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डिजिटल संप्रभुता

Lokesh Pal November 28, 2025 05:15 7 0

संदर्भ:

वैश्विक शक्ति पारंपरिक भू-राजनीतिक नियंत्रण से हटकर बिग टेक द्वारा संचालित डिजिटल प्रभुत्व की ओर बढ़ रही है। भारत को अब डेटा-संचालित विश्व में अपनी डिजिटल स्वायत्तता की रक्षा करनी होगी।

वैश्विक शक्ति में बदलाव

  • डिजिटल उपनिवेशवाद का उदय: बड़ी टेक कंपनियां नए युग के औपनिवेशिक अभिनेताओं की तरह व्यवहार करती हैं, सैन्य बल का उपयोग किए बिना डेटा संग्रहित करती हैं और राष्ट्रीय चुनाव को आकार देती हैं।
  • डेटा ने पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों का स्थान ले लिया है: वैश्विक प्रभाव और आर्थिक क्षमता को निर्धारित करने वाले मुख्य संसाधन के रूप में डेटा ने तेल क्षेत्रों और वैश्विक व्यपारों का स्थान ले लिया है।

नए रणनीतिक संसाधन के रूप में डेटा

  • आधुनिक तेल के रूप में डेटा: 21वीं सदी का केंद्रीय संसाधन डेटा है, जो नवाचार, वाणिज्य, निगरानी और राजनीतिक प्रभाव को संचालित करता है।
  • परिसंपत्ति के रूप में डिजिटल पदचिह्न: किसी देश का डिजिटल पदचिह्न अब आर्थिक संपदा के बराबर है, जो वैश्विक स्तर पर उसकी स्थिति को आकार देता है।

भारत की डिजिटल त्रिपक्षीय दुविधा

  • डिजिटल प्रभुत्व (अमेरिकी मॉडल): अमेरिका SWIFT सहित वैश्विक सूचना और वित्तीय प्रणालियों को नियंत्रित करता है, जिससे उसे व्यापक स्तर पर डिजिटल लाभ प्राप्त होता है।
    • अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व अमेरिका को संपत्तियां जब्त करने या प्रतिबंध लगाने में सक्षम बनाता है, जिससे रूस और ईरान जैसे देश प्रभावित होते हैं।
    • अमेरिका के दबाव ने पहले भी भारत को इक्वलाइज़ेशन लेवी जैसे उपायों को कम करने पर मजबूर किया है, जिससे ज़्यादा निर्भरता के जोखिम का पता चलता है।
  • डिजिटल आत्मसमर्पण (डिजिटल गुलामी): इंडोनेशिया ने डेटा प्रवाह पर सीमा शुल्क लगाने का अधिकार छोड़ दिया, जिससे उसकी डिजिटल आर्थिक संरचना पर नियंत्रण समाप्त हो गया।
    • मलेशिया ने डिजिटल सेवाओं पर कर न लगाने, अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ भेदभाव न करने तथा यहाँ तक ​​कि स्रोत कोड निरीक्षण अधिकार भी त्यागने पर सहमति व्यक्त की।
    • वैश्विक उदारीकरण को बढ़ावा देने के बावजूद, अमेरिका घरेलू स्तर पर प्रतिबंध लागू करता है, जैसे टिकटॉक(TikTok) को स्थानीय स्तर पर डेटा संग्रहीत करने के लिए मजबूर करना और हुआवेई(Huawei) को ब्लॉक करना।
  • डिजिटल संप्रभुता (भारत का पसंदीदा मार्ग): आर्थिक मूल्य की सुरक्षा और विदेशी प्रभुत्व को रोकने के लिए भारत को डेटा निर्यात पर नियंत्रण बनाए रखना चाहिए।
    • नियामक स्वायत्तता आवश्यक है ताकि भारत बाह्य दबाव के बिना अपने हितों के अनुकूल कानून का निर्माण कर सके।

