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रक्षा प्रौद्योगिकी में पीछे रह जाने का खतरा (Danger of Playing Catch Up With Defence Technology)

Lokesh Pal March 07, 2026 05:30 51 0

संदर्भ

हाल ही में पश्चिम एशिया में अमेरिका–इज़राइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद बढ़े तनाव ने यह दिखाया है कि महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता (Great-Power Rivalry) फिर से उभर रही है। साथ ही रक्षा प्रौद्योगिकी में तेज़ प्रगति के कारण वैश्विक सैन्य प्रतिस्पर्धा भी तीव्र हो रही है।

वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा (The Global Tech Race)

  • हार्ड पावर के मापदंडों की वापसी: सैन्य शक्ति का आकलन अब फिर से नौसैनिक बेड़े, वायु शक्ति और तकनीकी श्रेष्ठता के आधार पर किया जा रहा है, जैसा कि 20वीं सदी की शुरुआत की भू-राजनीति में देखा गया था।
  • विशाल रक्षा बजट: अमेरिका का रक्षा बजट लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर है, जो नौ देशों के संयुक्त रक्षा खर्च से भी अधिक है।
    • चीन: यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक प्रधान शक्ति बन चुका है, जिसका रक्षा बजट 22 देशों के संयुक्त रक्षा बजट के बराबर है। इसके जहाज निर्माण की गति अब अमेरिका से भी तीव्र हो गई है।

भारत का “2% जाल” और आधुनिकीकरण संकट

  • बजट की सीमा: एम.एम. जोशी समिति के अनुसार, भारत का रक्षा व्यय वर्ष 2014 से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 2% ही बना हुआ है, जिससे एक “2% जाल” का निर्माण हुआ है जो आधुनिकीकरण को सीमित करता है।
  • भारतीय वायु सेना (IAF): HAL तेजस विमान के धीमे उत्पादन और पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में देरी के कारण वायुसेना के बेड़े के आधुनिकीकरण की गति प्रभावित हुई है।
  • भारतीय नौसेना: महत्वपूर्ण पनडुब्बी अधिग्रहण कार्यक्रम जैसे प्रोजेक्ट 75I और प्रोजेक्ट 77 में विलंब की प्रवृति देखी जा सकती है।
  • भारतीय सेना: तोपखाने, निगरानी प्रणाली और युद्धक्षेत्र तकनीक के आधुनिकीकरण की गति धीमी रही है क्योंकि पूंजीगत व्यय सीमित है (रक्षा बजट का 30% से भी कम पूंजीगत व्यय पर खर्च होता है)।

रक्षा स्वदेशीकरण से संबंधित चुनौतियाँ

  • नीतियों के क्रियान्वयन में अंतर: रक्षा स्वदेशीकरण से जुड़ी महत्वाकांक्षी नीतियाँ अक्सर कमज़ोर क्रियान्वयन के कारण घोषणाओं और वास्तविक परिणामों के बीच अंतर उत्पन्न करती हैं।
  •  आत्मनिर्भर भारत की सीमित सफलता: आत्मनिर्भरता के लिए बार-बार नीतिगत प्रतिबद्धताओं के बावजूद, रक्षा उत्पादन और निर्यात के लक्ष्य पूरे नहीं हो पाए हैं।
    • सरकार ने वर्ष 2025 के लिए ₹35,000 करोड़ के रक्षा निर्यात का लक्ष्य निर्धारित किया था, लेकिन वास्तविक निर्यात लगभग ₹23,000 करोड़ ही रहा।
    • कमी के पीछे के संरचनात्मक कारणों को दूर करने के बजाय बाद में ₹50,000 करोड़ का नया लक्ष्य घोषित कर दिया गया।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की सीमाएँ: रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) को सीमित उत्पादन क्षमता, आपूर्ति में देरी और अप्रभावी खरीद प्रणाली जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  • तकनीकी निर्भरता: उन्नत रक्षा प्रणालियों के लिए भारत अभी भी विदेशी तकनीक और उपकरणों पर निर्भर है, जिससे वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता सीमित हो जाती है।

रक्षा क्षमता मजबूत करने के लिए प्रस्तावित रोडमैप

  • रक्षा व्यय में वृद्धि: सरकार को वर्ष 2030 तक रक्षा व्यय को GDP के 3% और वर्ष 2035 तक 5% तक बढ़ाना चाहिए ताकि आधुनिकीकरण और सैन्य तैयारी को समर्थन प्राप्त हो सके।
  • समन्वित अनुसंधान एवं विकास (R&D) प्रणाली: नवाचार को तेज़ करने के लिए निजी उद्योग, IITs और सरकारी रक्षा प्रयोगशालाओं को एकीकृत कर एक मजबूत अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

विंस्टन चर्चिल ने “टिड्डी के वर्षों (locust years)” की चेतावनी दी थी—ऐसे समय जब खतरे बढ़ते रहते हैं और समाज लापरवाही में रहता है। भारत को अपनी रणनीतिक निष्क्रियता समाप्त करते हुए रक्षा खर्च, तकनीकी क्षमता और स्वदेशी नवाचार को तेजी से मजबूत करना होगा, ताकि एक अस्थिर वैश्विक वातावरण में अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और बिना चालक वाले प्रणालियों जैसी उभरती तकनीकों में तेजी से हो रही प्रगति आधुनिक युद्ध और रक्षा क्षमताओं को लगातार आकार दे रही है। रक्षा तत्परता को बदलने में उन्नत तकनीकों की भूमिका पर चर्चा करें और रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल करने में भारत को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उनका विश्लेषण करें।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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