जल सुरक्षा सीधे मानव पूँजी निर्माण और कार्यबल की दक्षता को प्रभावित करती है।
  • सामाजिक न्याय और समानता: जल तक पहुँच सामाजिक असमानताओं से गंभीरता से जुड़ी है, जो प्रायः लिंग, जाति और वर्ग के आधार पर भिन्न होती है।
    • महिलाएँ जल संग्रहण का असमान भार वहन करती हैं, जिससे समय की कमी, स्वास्थ्य जोखिम और शिक्षा के सीमित अवसर उत्पन्न होते हैं।
    • वंचित समुदायों को प्रायः अपर्याप्त और अस्थिर जल उपलब्धता का सामना करना पड़ता है, जिससे संरचनात्मक असमानताएँ और गंभीर होती हैं।
      • अतः जल सुरक्षा समावेशी विकास और सामाजिक न्याय का एक महत्त्वपूर्ण घटक है।
  • आजीविका, प्रवासन और सामाजिक स्थिरता: जल उपलब्धता विशेषकर कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं में आजीविका सुरक्षा निर्धारित करती है।
    • जल संकट से फसल विफलता, कृषि संकट और किसानों की ऋणग्रस्तता बढ़ती है, जिसके परिणामस्वरूप शहरी क्षेत्रों की ओर मजबूरन प्रवासन होता है।
    • यह जल संसाधनों तक पहुँच को लेकर स्थानीय संघर्ष भी उत्पन्न कर सकता है।
      • अतः जल असुरक्षा आर्थिक अस्थिरता, प्रवासन दबाव और सामाजिक तनाव को बढ़ाती है।
  • जलवायु सहनशीलता और आपदा प्रबंधन: जल सुरक्षा सूखा, बाढ़ और अनियमित वर्षा जैसी चरम घटनाओं से निपटने की क्षमता को बढ़ाती है।
    • जलवायु परिवर्तन के कारण जल चक्र के तीव्र होने के साथ, प्रभावी जल प्रबंधन अनुकूलन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए आवश्यक हो जाता है।
      • इस प्रकार, यह जलवायु-सहनशील और आपदा-सहनशील प्रणालियों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण है।
  • राष्ट्रीय और भू-राजनीतिक सुरक्षा: जल एक रणनीतिक संसाधन के रूप में उभर रहा है, जो अंतर-राज्यीय विवादों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करता है।
    • नदी जल बंटवारे को लेकर संघर्ष इसके महत्त्व को दर्शाते हैं, जबकि सिंधु जल संधि जैसे समझौते क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में जल की भूमिका को रेखांकित करते हैं।
    • अतः जल सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक संतुलन का एक महत्त्वपूर्ण आधार है।

जल सुरक्षा हेतु भारत की पहल एवं कार्रवाइयाँ

  • सार्वभौमिक पेयजल उपलब्धता: जल जीवन मिशन का उद्देश्य सभी ग्रामीण परिवारों को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (FHTCs) प्रदान करना है, जिससे सुरक्षित और विश्वसनीय पेयजल सुनिश्चित हो, महिलाओं पर भार कम हो तथा स्वास्थ्य परिणामों की स्थिति में सुधार हो।
  • सतत् भूजल प्रबंधन: अटल भूजल योजना सामुदायिक-आधारित भूजल प्रबंधन पर केंद्रित है, जो जलभृत-आधारित योजना, जल बजटिंग और जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देती है।
  • सिंचाई दक्षता और कृषि सुधार: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ को बढ़ावा देती है, जिसके अंतर्गत सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों (ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली) को अपनाकर कृषि में जल उपयोग दक्षता बढ़ाई जाती है।
  • शहरी जल अवसंरचना विकास: अमृत मिशन का उद्देश्य शहरी जल आपूर्ति, सीवरेज नेटवर्क और अपशिष्ट जल प्रबंधन की स्थिति में सुधार करना है, जिससे बढ़ती शहरी जल माँग और अवसंरचनात्मक अंतराल को समाप्त किया जा सके।
  • नीतिगत ढाँचा और एकीकृत जल प्रबंधन: राष्ट्रीय जल नीति और राष्ट्रीय जल मिशन, ‘एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन’ (IWRM), संरक्षण तथा विभिन्न क्षेत्रों में जल उपयोग दक्षता बढ़ाने पर बल देते हैं।
  • उभरते उपाय: पुनः उपयोग, विनियमन और प्रौद्योगिकी: भारत अपशिष्ट जल पुनः उपयोग नीतियों, भूजल विनियमन ढाँचों और डिजिटल निगरानी प्रणालियों (IoT, GIS) को अपनाकर जल शासन में दक्षता, पारदर्शिता और स्थिरता को बढ़ा रहा है।

