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उत्तराखंड में एक चिंताजनक नई सामान्य स्थिति

Lokesh Pal December 31, 2025 05:15 15 0

संदर्भ:

उत्तराखंड में, मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय तक बाघ के इर्द-गिर्द केंद्रित था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है, जिसमें तेंदुआ और एशियाई काला भालू संघर्ष के प्रमुख कारण बन गए हैं।

तेंदुआ बनाम एशियाई काला भालू:

  • तेंदुआ: तेंदुआ छिपकर रहने वाला और अत्यधिक अनुकूलनीय जीव है, और कई तेंदुए घने जंगलों से गाँव के सीमांत क्षेत्रों में स्थानांतरित हो गए हैं, जिससे मानव मौतों में वृद्धि हुई है।
  • एशियाई काला भालू: एशियाई काला भालू अत्यधिक आक्रामक होता है और गंभीर रूप से घायल करने (Severe mauling) के लिए जाना जाता है, जिसमें घास काटने वाली महिलाएँ अक्सर इसकी शिकार बनती हैं।

बाघ की सफलता का विरोधाभास:

  • प्रोजेक्ट टाइगर की भूमिका: प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता इस संरक्षण विरोधाभास के सबसे महत्वपूर्ण चालकों में से एक के रूप में उभरी है।
  • बाघों की बढ़ती संख्या: कॉर्बेट और राजाजी राष्ट्रीय उद्यानों में बाघों की आबादी 2018 में 442 से बढ़कर 2023 तक 560 से अधिक हो गई।
  • पारिस्थितिकी तंत्र-स्तर का प्रभाव: व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र की गतिशीलता को संबोधित किए बिना केवल एक प्रजाति का प्रबंधन करने से तेंदुओं और भालुओं द्वारा उत्पन्न जोखिम बढ़ गए हैं।
  • संरक्षण की दुविधा: यह व्यापक पारिस्थितिक परिवर्तनों के बीच संरक्षण की सफलता के काले पक्ष को उजागर करता है।

पारिस्थितिक विस्थापन: “कोर बनाम फ्रिंज” अवधारणा:

  • कोर क्षेत्रों में प्रभुत्व: बाघों की बढ़ती संख्या और कोर वन क्षेत्रों में उनके प्रभुत्व ने तेंदुओं को प्रमुख शिकार क्षेत्रों से बाहर कर दिया है।
  • सोपानी पारिस्थितिक प्रभाव: इस विस्थापन ने तेंदुए के व्यवहार पर व्यापक प्रभाव डाला है।
  • व्यवहारिक परिवर्तन:तेंदुए गुप्त रूप से जंगल में शिकार करने वाले शिकारी से बदलकर अब जंगलों की सीमाओं पर भोजन खोजने वाले जीव बन गए हैं।
  • मानव निकटता में वृद्धि: इस व्यवहारिक बदलाव ने तेंदुओं को अधिक अस्थिर और मानव उपस्थिति के प्रति कम भयभीत बना दिया है।
  • स्थानिक वितरण: उत्तराखंड की लगभग 79% तेंदुओं की आबादी अब संरक्षित क्षेत्रों (Protected areas) के बाहर निवास करती है।

भूतिया/वीरान गाँव (पलायन): प्रवास और शिकारियों के बीच संबंध:

  • प्रवास का पैमाना: पहाड़ियों से बड़े पैमाने पर प्रवास या “पलायन” संघर्ष का एक शक्तिशाली और अद्वितीय कारक है।
  • बाह्य-प्रवास (Outmigration) के कारण: उच्च बेरोजगारी और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा व शिक्षा की कमी ने प्रवास को प्रेरित किया है।
  • जनसांख्यिकीय प्रभाव: पिछले एक दशक में पांच लाख से अधिक लोगों ने अपने गाँव छोड़ दिए हैं। हजारों गाँव आंशिक या पूर्ण रूप से वीरान हो गए हैं।
  • पारिस्थितिक परिवर्तन: वीरान गाँव लैंटाना कैमरा (Lantana camara) जैसे आक्रामक पौधों से घिरी घनी झाड़ियों में बदल गए हैं।
  • शिकारियों के लिए आश्रय: ये परिदृश्य तेंदुओं और भालुओं के लिए आदर्श आवरण और आवास प्रदान करते हैं।

शिकार का आधार और आहार संबंधी बदलाव:

  • आवास क्षरण: विकासात्मक गतिविधियों और जंगल की आग ने हिरण और जंगली सूअर जैसे प्राकृतिक शिकार की उपलब्धता कम कर दी है।
  • आहार में विवशतापूर्ण बदलाव: शिकार की कम उपलब्धता ने शिकारियों को मानव बस्तियों के पास भोजन तलाशने के लिए मजबूर किया है, जिससे वे आवारा कुत्तों और मवेशियों का शिकार करने लगे हैं।
  • भालुओं के लिए आकर्षण: भालू कचरे के ढेर, बिना निगरानी वाले बगीचों और मक्का व बाजरा जैसी फसलों की ओर आकर्षित होते हैं।
  • भालुओं पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान ने भालुओं की शीतनिद्रा की अवधि को कम कर दिया है, जिससे भालुओं की गतिविधियों और मानव-मुठभेडों में वृद्धि हुई है।

आगे की राह:

  • नीतिगत बदलाव की आवश्यकता: एकल-प्रजाति संरक्षण से समावेशी रणनीतियों की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
  • सामुदायिक सशक्तीकरण: संघर्ष का खामियाजा भुगतने वाले समुदायों को सशक्त बनाया जाना चाहिए।
  • प्रीडेटर प्रूफिंग (Predator Proofing): शिकारी-रोधी बाड़ों (Predator-proof corrals) और सौर-ऊर्जा संचालित बाड़ (Fences) का निर्माण मवेशियों के शिकार को कम कर सकता है।
  • प्रे बेस (Prey Base) की बहाली: सीमांत क्षेत्रों में वन भूमि को बहाल करने से प्राकृतिक शिकार आधार को मजबूत किया जा सकता है।

निष्कर्ष:

युवाओं के पलायन को रोकने के लिए पहाड़ी अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करने, प्रवास और शिकारियों की उपस्थिति पर अंकुश लगाने के लिए वीरान गांवों को पुनर्जीवित करने, और एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है जो मानव सुरक्षा और स्थानीय आवश्यकताओं के साथ संरक्षण को संतुलित करे।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न. उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष के समाधान में तकनीकी हस्तक्षेपों (सोलर फेंसिंग, अर्ली वार्निंग सिस्टम, रेडियो कॉलरिंग) की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

 

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