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सर्वोच्च न्यायालय की हरित शासन नीति और अनिश्चितता के कारण

Lokesh Pal January 09, 2026 05:00 93 0

सन्दर्भ:

पर्यावरण शासन में विनियामक विफलताओं ने सर्वोच्च न्यायालय को परमादेश जारी रखने के लिए बाध्य कर दिया है, जिससे न्यायिक निरीक्षण का विस्तार अर्द्ध-प्रबंधकीय निर्देशों तक हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप विनियामक अनिश्चितता तथा संस्थागत अस्थिरता उत्पन्न हुई है।

संबंधित अवधारणाएँ

  • शक्तियों का पृथक्करण: राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांतों (DPSP) के अनुच्छेद 50 के तहत शक्तियों का पृथक्करण कार्यपालिका (नीति निर्माण और कार्यान्वयन) और न्यायपालिका (कार्यपालिका और विधायी कार्यों की समीक्षा) के लिए अलग-अलग भूमिकाओं की परिकल्पना करता है, लेकिन व्यवहार में यह सीमा तेजी से धुंधली होती जा रही है
  • निरंतर परमादेश: यह एक कानूनी उपकरण है, जिसमें न्यायालय कार्यान्वयन और प्रगति की निगरानी के लिए कई वर्षों तक किसी मामले को कार्यरत (निर्णय नहीं प्रदान करता) रखता है (उदाहरण के लिए, गोदावर्मन वन मामला)।
    • इस प्रथा को शासन व्यवस्था पर न्यायालय की प्रबंधकीय या पर्यवेक्षी भूमिका का आधार माना जाता है।
  • न्यायिक सक्रियता: न्यायिक सक्रियता उन स्थितियों को संदर्भित करती है, जिनमें न्यायालय सरकार को उसके संवैधानिक और विधिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए, प्रेरित करता या उसपर दबाव डालता है।
  • न्यायिक अतिचार: यह तब होता है, जब न्यायालय प्रभावी रूप से उन कार्यों को अपने हाथ में ले लेते हैं, जो कार्यपालिका या विधायिका द्वारा किए जाने चाहिए।

पर्यावरण शासन में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका में बदलाव

  • न्यायिक समीक्षा से प्रबंधकीय शासन की ओर: पिछले एक दशक में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशासनिक निर्णयों की वैधता की समीक्षा करने से हटकर महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय मामलों में विनियामक कार्यों के समान दूरदर्शी निर्देश जारी करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
  • इस बदलाव का कारण: यह बदलाव कई ऐसे मामलों में हुआ है, जिनमें वैधानिक नियामकों ने अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहे, जिसके कारण न्यायालय को प्रबंधकीय भूमिका निभानी पड़ी।
  • समस्या को और भी जटिल बनाना: नियामक की प्रक्रियाओं को सुधारने और पीछे हटने की बजाय, न्यायालय ने अक्सर नियामक की जगह स्वयं को प्रतिस्थापित करना जारी रखा है।
  • निरंतर परमादेश के परिणाम: न्यायालय की कई क्षेत्रों में निरंतर परमादेश के माध्यम से शामिल रहने की प्रवृत्ति का विनियमित पक्षों, सरकारों और जनता पर प्रभाव पड़ता है, और इसलिए इसे नियंत्रित करने की आवश्यकता है।