जल तक पहुँच हेतु संवैधानिक प्रावधान

  • जल की उपलब्धता: जल की उपलब्धता का तात्पर्य है कि पीने, भोजन पकाने और बुनियादी घरेलू आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त, सुरक्षित और सुलभ जल उचित दूरी और समय के भीतर उपलब्ध हो।
  • जल एक मौलिक अधिकार के रूप में: भारत में जल तक पहुँच, अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) से व्युत्पन्न एक मौलिक अधिकार है।
    • उच्चतम न्यायालय ने बार-बार माना है कि “स्वच्छ जल मानव अधिकारों का एक मूलभूत तत्व है।”
      • इसका अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को घरेलू उपयोग हेतु पर्याप्त, सुरक्षित और सस्ती जल उपलब्धता होनी चाहिए।
  • राज्य सूची (सूची-II, प्रविष्टि 17): जल मुख्यतः राज्य का विषय है, जिसमें जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरें, जल निकासी, जल भंडारण और जल-विद्युत शामिल हैं।
  • संघ सूची (सूची-I, प्रविष्टि 56): संसद अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विनियमन एवं विकास का अधिकार रखती है, यदि यह जनहित में हो।
  • अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जल का अधिकार: जीवन के अधिकार की व्याख्या में उच्चतम न्यायालय ने स्वच्छ एवं सुरक्षित पेयजल के अधिकार को शामिल किया है (उदाहरण: सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991)।
  • स्थानीय शासन का सशक्तिकरण: अनुच्छेद 243G एवं 243W के अंतर्गत पंचायतों और नगरपालिकाओं को 11वीं और 12वीं अनुसूचियों के तहत जल आपूर्ति, सिंचाई और स्वच्छता के प्रबंधन का अधिकार प्रदान किया गया है।

भारत की जल नीतियों का विकास

  • राष्ट्रीय जल नीति, 1987: पहली राष्ट्रीय जल नीति ने समग्र जल संसाधन विकास रणनीति के महत्त्व को रेखांकित किया।
    • इसमें पेयजल आपूर्ति, सिंचाई, जल-विद्युत उत्पादन, नौवहन और औद्योगिक उपयोग को प्राथमिकता दी गई।
  • राष्ट्रीय जल नीति, 2002: इस संशोधन में जल योजना के लिए राष्ट्रीय दृष्टिकोण पर बल दिया गया और जल को साझा संसाधन के रूप में मान्यता दी गई।
    • इस नीति ने जल प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया और एक अधिक एकीकृत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
  • राष्ट्रीय जल नीति, 2012: वर्ष 2012 की नीति ने जल को एक आर्थिक वस्तु के रूप में मानते हुए संरक्षण और दक्ष उपयोग को बढ़ावा दिया।
    • इसमें एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन, वर्षा जल संचयन और वर्षा के प्रत्यक्ष उपयोग द्वारा जल उपलब्धता बढ़ाने पर बल दिया गया।
    • साथ ही, जल मूल्य निर्धारण को उसकी कमी और आर्थिक मूल्य के अनुरूप बनाने पर बल दिया गया।
  • मसौदा राष्ट्रीय जल नीति, 2021: इस मसौदा संशोधन का उद्देश्य जल क्षेत्र की वर्तमान चुनौतियों का समाधान करना था।
    • जल संसाधन प्रबंधन की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप नीति को अद्यतन करने हेतु एक प्रारूपण समिति का गठन किया गया।

