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27वां संशोधन: पाकिस्तान का लोकतांत्रिक संकट

Lokesh Pal January 31, 2026 05:15 10 0

संदर्भ:

पाकिस्तान का 27वां संवैधानिक संशोधन (PCA) उसके संवैधानिक ढाँचे में एक निर्णायक परिवर्तन को दर्शाता है, जो कथित रूप से सैन्य कमान को पुनर्गठित करता है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति को मौलिक रूप से कमजोर करता है।

  • फेडरल संवैधानिक न्यायालय (FCC) की स्थापना के माध्यम से कार्यपालिका ने न्यायिक प्राधिकरण को प्रभावी रूप से विभाजित कर दिया है, जिससे कानून के शासन (Rule of Law) और न्यायिक स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों को चुनौती मिली है।

पाकिस्तान के 27वें संशोधन (PCA) के बारे में – न्यायपालिका का संरचनात्मक क्षरण:

  • संस्थागत हाशिए पर धकेलना: PCA एक नई फेडरल संवैधानिक न्यायालय (FCC) का निर्माण करता है, जो सर्वोच्च न्यायालय से उसके संवैधानिक व्याख्या, मौलिक अधिकार और संघ-राज्य विवादों पर मूल अधिकार का अधिग्रहण कर लेता है।
  • न्यायिक निर्णय का विखंडन: “महत्वपूर्ण राजनीतिक मामलों” (जैसे, पनामा पेपर्स) पर शीर्ष न्यायालय के अधिकार को समाप्त कर, यह संशोधन एक पारलल न्यायिक मार्ग का निर्माण करता है जो कार्यपालिका के प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील है।
  • प्रगति पलटना: यह 18वें संशोधन द्वारा प्राप्त न्यायिक संरक्षण (Judicial Insulation) को निरस्त करता है, जिसने पहले न्यायिक नियुक्तियों से राजनीति को अलग किया था।

सैद्धांतिक आधार: कानून का शासन बनाम कार्यपालिका का संकल्प

  • डाइसी का सिद्धांत: PCA ए.वी. डाइसी के कानून के शासन (Rule of Law) के सिद्धांत को अस्थिर करता है, जिसमें स्वतंत्र न्यायालयों को “अधिकारों का प्रहरी” और राज्य शक्ति तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच का सेतु माना गया है।
  • ऐतिहासिक समानता (कोक बनाम जेम्स I): यह परिवर्तन 17वीं सदी के संघर्ष को दर्शाता है, जहाँ मुख्य न्यायाधीश एडवर्ड कोक ने यह सिद्ध किया था कि सार्वभौमिक सत्ता “कानून के अधीन” है—एक सिद्धांत जो अब FCC की संरचना में कार्यपालिका की भूमिका से खतरे में है।
  • संवैधानिक “खोखलापन”: यह 21वीं सदी की प्रवृत्ति को दर्शाता है, जहाँ कानूनी ढाँचे केवल अधिकार बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि शक्ति के केंद्रीकरण को वैध ठहराने के लिए पुनः निर्मित किए जाते हैं।

क्षेत्रीय महत्व और भारत के लिए सबक

  • लोकतांत्रिक पतन: PCA को वैश्विक दक्षिण में संवैधानिक भावना के “निस्तब्ध विघटन (Quiet Dismantling)” का हिस्सा माना जाता है, जहाँ लोकतंत्र का क्षरण संपूर्ण रूप से वैध कानूनी परिवर्तनों के माध्यम से होता है, न कि अचानक तख्तापलट के जरिए।
  • भारत की रणनीतिक रुचि: एक पड़ोसी संवैधानिक लोकतंत्र होने के नाते, भारत दक्षिण एशिया में न्यायिक स्वतंत्रता के कमजोर होने को संस्थागत सीमाओं और कार्यकारी प्रभुत्व के बारे में एक चेतावनी के रूप में देखता है।

निष्कर्ष:

PCA यह गंभीर चेतावनी देता है कि संवैधानिक अस्तित्व केवल कानून के पाठ पर नहीं, बल्कि संस्थागत संयम पर निर्भर करता है। भारत और संपूर्ण क्षेत्र के लिए, पाकिस्तान में न्यायपालिका का हाशिए पर धकेलना “कानूनी तानाशाही” के खतरे को उजागर करता है, जहाँ संविधान की आत्मा को भीतर से तोड़कर कार्यपालिका प्रभुत्व को सुगम बनाया जाता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: संवैधानिक संशोधन संस्थाओं के बीच शक्ति के संतुलन को बदल सकते हैं। पाकिस्तान संसद में पारित 27वें संशोधन के संदर्भ में इसका विश्लेषण कीजिए और न्यायिक स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए भारत जो सबक ले सकता है, उस पर चर्चा कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

 

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