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उच्च न्यायालय के न्यायधीश को उसके पद से हटाने से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

Lokesh Pal January 22, 2026 04:55 78 0

सन्दर्भ:

107 लोकसभा सांसदों ने संवैधानिक अनियमितता और सामुदायिक पूर्वाग्रह का आरोप लगाते हुए, मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन को ऊनके पद से हटाने के लिए प्रस्ताव दिया है।

न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने का संवैधानिक आधार

  • शामिल अनुच्छेद: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए अनुच्छेद 124(4)-124(5) और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए अनुच्छेद 217(1)(b) और 218 एक ही निष्कासन प्रक्रिया लागू करते हैं।
  • शब्दावली: संविधान में “पद से हटाना” शब्द का प्रयोग किया गया है, जबकि ’महाभियोग’ शब्द का औपचारिक रूप से उपयोग केवल अनुच्छेद 61 के तहत राष्ट्रपति के लिए किया जाता है।
  • आधार: न्यायाधीशों को केवल “सिद्ध कदाचार या अक्षमता” के आधार पर ही हटाया जा सकता है, जिससे निराधार आरोपों से सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

‘सिद्ध कदाचार’ का अर्थ

  • कदाचार की न्यायिक व्याख्या: यह संविधान में परिभाषित नहीं है, बल्कि के. वीरास्वामी बनाम भारत संघ (1991) जैसे मामलों के माध्यम से इसकी व्याख्या की गई है (न्यायालय के अंदर और बाहर ईमानदारी के उच्च मानकों की आवश्यकता है)।
    • एम. कृष्णा स्वामी बनाम भारत संघ (1992) वाद (सत्ता का जानबूझकर दुरुपयोग या भ्रष्टाचार)

विधिक ढाँचा: न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968

  • विधिक अधिकार: न्यायाधीशों के खिलाफ आरोपों की जाँच और साक्ष्यों को विनियमित करने के लिए, अनुच्छेद 124(5) के तहत अधिनियमित किया गया।
  • प्रस्ताव को आरंभ करने की न्यूनतम सीमा: प्रस्ताव पर कम-से-कम 100 लोकसभा सांसदों या 50 राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
  • पीठासीन अधिकारी की भूमिका: प्रस्ताव अध्यक्ष या चेयरमैन के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, जिन्हें जाँच शुरू होने से पूर्व इसे स्वीकार करना आवश्यक है।

संसदीय मतदान आवश्यकता

  • विशेष बहुमत: प्रत्येक सदन को कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होगा।
  • राष्ट्रपति की भूमिका: राष्ट्रपति संसद से प्रस्ताव प्राप्त होने के बाद ही न्यायाधीश को पद से हटाते हैं, जिससे पद से हटाना संवैधानिक रूप से औपचारिक हो जाता है।

प्रवेश के बाद पूछताछ तंत्र

  • तीन सदस्यीय समिति: इसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होते हैं।
  • न्यायिक जाँच: विस्तृत जाँच से आरोपों का पेशेवर और स्वतंत्र मूल्यांकन सुनिश्चित होता है।
  • उचित प्रक्रिया: न्यायाधीश को बचाव करने का अवसर दिया जाता है, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का संरक्षण होता है।

प्रक्रियागत समस्याएँ

  • सीमांत वीटो शक्ति: अध्यक्ष/सभापति पहले चरण में ही प्रस्ताव को अस्वीकार कर सकते हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया समाप्त हो जाएगी।
  • स्वीकार्यता मानदंड का अभाव: कानून में प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने की शर्तें निर्दिष्ट नहीं हैं, जिससे मनमानी की संभवना बनी रहती है।
  • वैधानिक प्रकृति: अध्यक्ष केवल पीठासीन अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक वैधानिक प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है, इसलिए निर्णय को विधिक रूप से चुनौती दी जा सकती है।

संवैधानिक असंगति

  • अनुच्छेद 124(5): जाँच और संबोधन की प्रस्तुति के विनियमन की अनुमति देता है, प्रस्ताव की अस्वीकृति की नहीं।
  • अनुच्छेद 61 में ऐसी कोई शक्ति नहीं है: न्यायाधीश को हटाने के विपरीत, राष्ट्रपति के महाभियोग प्रस्ताव को पीठासीन अधिकारी द्वारा अवरुद्ध नहीं किया जा सकता है
  • प्रक्रिया में विकृति: जाँच में योग्यता का निर्धारण होना चाहिए, न कि प्रारंभिक राजनीतिक विवेकाधिकार का।

लोकतांत्रिक और संस्थागत जोखिम

  • कार्यकारी प्रभाव: सरकार पीठासीन अधिकारियों को नियंत्रित करके कार्यवाही को प्रभावी ढंग से रोक सकती है।
  • भय उत्पन्न करने वाला प्रभाव: सांसदों को यह जानकर कार्यवाही शुरू करने में भय हो सकता है, कि प्रस्तावों को तुरंत खारिज किया जा सकता है (बिना विस्तृत जाँच के तुरंत खारिज किया जा सकता है)।
  • जवाबदेही में कमी: मजबूत संसदीय समर्थन के बावजूद एक गंभीर संवैधानिक तंत्र अप्रभावी हो जाता है।

आगे की राह:

  • न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम पर पुनर्विचार: न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम में संशोधन करने की आवश्यकता है, ताकि अध्यक्ष/सभापति के प्रस्ताव को प्रारंभिक चरण में ही रोकने की शक्ति को हटाया जा सके, या उस पर कठोर प्रतिबंध लगाया जा सके।
  • स्वतः समिति सक्रियण: संवैधानिक संख्यात्मक आवश्यकता को पूरा करने वाले किसी भी प्रस्ताव को स्वतः ही वैधानिक जाँच समिति को भेज दिया जाना चाहिए।
  • संतुलन बहाली: गंभीर आरोपों के राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिए विवेकाधीन नियंत्रण के स्थान पर स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

निष्पक्ष और स्वचालित जाँच तंत्र द्वारा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुदृढ़ होती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही एक सुदृढ़ संवैधानिक ढाँचे के दो प्रमुख स्तंभ हैं। भारत में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए। वर्तमान ढाँचे की सीमाओं और संभावित कमियों का विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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