100% तक छात्रवृत्ति जीतें

रजिस्टर करें

जनगणना से आगे परिसीमन की सुनिश्चितता और प्रतिनिधित्व का विस्तार

Lokesh Pal April 01, 2025 05:45 17 0

संदर्भ:  

परिसीमन और वित्तीय हस्तांतरण पर चर्चा से संसद और राज्य विधानसभाओं में तनाव उत्पन्न हो गया है, जिससे भारत के संघीय ढाँचे संबंधी चिंताएँ बढ़ रही हैं।

परिसीमन क्या है?

  • परिभाषा: यह जनसंख्या परिवर्तन और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के आधार पर निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए चुनावी निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करने की प्रक्रिया है।
  • उद्देश्य: इसका प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है, कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या समान हो, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सभी नागरिकों को समान प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके।

भारत में परिसीमन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • पहला परिसीमन: भारत में निर्वाचन क्षेत्रों का पहला परिसीमन वर्ष 1951 में हुआ था। यह स्वतंत्रता के बाद पहली जनगणना के अनुसार जनसंख्या के आधार पर उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए किया गया था।
  • लोकसभा सीटों में वृद्धि: शुरुआत में, 1971 तक प्रत्येक जनगणना के बाद जनसंख्या वृद्धि के आधार पर लोकसभा सीटों में वृद्धि की गई। इससे निर्वाचन क्षेत्रों को विभिन्न राज्यों में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के अनुसार समायोजित करने की अनुमति मिली।
  • सीटों पर रोक: 1971 में, 2026 की जनगणना तक लोकसभा सीटों की संख्या 543 पर स्थिर करने का निर्णय लिया गया था। ऐसा जनसंख्या वृद्धि के साथ निर्वाचन क्षेत्रों की बढ़ती संख्या के कारण राजनीतिक अस्थिरता को कम करने के लिए किया गया था।
  • 2026 में परिवर्तन: 2026 में लोकसभा सीटों की संख्या पर लगी रोक को हटाकर, 2021 की जनगणना के आधार पर पुनः परिसीमन  किया जाएगा

अभि तक की लोकसभा सीटें

  • 1951: प्रति सांसद 7.3 लाख लोग।
  • 1971: प्रति सांसद 10.1 लाख लोग।
  • 2026 (अपेक्षित) : प्रति सांसद 20 लाख लोग।
  • सीटों में अनुमानित वृद्धि : 543 → 753 

परिसीमन से संबंधित मुद्दे

  • दक्षिणी राज्यों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण: तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे दक्षिणी राज्यों ने प्रभावी परिवार नियोजन उपायों को लागू किया है और अपनी जनसंख्या वृद्धि को प्रबंधित किया है।
    • परिणामस्वरूप, उनकी जनसंख्या वृद्धि दर उत्तरी राज्यों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है।
  • उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्य: उत्तर प्रदेश (UP)बिहार और मध्य प्रदेश (MP) जैसे उत्तरी राज्यों में निम्न साक्षरता दर, परिवार नियोजन के बारे में जागरूकता की कमी और अन्य सामाजिक-आर्थिक कारकों के कारण उच्च जनसंख्या वृद्धि है।
  • परिसीमन पर प्रभाव: यदि केवल जनसंख्या को परिसीमन का मानदंड माना जाए, तो उत्तरी राज्यों को उनकी उच्च जनसंख्या वृद्धि के कारण अधिक लोकसभा सीटें प्राप्त होंगी।
    • इसके विपरीत, दक्षिणी राज्य अपनी अधिक नियंत्रित जनसंख्या वृद्धि के बावजूद प्रतिनिधित्व खो देंगे। यह विसंगति राजनीतिक प्रतिनिधित्व में क्षेत्रीय असंतुलन उत्पन्न करती है, जो दक्षिण की कीमत पर उत्तर को लाभ पहुँचाती है।
  • 1971 की जनसंख्या पर आधारित आवंटन: ऐतिहासिक रूप से, वित्त का आवंटन और लोकसभा में सीटों का वितरण 1971 की जनगणना के जनसंख्या आँकड़ों पर आधारित था, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी आबादी वाले राज्यों, विशेष रूप से उत्तर भारतीय राज्यों, को अधिक आवंटन प्राप्त हुआ।
  • 2011 के जनगणना आँकड़ों में परिवर्तन15वें वित्त आयोग ने आवंटन मानदंड को 2011 की जनगणना के आँकड़ों के आधार पर परिवर्तित किया, जिससे वित्त और राजनीतिक शक्ति का महत्त्वपूर्ण पुनर्वितरण हुआ, क्योंकि यह पिछले दशकों में जनसंख्या वृद्धि के दृष्टिकोण को दर्शाता है।
  • दक्षिणी राज्यों पर प्रभाव: 2011 के आँकड़ों में परिवर्तन से दक्षिणी राज्यों (जैसे- तमिलनाडुकेरल और कर्नाटक) को नुकसान हुआ क्योंकि इन राज्यों में उत्तरी राज्यों की तुलना में धीमी जनसंख्या वृद्धि देखी गई है।
    • परिणामस्वरूप, इन राज्यों को केवल जनसंख्या के आँकड़ों के आधार पर मिलने वाली धनराशि और प्रतिनिधित्व से वंचित होना पड़ा।
  • जनसांख्यिकीय प्रदर्शन: इस असंतुलन को दूर करने के लिए, वित्त आयोग ने ‘जनसांख्यिकीय प्रदर्शन’ नामक एक नया मानक प्रस्तुत किया, जो न केवल जनसंख्या पर विचार करता है, बल्कि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के  प्रयासों  और उसकी सफलता पर भी विचार करता है।
    • यह मानक जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव को संतुलित करने में मदद करता है तथा यह सुनिश्चित करता है, कि जिन राज्यों ने अपनी जनसंख्या वृद्धि को बेहतर ढंग से प्रबंधित किया है, उन्हें अनुचित रूप से दंडित न किया जाए।