भारत में जल सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ

  • भूजल ह्रास और अस्थिर दोहन: भारत गंभीर भूजल संकट का सामना कर रहा है और विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है, जहाँ भूजल लगभग 62% सिंचाई और 85% ग्रामीण पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करता है। अत्यधिक दोहन के कारण जल के स्तर में चिंताजनक रूप से  गिरावट देखी जा रही है:-
    • लगभग दो-तिहाई जिले भूजल तनाव से प्रभावित हैं।
    • लगभग 256 जिले गंभीर या अति-शोषित श्रेणी में हैं।
    • राजस्थान में 70% से अधिक भूजल इकाइयाँ अति-शोषित हैं (2024–25 रिपोर्ट)।
      • यह दर्शाता है कि उपयोग पुनर्भरणीय स्रोत से हटकर जलभृतों के खनन की ओर बढ़ गया है, जो दीर्घकालिक जल उपलब्धता के लिए खतरा है।
  • जल गुणवत्ता संकट और जनस्वास्थ्य जोखिम: जल सुरक्षा के साथ जल गुणवत्ता के खराब होने से गंभीर प्रभाव उत्पन्न हो रहा है:
    • भारी धातुओं, सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट से बढ़ता प्रदूषण।
    • पंजाब में 53% से अधिक भूजल नमूनों में यूरेनियम की सुरक्षित सीमा से अधिक मात्रा पाई गई (2024)।
    • इंदौर (2025) की जल प्रदूषण घटना में सीवेज रिसाव के कारण मृत्यु और व्यापक बीमारी हुई।
    • यह दर्शाता है कि जल असुरक्षा केवल कमी नहीं बल्कि गुणवत्ता संकट भी है, जो सीधे जनस्वास्थ्य और मानव पूँजी को प्रभावित करता है।
  • माँग–आपूर्ति असंतुलन और भविष्य का जल अंतर: भारत एक संरचनात्मक रूप से जल की कमी की ओर बढ़ रहा है:-
    • वर्ष 2030 तक जल माँग आपूर्ति से अधिक होने की संभावना।
    • कुल जल माँग में तीव्र वृद्धि, जिससे उपलब्धता और आवश्यकता के बीच बड़ा अंतर
    • प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता वर्ष 2031 तक लगभग 1367 घन मीटर तक होने का अनुमान है।
      • यह जनसंख्या वृद्धि और शहरीकरण के कारण बढ़ती माँग और सीमित आपूर्ति के बीच असंतुलन को दर्शाता है।
  • कृषि विकृतियाँ और जल का अक्षम उपयोग: कृषि में लगभग 85% मीठे जल का उपयोग होता है, परंतु प्रायः अप्रभावी तरीके से:-
    • जल-गहन फसलें (चावल, गन्ना) जल-संकट क्षेत्रों में भी प्रमुख।
    • सब्सिडीयुक्त विद्युत के कारण बोरवेल के माध्यम से अत्यधिक दोहन
    • पंजाब–हरियाणा में धान की खेती के कारण भूजल स्तर में तीव्र गिरावट।
    • यह संसाधन क्षरण का दुष्चक्र उत्पन्न करता है, जो कृषि नीतिगत विकृतियों से जुड़ा है।
  • शहरी जल संकट और शासन विफलताएँ: तीव्र शहरीकरण ने जल संकट को बढ़ा दिया है:
    • शहरों की निर्भरता भूजल, टैंकर आपूर्ति और दूरस्थ स्रोतों पर, जिससे असमानता बढ़ती है।
    • दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में भूजल दोहन 137% से अधिक पहुँच गया है
    • नॉन-रेवेन्यू वाटर (30–50%) उच्च स्तर पर, जो लीकेज और अक्षमता को दर्शाता है।
    • अवसंरचना की कमी और समन्वय विफलताएँ (जैसे- गाजियाबाद में पुनर्भरण में देरी) शासन की कमजोरियों को दर्शाती हैं।
      • यह संकट योजना, अवसंरचना और संस्थागत समन्वय की विफलता को प्रतिबिंबित करता है।
  • जलवायु परिवर्तन और जलवैज्ञानिक अनिश्चितता: जलवायु परिवर्तन जल संकट को और गहरा कर रहा है:-
    • अनियमित मानसून और वर्षा की अस्थिरता पुनर्भरण को प्रभावित करती है।
    • अच्छी वर्षा के बावजूद 2024 में भूजल पुनर्भरण में गिरावट
    • भविष्य में वर्ष 2080 तक भूजल ह्रास तीन गुना होने का अनुमान।
      • जल सुरक्षा अब जलवायु-प्रेरित अनिश्चितताओं और चरम घटनाओं से अत्यधिक प्रभावित है।
  • शासन की कमियाँ और विखंडित संस्थागत ढाँचा: भारत में जल शासन अभी भी विखंडित और आपूर्ति-केंद्रित है:-
    • अनेक एजेंसियाँ जिनके कार्यक्षेत्र एक-दूसरे से ओवरलैप करते हैं।
    • नदी बेसिन स्तर की योजना और जलभृत-आधारित प्रबंधन का अभाव।
    • नियमों का कमजोर प्रवर्तन और डेटा एकीकरण की कमी
      • यह संकट केवल संसाधन की कमी नहीं, बल्कि शासन विफलता को दर्शाता है।

