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भारत में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की नियुक्ति तथा संबंधित विवाद

Lokesh Pal March 20, 2025 05:15 56 0

संदर्भ:

सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की नियुक्ति की वर्तमान पद्धति पर प्रश्न उठाने वाली एक जनहित याचिका (PIL) के संबंध में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।

मुख्य बिंदु 

  • जनहित याचिका में तर्क दिया गया है, कि CAG के चयन में कार्यपालिका का एकमात्र विवेकाधिकार  संविधान के स्वतंत्रता के मूल्य का उल्लंघन करता है।
  • इसमें अधिक पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र चयन समिति की स्थापना की माँग की गई है।

CAG की हालिया रिपोर्ट

  • दिल्ली आबकारी नीति (2021-22): CAG की रिपोर्ट में नीति कार्यान्वयन विफलताओं, राजस्व चिंताओं और लाइसेंस देने में पारदर्शिता की कमी के कारण ₹2,002 करोड़ के हानि की बात कही गई है।
  • CAMPA रिपोर्ट (उत्तराखंड): वन भूमि के परिवर्तन, वनीकरण गतिविधियों में देरी और वनीकरण निधि के दुरुपयोग जैसे मुद्दों को उजागर किया गया।
  • केरल की ऑफ-बजट उधारी: राजकोषीय संघवाद और वित्तीय जवाबदेही पर चिंताओं को उजागर किया गया।

उत्पत्ति और विकास

  • वर्ष 1858: भारत सरकार के महालेखाकार के रूप में स्थापित।
  • मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार, 1919: स्वतंत्र बनाया गया और महालेखा परीक्षक के रूप में मान्यता दी गई।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1935: कार्यालय की स्वायत्तता को सुदृढ़ किया गया।

संवैधानिक स्थिति

  • निकाय की स्थिति: CAG एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, जो वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
  • भूमिका: संघ और राज्य सरकारों का आर्थिक लेखा-जोखा, सार्वजनिक निधियों पर संसदीय नियंत्रण सुनिश्चित करना।
  • पूर्व विवाद:
    • 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला;
    • कॉमनवेल्थ खेल वित्तीय कुप्रबंधन |

संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 148 से अनुच्छेद 151)

  • अनुच्छेद 148: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान पदच्युति की शर्तों के साथ राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति। 
    • स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कार्यकाल के बाद पुनर्नियुक्ति नहीं; वित्तीय निर्भरता को रोकने के लिए भारत के समेकित कोष से व्यय लिया जाएगा।
  • अनुच्छेद 149: CAG संघ और राज्य दोनों सरकारों का लेखा-जोखा रखता है। CAG अधिनियम, 1971 शक्तियों एवं जिम्मेदारियों को और अधिक परिभाषित करता है।
  • अनुच्छेद 151: CAG रिपोर्ट राष्ट्रपति/राज्यपाल को सौंपी जाती है और संसद/राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है। 
    • विधानमंडलों में रिपोर्ट रखने के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं है, जिससे देरी संबंधी  चिंताएँ बढ़ जाती हैं।
  • विधायी विस्तार: नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कर्तव्य, शक्तियाँ और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 के अलावा, अन्य कानूनों ने CAG के अधिकार क्षेत्र को व्यापक बनाया है:
    • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम, 2003: सरकारी उधारी और घाटे की निगरानी करके राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करता है। CAG सरकार द्वारा निर्धारित राजकोषीय लक्ष्यों के अनुपालन की निगरानी करता है।

CAG की आलोचनाएँ

  • लेखा परीक्षा में औपनिवेशिक विरासत: पॉल एच. एप्पलबी ने तर्क दिया, कि भारत की स्वतंत्रता के बाद की लेखा परीक्षा प्रणाली ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रक्रियाओं को दर्शाती है, जो कठोर थे और प्रायः व्यापक शासन प्राथमिकताओं की बजाय मामूली प्रक्रियात्मक विवरणों पर केंद्रित थे।
  • नौकरशाही पर दमनकारी प्रभाव: उन्हें भय था, कि सीएजी द्वारा अत्यधिक जाँच नौकरशाहों के बीच नकारात्मक संस्कृति उत्पन्न कर सकती है, जिससे वे त्वरित प्रशासनिक निर्णय लेने से हतोत्साहित हो सकते हैं।
    • उदाहरण – केरल में पीपीई खरीद: सीएजी ने पीपीई किट की खरीद लागत में 300% की वृद्धि की रिपोर्ट प्रस्तुत की। केरल सरकार ने कठोर वित्तीय अनुपालन की बजाय महामारी की तत्काल जरूरतों का हवाला देते हुए इसका बचाव किया।
  • विशेषज्ञता का अभाव: एप्पलबी ने तर्क दिया, कि लेखा परीक्षकों के पास प्रशासन और नीति-निर्माण में विशेषज्ञता का अभाव है।
  • वित्तीय अखंडता: उन्होंने सुझाव दिया, कि सीएजी को नीतिगत निर्णयों का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए, बल्कि वित्तीय अखंडता पर कठोरता से ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • पूरक: निजी लेखा परीक्षकों को सरकारी लेखा परीक्षा के पूरक के रूप में सुझाया गया, लेकिन यह भी कहा गया कि सार्वजनिक हित के निर्णय कार्यपालिका पर छोड़ दिए जाने चाहिए।

सीएजी के कामकाज में चुनौतियाँ

  • राजनीतिक दबाव: सरकारें प्रायः लेखा-परीक्षा निष्कर्षों को कम करने के लिए दबाव डालती हैं, जिससे सीएजी की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
  • कार्यान्वयन में देरी: लेखा-परीक्षा रिपोर्ट प्रायः देरी से प्रस्तुत की जाती हैं, जिससे नीतिगत निर्णयों और वित्तीय जवाबदेही पर उनका प्रभाव कम हो जाता है।

निष्कर्ष

CAG देश में आर्थिक स्थिति के सुदृढ़ीकरण हेतु महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, ऐसे में भारत की वित्तीय अखंडता और लोकतांत्रिक जवाबदेही को बनाए रखने के लिए CAG की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है।  

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

सार्वजनिक वित्त प्रहरी के रूप में CAG की संवैधानिक स्थिति की जाँच कीजिए, साथ ही बताइए कि इसकी नियुक्ति प्रक्रिया इसकी स्वतंत्रता को किस प्रकार प्रभावित करती है। संघीय संतुलन और प्रशासनिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए CAG की प्रभावशीलता को मज़बूत करने के लिए आवश्यक उपाय सुझाइए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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