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द्विध्रुवीय विशेषताओं वाला बहुध्रुवीय विश्व

Lokesh Pal December 31, 2025 05:00 22 0

संदर्भ:

अमेरिका वेनेज़ुएला के पास सैन्य लामबंदी को तेज़ कर रहा है, जिसका उद्देश्य वेनेज़ुएला पर दबाव बढ़ाकर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाने के लिए मजबूर करना है। ये घटनाक्रम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिकी विदेश नीति में व्यापक बदलावों और वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे परिवर्तनों को दर्शाते हैं।

कारण: अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और मुनरो सिद्धांत का पुनरुद्धार

  • रणनीतिक प्राथमिकता: दिसंबर 2025 की शुरुआत में जारी ट्रंप प्रशासन की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS), लैटिन अमेरिका और कैरेबियन को रणनीतिक प्राथमिकता के रूप में दर्शाती है और मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) को पुनर्जीवित करती है।
  • मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine): 1823 में स्पष्ट की गई एक अमेरिकी विदेश नीति, जिसमें कहा गया था कि पश्चिमी गोलार्द्ध (Western Hemisphere) में अब यूरोपीय उपनिवेशीकरण या हस्तक्षेप की अनुमति नहीं होगी, और ऐसे किसी भी हस्तक्षेप को संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण कृत्य (Hostile act) माना जाएगा।
    • इसने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका, बदले में, यूरोपीय सत्ता की राजनीति से दूर रहेगा, जिससे अमेरिका में उसके प्रभाव क्षेत्र को मजबूती मिलेगी।
    • NSS का दावा है कि अमेरिका को लैटिन अमेरिका में बाह्य शक्तियों, विशेष रूप से चीन, के प्रभाव या नियंत्रण को रोकना चाहिए।

यूरोप से दूर अमेरिका का रणनीतिक बदलाव:

  • यूरोपीय सुरक्षा में घटती रुचि: लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रधानता को मजबूत करने का यह प्रयास यूरोप में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घटती रुचि के साथ मेल खाता है।
    • द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से, अमेरिका ने यूरोप के प्राथमिक सुरक्षा गारंटर के रूप में कार्य किया है।
  • यूरोप में अमेरिका की ऐतिहासिक भूमिका: शीत युद्ध के दौरान, अमेरिका ने मज़बूती तथा एक संगठित गठबंधन के माध्यम से पश्चिमी यूरोप में एकजुटता बनाए रखा।
    • सोवियत संघ के विघटन के बाद, अमेरिका ने पूर्वी यूरोप तक अपने सुरक्षा छत्र का विस्तार किया, तथा ट्रांसअटलांटिक गुट (Transatlantic Bloc) का निर्माण किया।
  • ट्रंप प्रशासन का रुख: ट्रंप के नेतृत्व में, अमेरिका अब यूरोपीय सुरक्षा का बोझ उठाने में रुचि नहीं रखता है।
    • यह स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है।
  • रणनीतिक बदलाव: ऐसे समय में जब रूस और चीन अमेरिका निर्मित और अमेरिका के नेतृत्व वाली सुरक्षा और आर्थिक व्यवस्था को पलटने की कोशिश कर रहे हैं, अमेरिका यूरोप से पीछे हट रहा है जबकि पश्चिमी गोलार्द्ध में अपने प्रभाव को मजबूत कर रहा है।

ट्रंप की विदेश नीति के दृष्टिकोण की प्रकृति:

  • एक सुसंगत सिद्धांत का अभाव: उनका दृष्टिकोण आवेगों, अप्रत्याशितता और ईसाई राष्ट्रवाद तथा अमेरिकी शक्ति में विश्वास पर आधारित वैचारिक अभिविन्यास द्वारा चिह्नित है।
  • बल का प्रयोग: ट्रंप ‘शांति के राष्ट्रपति’ नहीं हैं जैसा कि वे दावा करते हैं। उन्होंने पहले ही छह देशों पर बमबारी की है, भले ही वे पूर्ण पैमाने पर युद्ध से दूर रहे हों।
  • संरचनात्मक बदलावों की पहचान: अमेरिकी सैन्य और आर्थिक प्रभुत्व के बारे में अपनी बयानबाजी के बावजूद, ट्रंप यह स्वीकार करते हैं कि विश्व अब एकध्रुवीय नहीं रह गया है।
    • उनकी अनिच्छुक आक्रामकता और रणनीतिक पुनर्गणना वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव को दर्शाती है।

एकध्रुवीयता का अंत:

  • एकध्रुवीय क्षण (1991): सोवियत संघ के विघटन के बाद, अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बन गया।
  • विच्छेद बिंदु (Rupture Point – 2014): रूस द्वारा क्रीमिया के विलय ने अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने का संकेत दिया।
  • ज़मीनी हकीकत: पश्चिमी प्रतिबंध रूस को ध्वस्त करने में विफल रहे। अमेरिका अब निर्विवाद “एकमात्र सत्ता” नहीं रहा है, और वैश्विक व्यवस्था अब अधिक अराजक हो गई है, जिसमें कोई एक वैश्विक पुलिसकर्मी नहीं है।
  • अमेरिका अभी भी अग्रणी है: एकध्रुवीयता के अंत का अर्थ अमेरिकी प्रभुत्व का अंत नहीं है। यह सैन्य शक्ति और आर्थिक स्तर पर विश्व की अग्रणी शक्ति बना हुआ है।
    • हालाँकि, अमेरिका अब एकमात्र महाशक्ति नहीं रहा है; चीन और रूस ने वैश्विक निर्णय-निर्माण की मेज़ पर मज़बूती से अपनी जगह बना ली है, जो बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ने का संकेत देता है।

महान शक्ति प्रतिद्वंद्विता का विकास:

  • शीत युद्ध की तुलना: शीत युद्ध के दौरान, सोवियत संघ अमेरिका का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था। 1970 के दशक में, वाशिंगटन ने कम्युनिस्ट गुट के भीतरी दरारों का लाभ उठाने के लिए चीन से संपर्क किया।
  • प्रमुख चुनौतीकर्ता के रूप में चीन: आज, अमेरिका चीन को अपनी प्रमुख और प्रणालीगत चुनौती मानता है। यह रूस के साथ संबंधों में सुधार की संभावना को निर्मित करता है।
  • रूस के साथ संबंधों में सुधार का वैचारिक आधार: अमेरिका-रूस संबंधों में सुधार के विचार को ट्रंप के ‘MAGA’ विचारकों द्वारा अपनाया गया है। वे रूस को एक साझा ‘ईसाई सभ्यता’ के हिस्से के रूप में देखते हैं।

अमेरिका-चीन शक्ति संक्रमण:

  • आर्थिक तुलना: 1970 के दशक की शुरुआत में अपने चरम पर सोवियत अर्थव्यवस्था अमेरिका की जीडीपी का लगभग 57% थी, जिसके बाद इसमें गिरावट आई। चीन की अर्थव्यवस्था अब अमेरिकी अर्थव्यवस्था की लगभग 66% है।
  • वृद्धि और सैन्य विस्तार: चीन तेजी से विकास कर रहा है, और उसने अपनी आर्थिक शक्ति को सैन्य क्षमता में बदल दिया है तथा जहाजों की संख्या के हिसाब से विश्व की सबसे बड़ी नौसेना का निर्माण किया है।
  • रणनीतिक महत्वाकांक्षाएँ: अन्य महान शक्तियों की तरह, बीजिंग क्षेत्रीय आधिपत्य (Regional Hegemony) और वैश्विक प्रभुत्व चाहता है तथा शासन करने वाली शक्ति अमेरिका और उभरती हुई शक्ति चीन के बीच एक लंबा संघर्ष अपरिहार्य प्रतीत होता है।
    • यह स्थिति 19वीं सदी के यूरोप के तुलनीय है, जब उभरते हुए साम्राज्यवादी जर्मनी ने ‘पैक्स ब्रिटानिका’ (Pax Britannica) के दौरान ब्रिटेन को धमकी दी थी।
    • थ्यूसीडाइड्स ट्रैप (Thucydides Trap) उस प्रवृत्ति का वर्णन करता है जब एक उभरती हुई शक्ति एक स्थापित प्रमुख शक्ति को विस्थापित करने की धमकी देता है, तो संघर्ष की ओर झुकाव होता है।

रूस: स्विंग स्टेट(Russia- The Swing State)