आगे की राह

  • एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (IWRM) की ओर परिवर्तन: नदी बेसिन और जलभृत-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाए, जिससे शासन को जलवैज्ञानिक सीमाओं के अनुरूप संरेखित किया जा सके। सहकारी संघवाद और अंतर-राज्यीय समन्वय तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
  • माँग-पक्ष प्रबंधन और कृषि सुधार: फसल विविधीकरण (धान के स्थान पर मोटे अनाज, दलहन) को बढ़ावा दिया जाए।
    • सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप, स्प्रिंकलर प्रणाली) का विस्तार किया जाए।
    • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सब्सिडी संरचनाओं में सुधार कर जल-गहन फसल उत्पादन को हतोत्साहित किया जाए।
      • यह भूजल पर दबाव को कम करेगा और जल उपयोग दक्षता में सुधार करेगा।
  • जल गुणवत्ता प्रबंधन को सुदृढ़ करना: सीवेज उपचार अवसंरचना का विस्तार किया जाए और प्रदूषण मानकों का सख्ती से प्रवर्तन किया जाए।
    • उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग (औद्योगिक, कृषि उपयोग) को बढ़ावा दिया जाए।
    • जल गुणवत्ता निगरानी प्रणालियों को सुदृढ़ किया जाए।
      • यह सुरक्षित और विश्वसनीय जल आपूर्ति सुनिश्चित करता है, तथा स्वास्थ्य जोखिमों को कम करता है।
  • शहरी जल शासन सुधार:नॉन-रेवेन्यू’ जल हानियों को अवसंरचना उन्नयन के माध्यम से कम किया जाए।
    • वर्षा जल संचयन और स्थानीय भंडारण प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाए।
    • शहरी नियोजन को जल संसाधन प्रबंधन के साथ एकीकृत किया जाए।
      • शहरों को आपूर्ति विस्तार मॉडल से माँग प्रबंधन मॉडल की ओर संक्रमण करना होगा।
  • जलवायु-सहिष्णु जल प्रणालियाँ: जल प्रबंधन को जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के साथ एकीकृत किया जाए।
    • बाढ़ नियंत्रण, सूखा शमन, और लचीले अवसंरचना में निवेश किया जाए।
    • भूजल पुनर्भरण और जलागम प्रबंधन को सुदृढ़ किया जाए।
      • यह जलवायु परिवर्तन और चरम घटनाओं के विरुद्ध लचीलापन निर्मित करता है।
  • आर्थिक और संस्थागत सुधार: तर्कसंगत जल मूल्य निर्धारण लागू किया जाए ताकि संरक्षण को प्रोत्साहित किया जा सके।
    • विकृत सब्सिडियों (विद्युत, सिंचाई) को कम किया जाए।
    • विनियामक ढाँचे और जवाबदेही तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
      • यह संसाधनों के कुशल और सतत् आवंटन की दिशा में अग्रसर करता है।
  • प्रौद्योगिकी और डेटा-आधारित शासन: IoT आधारित स्मार्ट मीटरिंग और निगरानी प्रणालियाँ लागू की जाएँ।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और GIS उपकरणों का उपयोग कर पूर्वानुमान आधारित जल प्रबंधन किया जाए।
    • डेटा पारदर्शिता और सहभागी शासन को बढ़ावा दिया जाए।
      • यह दक्षता, जवाबदेही, और तत्काल निर्णय-निर्माण को सुदृढ़ करता है।
  • सामुदायिक भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान: स्थानीय जल बजटिंग और सहभागी प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए।
    • पारंपरिक प्रणालियों (जैसे- बावड़ी, तालाब, जैसा कि तेलंगाना में पुनर्स्थापन प्रयासों में देखा गया है) का पुनर्जीवन किया जाए।
      • यह सतत् और स्थानीय रूप से अनुकूल समाधान सुनिश्चित करता है।

निष्कर्ष

विश्व जल दिवस 2026 का मुख्य बिंदु इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि जल सुरक्षा सतत् विकास, जनस्वास्थ्य, और सामाजिक समानता के लिए केंद्रीय है। उभरती हुई चिंता केवल जल उपलब्धता में गिरावट में नहीं, बल्कि जल को एक साझा, सीमित, और रणनीतिक संसाधन के रूप में प्रबंधित करने में विफलता में निहित है, जिसके लिए एकीकृत और समावेशी शासन दृष्टिकोणों की आवश्यकता है।

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