भारत के लिए चुनौती

  • उच्च निर्यात के बावजूद कम मूल्य प्राप्ति: भारत 224 बिलियन डॉलर का सॉफ्टवेयर निर्यात करता है, लेकिन इसका अधिकांश मूल्य विदेशों में अर्जित होता है, क्योंकि समाधानों का स्वामित्व विदेशी कंपनियों के पास है।
  • स्वदेशी उच्च-मूल्य नवाचार की आवश्यकता: भारत को कोडिंग सेवाओं से आगे बढ़कर स्वामित्व वाले डिजिटल और AI उत्पादों का निर्माण करना होगा जो घरेलू स्तर पर धन का सृजन करने में सक्षम हो।
  • बहिष्करण रणनीति की सीमाएं: भारत अपने लोकतांत्रिक बाजार लोकाचार और गहन डिजिटल एकीकरण के कारण अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को पूरी तरह से अवरुद्ध नहीं कर सकता है।

चीन से सबक

  • घरेलू अंतरिक्ष के लिए महान फ़ायरवॉल: गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियों को बाहर करके, चीन ने अपने घरेलू कम्पनियों को अपने डिजिटल बाजार के लिए सक्षम बनाया।
  • एक संप्रभु टेक स्टैक का निर्माण: चीन ने प्रोसेसर से लेकर क्लाउड सेवाओं तक अपना स्वयं का पारिस्थितिकी तंत्र निर्मित किया है, जिससे पूर्ण डिजिटल आत्मनिर्भरता सुनिश्चित हुई है।
  • आर्थिक विस्तार पर प्रभाव: इस रणनीति ने चीन को 7 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने में मदद की, जिसने राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में 40% का योगदान दिया।

डिजिटल संप्रभुता के लिए सरकारी उपाय

  • डेटा संरक्षण को सुदृढ़ बनाना (DPDPA): डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम डेटा प्रसंस्करण और हस्तांतरण पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए आधार प्रदान करता है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का लाभ उठाना: आधार, UPI और डिजीलॉक जैसे प्लेटफॉर्म भारत को नवाचार और शासन के लिए एक अद्वितीय डिजिटल आधार प्रदान करते हैं।
  • अग्रणी प्रौद्योगिकियों में निवेश: सेमीकंडक्टर, AI और क्वांटम कंप्यूटिंग संबंधी सरकारी मिशन का उद्देश्य दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता स्थापित करना है।

आगे की राह

  • प्रतिबंधात्मक FTA प्रावधानों से बचना: भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि मुक्त व्यापार समझौतों में डिजिटल विनियमन या गैर-भेदभावपूर्ण नीतियों को रोकने वाले खंड शामिल न हों जो भारतीय स्टार्टअप को नुकसान पहुंचाते हैं।
  • संतुलित वैश्विक डिजिटल सहभागिता: भारत को वैश्विक डिजिटल मानदंडों और गठबंधनों के साथ सहभागिता करनी चाहिए, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सहयोग के कारण राष्ट्रीय हितों से समझौता न हो।
  • घरेलू डिजिटल चैंपियन: लक्षित प्रोत्साहन, बाजार पहुंच और सार्वजनिक खरीद सुधार भारतीय तकनीकी कंपनियों को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं, जबकि तकनीकी रूप से उन्नत लेकिन डिजिटल रूप से निर्भर राष्ट्र बनने से बचने के लिए संप्रभु क्षमता का निर्माण आवश्यक है।
  • उच्च-मूल्य घरेलू नवाचार क्षमता: नीतिगत समर्थन से भारत को निम्न-स्तरीय कोड-लेखन से उच्च-मूल्य उत्पाद विकास, IP निर्माण और स्वदेशी AI मॉडल की ओर स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

भारत को नवाचार को बढ़ावा देकर और स्वायत्तता की रक्षा करके डिजिटल संप्रभुता का अनुसरण करना चाहिए, तथा यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि डिजिटलीकरण राष्ट्रीय शक्ति को मजबूत करे।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: परीक्षण कीजिए कि डिजिटल व्यापार समझौते भारत की स्वदेशी डिजिटल क्षमताएँ विकसित करने की क्षमता को कैसे बाधित कर सकते हैं। दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए किन सुधारों की आवश्यकता है?

(10 अंक, 150 शब्द)

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