निष्पक्ष प्रतिनिधित्व के लिए जनसंख्या पर्याप्त नहीं

  • असमान प्रतिनिधित्व: अधिक जनसंख्या का अर्थ सदैव उचित प्रतिनिधित्व नहीं होता। बड़ी आबादी वाले राज्य को ज़्यादा सीटें मिल सकती हैं, लेकिन छोटे राज्यों की तुलना में इससे असमान प्रतिनिधित्व स्थापित हो सकता है।
  • घनत्व कारक: कुछ राज्यों में जनसंख्या घनत्व अधिक है, लेकिन भूमि क्षेत्र छोटा है । ऐसे राज्यों में, सीमित क्षेत्रों में लोगों की अधिकता से निर्वाचन क्षेत्रों में भीड़-भाड़ हो सकती है, जिससे प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
    • अधिक भूमि क्षेत्र लेकिन कम जनसंख्या घनत्व वाले बड़े राज्य बेहतर शासन और सेवा वितरण सुनिश्चित कर सकते हैं।
  • पूर्वोत्तर मॉडल: पूर्वोत्तर राज्यों को कम जनसंख्या होने के बावजूद, उनके सामरिक और भौगोलिक महत्त्व के कारण उचित प्रतिनिधित्व दिया जाता है। इससे पता चलता है, कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व निर्धारित करने में जनसंख्या का आकार ही एकमात्र कारक नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और शासन संबंधी आवश्यकताओं पर विचार करना भी महत्त्वपूर्ण हैं। 
  • अधिक आबादी वाले राज्यों को संसाधनों और प्रबंधन के साथ संघर्ष करना पड़ सकता है, जबकि छोटे राज्यों में अधिक कुशल शासन प्रणाली स्थापित हो सकती है।

आगे की राह

  • बेहतर पुनर्वितरण: सीटों का आवंटन न केवल जनसंख्या के आधार पर, बल्कि विकास और अभिशासन को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे के मामले में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को उनकी जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
  • घनत्व आधारित प्रतिनिधित्व : उच्च जनसंख्या घनत्व का तात्पर्य अधिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए। उच्च जनसंख्या घनत्व वाले राज्यों को बुनियादी ढाँचे, शासन और संसाधनों पर बढ़ती मांगों को ध्यान में रखते हुए अधिक सीटें आवंटित की जानी चाहिए।
  • क्रमिक परिवर्तनप्रतिनिधित्व में अचानक परिवर्तन संघीय संतुलन को अव्यवस्थित कर सकता है। जनसंख्या वृद्धि के आधार पर सीटों के आवंटन में कोई भी बदलाव समयानुसार धीमी गति से होना चाहिए, जिससे राज्यों को नई राजनीतिक गतिशीलता के साथ समायोजित करने का अवसर मिल सके।

निष्कर्ष

सुशासन और नियंत्रित जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है, को राजनीतिक शक्ति संकट या कमी का सामना नहीं करना चाहिए। इसके लिए सुशासन और प्रभावी प्रबंधन को सुनिश्चित करते हुए उपयुक्त उपाय किए जाने चाहिए, जिससे न केवल परिसीमन किया जा सके, बल्कि  सरकारी नीतियों का बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सके। 

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधन आवंटन के संदर्भ में भारत के उत्तरी तथा दक्षिणी राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय विभाजन से उत्पन्न चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। इन जनसांख्यिकीय विविधताओं से उत्पन्न संभावित असमानताओं को दूर करने के उपाय सुझाइए।

(15 अंक, 250 शब्द)

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

THE MOST
LEARNING PLATFORM

Learn From India's Best Faculty

      

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.