  • सापेक्ष कमजोरी: रूस तीन महान शक्तियों में सबसे कमजोर है, जिसकी अर्थव्यवस्था छोटी है और प्रभाव क्षेत्र (Sphere Of Influence) सिकुड़ रहा है।
  • शक्ति के स्रोत: रूस के परमाणु शस्त्रागार, विस्तृत भूगोल, प्रचुर ऊर्जा और खनिज संसाधन, और बल प्रयोग की इच्छा उसकी ‘महान शक्ति’ की स्थिति को बनाए रखती है।
  • सोवियत के बाद का प्रक्षेपवक्र (Trajectory): 1990 के दशक के दौरान रूस ने अपनी पहचान खो दी थी और 2008 में जॉर्जिया में युद्ध के साथ महान शक्ति की राजनीति में अपनी वापसी की घोषणा की।
  • यूरोपीय सुरक्षा में विवाद: रूस ने यूरोप में सोवियत-वाद की सुरक्षा वास्तुकला (Security Architecture) को फिर से लिखने की कोशिश की है, जिसमें नाटो (NATO) का उसके प्रभाव क्षेत्र में विस्तार तनाव को बढ़ा रहा है।
  • रूस-चीन गठबंधन (Alignment): पश्चिमी प्रतिबंधों और यूक्रेन को सैन्य समर्थन ने रूस को चीन के करीब धकेल दिया है, और दोनों पश्चिमी ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ (Rules-Based Order) का विरोध करते हैं।

द्विध्रुवीय लक्षणों वाले बहुध्रुवीय विश्व कहे जाने के कारण:

  • शक्ति वितरण: वैश्विक व्यवस्था बहुध्रुवीय (Multipolar) है क्योंकि शक्ति तीन महान शक्तियों और कई प्रभावशाली मध्यम शक्तियों (Middle powers) के बीच वितरित है।
  • लक्षण (Traits): साथ ही, यह द्विध्रुवीय लक्षण प्रदर्शित करता है क्योंकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा की केंद्रीय धुरी (Central Axis) तेजी से अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता द्वारा परिभाषित की जा रही है, जिसमें रूस दोनों के बीच एक ‘स्विंग पावर’ (Swing Power) के रूप में कार्य कर रहा है।

वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में तरल बहुध्रुवीयता:

  • एक निश्चित संरचना का अभाव: विश्व पहले से ही बहुध्रुवीय है, फिर भी नई व्यवस्था की संरचनाएं पूरी तरह से नहीं उभरी हैं।
  • शीत युद्ध के साथ तुलना: शीत युद्ध के दो वैचारिक गुटों और अलग-अलग आर्थिक प्रणालियों के विपरीत, आज चीन के पास पिछली महाशक्तियों के समान ‘सैटेलाइट-स्टेट नेटवर्क’ (Satellite-State Networks) का अभाव है।
  • गठबंधनों का पुनर्मूल्यांकन: संयुक्त राज्य अमेरिका अपने गठबंधन के ढाँचे की स्थिरता का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है, जिसमें यूरोप के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर पुनर्विचार करना शामिल है।

तीन महान शक्तियों की रणनीतिक गणनाएँ:

  • रूस की रणनीतिक स्वायत्तता:रूस केवल चीन के सहयोगी के रूप में देखा जाना नहीं चाहता, जिससे अमेरिका–रूस संबंधों में संभावित पुनर्संयोजन के लिए सीमित गुंजाइश को दर्शाता है।
  • बाधा के रूप में यूक्रेन: यूक्रेन में युद्ध अमेरिका-रूस संबंधों में बाधा बना हुआ है, क्योंकि रूस अपने पड़ोस में प्रभुत्व फिर से कायम करना चाहता है।
  • चीन की यूरेशियाई रणनीति: चीन यूरेशियाई क्षेत्र में अपना रणनीतिक प्रभाव बनाए रखने के लिए रूस के साथ अपनी साझेदारी बनाए रखना चाहता है।

भारत का रुख:

  • रणनीति के रूप में ‘हेजिंग’: वैश्विक व्यवस्था में अनिश्चितता मध्यम शक्तियों को—जिसमें जापान और जर्मनी जैसे अमेरिकी सहयोगी तथा भारत और ब्राज़ील जैसे स्वतंत्र अभिनेता शामिल हैं—अपने रणनीतिक विकल्पों में हेजिंग का उपयोग करने के लिए प्रेरित करते है।
    • हेजिंग एक ऐसी रणनीति है जिसमें राज्य किसी एक केंद्रीय शक्ति के साथ पूरी तरह से गठबंधन करने से बचते हैं। इसके बजाय, वे एक साथ कई शक्तियों के साथ सहयोग करके जोखिमों को बाँटते हैं और विकल्पों को अधिकतम करते हैं, साथ ही वैकल्पिक मार्गों को भी खुला रखते हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न. इक्कीसवीं सदी में अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व भूमिका में आ रहे परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिए। क्या अमेरिका अभी भी एक एकध्रुवीय शक्तिबना हुआ है?

(15 अंक, 250 शब्द)

 

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