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अफगानिस्तान-पाकिस्तान ‘खुला युद्ध’

Lokesh Pal February 28, 2026 05:15 7 0

संदर्भ

अफगानिस्तान के तालिबान शासन और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सीमा-पार तनाव अब खुले संघर्ष में बदल गए हैं। यह स्थिति सुरक्षा चिंताओं और डूरंड रेखा के आसपास की गई प्रतिशोधात्मक सैन्य कार्रवाइयों के कारण उत्पन्न हुई है।

संघर्ष का प्रारंभ और स्वरूप

  • हवाई हमले और हताहत: पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के विभिन्न ठिकानों पर कई हवाई हमले किए हैं, जिसके परिणामस्वरूप खुले युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हुई और कई लोगों की जान चली गई।
  • भस्मासुर सिंड्रोम(Bhasmasur Syndrome) (प्रतिघात प्रभाव): पाकिस्तान ने ऐतिहासिक रूप से तालिबान का समर्थन अपने स्वार्थों के लिए एक कठपुतली के रूप में किया था, लेकिन अब वही समूह पाकिस्तान की स्थिरता को नष्ट करने वाली वास्तविक शक्ति बन गया है।

“स्ट्रैटेजिक डेप्थ” की अवधारणा

  • भौगोलिक संवेदनशीलता: पाकिस्तान की भौगोलिक संकीर्णता के कारण उसकी सैन्य रणनीति लंबे समय से अफगानिस्तान में “रणनीतिक गहराई” (Strategic Depth) प्राप्त करने पर केंद्रित रही है।
  • पीछे हटने और पुनर्गठन की रणनीति: सैन्य तर्क यह था कि यदि भारत कभी हमला करता और पाकिस्तानी क्षेत्र में गहराई तक बढ़ जाता, तो उनकी सेनाएँ अफगानिस्तान में पीछे हटकर पुनर्गठित हो सकती थीं और फिर पलटवार कर सकती थीं।
    • इसी कारण अमेरिका-समर्थित लोकतांत्रिक दौर में भी पाकिस्तान ने तालिबान का दीर्घकालिक समर्थन किया।

पाकिस्तान की कार्रवाइयों के कारण

  • जनाक्रोश को नियंत्रित करना: खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) द्वारा बढ़ते हमलों ने सेना पर घरेलू दबाव को बढ़ावा दिया है।
  • प्रतीकात्मक सैन्य कार्रवाई: अफगानिस्तान में ठोस सैन्य लक्ष्यों की कमी के कारण हवाई हमले अधिकतर प्रतीकात्मक प्रतीत होते हैं, न कि निर्णायक।
  • आंतरिक संकट का बाहरीकरण: तनाव को बढ़ावा देकर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में अशांति से ध्यान हटाने का प्रयास किया जा रहा है।

तनाव वृद्धि और अफगान प्रतिशोध

  • कड़ा जवाब: संयमित प्रतिक्रिया की अपेक्षा के विपरीत, अफगान तालिबान ने पाकिस्तान के भीतर कई ठिकानों को निशाना बनाते हुए तीव्र प्रतिशोध किया।
  • तनाव पर नियंत्रण का अभाव: सूत्रों के अनुसार, इस संघर्ष ने पाकिस्तान को सऊदी अरब और कतर जैसे क्षेत्रीय शक्तियों से कूटनीतिक मध्यस्थता मांगने के लिए मजबूर किया।
  • अफगानिस्तान की दृढ़ता: सीमित पारंपरिक सैन्य क्षमताओं के बावजूद, अफगानिस्तान ने ऐतिहासिक रूप से सोवियत संघ (USSR) और अमेरिका (USA) जैसी महाशक्तियों के विरुद्ध लंबे संघर्ष झेलकर अपनी प्रतिरोध क्षमता प्रदर्शित की है।

भारत के लिए रणनीतिक सबक और चेतावनियाँ

  • ध्यान भटकाने वाली उकसावे की आशंका: पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता उसके नेतृत्व को घरेलू दबाव कम करने के लिए भारत के विरुद्ध सैन्य उकसावे की ओर प्रेरित कर सकती है।
  • सिद्धांत के प्रसार का जोखिम: यदि किसी पड़ोसी देश पर आतंकवादियों को शरण देने के आरोप में हमला करने की नीति सामान्य हो जाती है, तो भारत के विरुद्ध (जैसे बलूच समूहों को लेकर) ऐसे ही आरोप लगाकर शत्रुतापूर्ण कार्रवाई को उचित ठहराया जा सकता है।
  • विश्वसनीय और स्पष्ट प्रतिरोध क्षमता: भारत को मजबूत सैन्य तैयारी और स्पष्ट रणनीतिक संकेत बनाए रखने चाहिए, ताकि किसी भी आक्रामकता की कीमत अस्वीकार्य हो।
  • स्पष्ट ‘रेड लाइन्स’: भारत को अपने आतंकवाद-रोधी तंत्र को और मजबूत करना चाहिए तथा स्पष्ट रणनीतिक सीमाएँ निर्धारित करनी चाहिए, ताकि किसी भी उल्लंघन पर त्वरित, निर्णायक और अनुपातिक प्रतिक्रिया दी जा सके।

निष्कर्ष

अफगानिस्तान–पाकिस्तान संघर्ष प्रॉक्सी नीतियों और आंतरिक अस्थिरता के जोखिमों को उजागर करता है, और भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह सुदृढ़ प्रतिरोध क्षमता और रणनीतिक स्पष्टता बनाए रखे, ताकि किसी भी संभावित तनाव वृद्धि को रोका जा सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हालिया तनाव दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सुरक्षा की नाजुकता को उजागर करता है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बार-बार उत्पन्न होने वाले तनावों के कारणों की जांच करें और इस संघर्ष के क्षेत्रीय स्थिरता और भारत के रणनीतिक हितों पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करें।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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