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परमाणु प्रतिरोध के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़

Lokesh Pal February 05, 2026 05:00 4 0

संदर्भ:

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबावपूर्ण रुख से उत्पन्न हालिया तनावों ने उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के भीतर विद्यमान दरारों को उजागर किया है।

प्रतिरोध के बारे में

  • परिभाषा: प्रतिरोध का अर्थ है परिणामों के भय के माध्यम से किसी कार्रवाई को रोकना। इसके दो प्रमुख मॉडल हैं:
    • निश्चितता मॉडल: इसे अमेरिका और रूस जैसी शक्तियों द्वारा अपनाया जाता है, जहाँ वे अपने विशाल परमाणु शस्त्र भंडार को स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं और हथियारों का परीक्षण कर अपनी दृढ़ता प्रदर्शित करते हैं।
    • अनिश्चितता मॉडल: इसे इज़राइल जैसे देशों द्वारा अपनाया जाता हैं, जो अपनी परमाणु स्थिति को लेकर रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखते हैं, ताकि विरोधी देश अज्ञात के भय में रहें।

प्रमुख मुद्दे

  • NATO की विश्वसनीयता और स्थिरता का क्षरण: एक परमाणु और सामूहिक सुरक्षा गठबंधन के रूप में NATO की प्रभावशीलता अमेरिकी नेतृत्व में विश्वास पर निर्भर करती है।
    • हालाँकि, सहयोगी देशों के प्रति दबावपूर्ण कूटनीति और “धौंस जमाने जैसे” व्यवहार ने इस विश्वास को कमजोर किया है, जिससे NATO की पारंपरिक भूमिका खोखली हो गई है।
  • परमाणु प्रतिरोध का कमजोर होना: परमाणु प्रतिरोध मूलतः राजनीतिक होता है; जब सुरक्षा की गारंटी देने वाले पर विश्वास कम हो जाता है, तो परमाणु सुरक्षा का वादा भी अविश्वसनीय प्रतीत होता है।
  • शीत युद्ध की तर्कशक्ति की वापसी: न्यू स्टार्ट (New START) संधि की अवधि समाप्त होने से नए हथियारों की दौड़ का खतरा बढ़ गया है और प्रतिरोध को शस्त्र भंडार के आकार व सुनिश्चित प्रतिशोध के रूप में परिभाषित किया जा रहा है।
    • उदाहरण: चीन प्रति वर्ष लगभग 100 परमाणु वारहेड्स शामिल कर रहा है, और ब्रिटेन भी अपने परमाणु भंडार में वृद्धि कर रहा है।
    • न्यू स्टार्ट संधि: यह अमेरिका और रूस के बीच एक द्विपक्षीय हथियार-नियंत्रण संधि है, जो तैनात रणनीतिक परमाणु वारहेड्स को प्रत्येक पक्ष के लिए 1,550 तक सीमित करती है तथा प्रक्षेपण प्रणालियों—जैसे ICBMs (अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें), SLBMs (पनडुब्बी से प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइलें) और भारी बमवर्षक—की भी सीमा निर्धारित करता है, ताकि पारदर्शिता और रणनीतिक स्थिरता बनी रहे।
  • पुरानी रणनीतिक सोच: जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और असमानता जैसे समकालीन खतरों के बावजूद, परमाणु हथियारों को अब भी अंतिम सुरक्षा समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
  • निश्चितता से परे प्रतिरोध: ऐतिहासिक अनुभव दर्शाता है कि प्रतिरोध अक्सर अनिश्चितता और रणनीतिक अस्पष्टता के माध्यम से प्रभावी होता है, जहाँ विरोधी सीमा-रेखाओं, प्रतिक्रियाओं और तनाव-वृद्धि के मार्गों को लेकर अनिश्चित रहते हैं, न कि केवल स्पष्ट या स्वचालित परमाणु प्रतिशोध के वादे पर निर्भर रहकर।
  • परमाणु निषेध की निरंतरता: वर्ष 1945 के बाद से परमाणु हथियारों के प्रयोग का अभाव उनके उपयोग पर मजबूत राजनीतिक और मानकगत (नॉर्मेटिव) प्रतिबंधों को दर्शाता है।

यूक्रेन से सबक

  • पुनर्गठित प्रतिरोध: रूस की परमाणु धमकियाँ यूक्रेन को रोकने में विफल रहीं, जो यह दर्शाता है कि जब धमकियों में विश्वसनीयता या राजनीतिक स्वीकार्यता नहीं होती, तो परमाणु प्रतिरोध की सीमाएँ स्पष्ट हो जाती हैं।
    • यूक्रेन के मज़बूत पारंपरिक प्रतिरोध ने, जिसे प्रतिबंधों और अंतर्राष्ट्रीय समर्थन का साथ मिला, यह दिखाया कि गैर-परमाणु देश परमाणु संघर्ष को बढ़ाए बिना परमाणु धमकी का मुकाबला कर सकते हैं।

आगे की राह

  • यूरोप का रणनीतिक विकल्प: यूरोप को अमेरिकी परमाणु सुरक्षा छत्र के विकल्प खोजने और सीमित परमाणु भूमिका के साथ मजबूत पारंपरिक रक्षा बनाने के बीच चयन करना होगा।
  • ‘इच्छुक देशों के गठबंधन’ को संस्थागत बनाना: यूक्रेन का समर्थन करने वाला उभरता यूरोपीय समूह सामूहिक पारंपरिक रक्षा के लिए एक संरचित ढाँचे में विकसित होना चाहिए।
  • रणनीतिक स्वायत्तता का निर्माण: स्वदेशी पारंपरिक क्षमताओं को मजबूत करने से यूरोप अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, साथ ही परमाणु निषेध को बनाए रखते हुए शीत युद्ध जैसी तनाव से बचा जा सकता है।

निष्कर्ष

यूरोप का परमाणु प्रधानता और पारंपरिक रूप से सुदृढ़ रक्षा के बीच चयन भविष्य के परमाणु सिद्धांत को निर्धारित करेगा।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: “वैश्विक सुरक्षा परिवेश में गहरे परिवर्तनों के बावजूद परमाणु प्रतिरोध वैचारिक रूप से लगभग स्थिर बना हुआ है”। समकालीन भू-राजनीतिक विकासों के संदर्भ में इस कथन की समालोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)

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