केस स्टडी विवरण
केस स्टडी 1- पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र (ESZ)
  • प्रारंभिक समान नियम: जून 2022 में, न्यायालय ने निर्देश दिया कि भारत में सभी संरक्षित क्षेत्रों में उनकी सीमाओं से कम-से-कम एक किलोमीटर का एक पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र होना चाहिए।
  • संशोधन: अप्रैल 2023 में, न्यायालय ने इस निर्देश को संशोधित किया और कहा, कि यह नियम वहाँ लागू नहीं होगा जहाँ पर्यावरण मंत्रालय पहले ही ईएसजेड अधिसूचनाएँ जारी कर चुका है।
  • परिवर्तन का कारण: यह संशोधन आंशिक रूप से राज्यों के इस तर्क पर आधारित था, कि पूरे भारत में अलग-अलग स्थलाकृतियों के कारण एक किलोमीटर के नियम को लागू करना कठिन था।
केस स्टडी 2 – दिल्ली-NCR में डीजल वाहन
  • पूर्ण प्रतिबंध: दिसंबर 2015 में, न्यायालय ने दिल्ली-NCR में 2,000 सीसी या उससे अधिक इंजन क्षमता वाली निजी डीजल कारों और स्पोर्ट यूटिलिटी वाहनों के पंजीकरण पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • क्षतिपूर्ति शुल्क से प्रतिस्थापन: अगस्त 2016 तकन्यायालय ने प्रतिबंध हटा दिया और इसे क्षतिपूर्ति हरित उपकर यानी एक्स-शोरूम मूल्य के 1%-2% से प्रतिस्थापित कर दिया।
  • आगामी दिशा- निर्देश: 2025 में, न्यायालय ने शुरू में 10 और 15 वर्ष से अधिक पुराने सभी डीजल तथा पेट्रोल वाहनों के लिए कार्रवाई के खिलाफ व्यापक सुरक्षा प्रदान की, लेकिन बाद में इसे संकुचित करके केवल भारत स्टेज-IV मानक से नीचे के वाहनों पर लागू किया
केस स्टडी 3 – पटाखों पर प्रतिबंध
  • लगभग पूर्ण प्रतिबंध: वायु प्रदूषण संबंधी चिंताओं के कारण न्यायालय ने कई बार NCR में पटाखों पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
  • त्योहारों के दौरान छूट: न्यायालय ने विशिष्ट त्योहारों से संबंधित प्रतिबंधों में भी ढील दी है तथा “ग्रीन क्रैकर्स” जैसी सीमित श्रेणियों की अनुमति दी है।
  • छूट देने का औचित्य: कठोर और शिथिल दोनों चरणों में, न्यायालय ने प्रवर्तन संबंधी बाधाओं तथा सार्वजनिक व्यवस्था की वास्तविकताओं का हवाला दिया

उत्पन्न होने वाली चिंताएँ

संघर्ष – सिद्धांत बनाम अर्थव्यवस्था

  • न्यायिक औचित्य में परिवर्तन: न्यायालय का औचित्य अक्सर कठोर वैधता और व्यावहारिक परिणामों के बीच बदलता रहता है।
  • वनशक्ति बनाम भारत संघ: मई 2025 में, न्यायालय ने फैसला सुनाया कि निर्माण के बाद दी गई पूर्वव्यापी पर्यावरण मंजूरी (निर्माण के बाद दी गई अनुमतियाँ) अवैध हैं। 
    • नवंबर 2025 में, न्यायालय ने अपने पहले के कठोर रुख को पलट दिया।
  • परिवर्तन का कारण: बहुमत के निर्णय में यह चिंता व्यक्त की गई थी, कि पहले के फैसले को लागू करने से चल रही व्यावसायिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न होगी।

विशेषज्ञता संबंधी चुनौतियाँ

  • विशेषज्ञता विवाद का स्रोत बन सकती है: विशेषज्ञता विवाद का मुद्दा बन जाती है, क्योंकि न्यायाधीशों को कानूनी विशेषज्ञों के रूप में प्रशिक्षित किया जाता हैन कि पारिस्थितिकीविदों या तकनीकी विशेषज्ञों के रूप में।
  • अरावली निर्णय का उदाहरण: नवंबर 2020 में अरावली मामले में निर्णय लिया गया, न्यायालय ने एक समिति की सिफारिशों के आधार पर “अरावली पहाड़ियों” की एकीकृत परिभाषा को अपनाया
    • कुछ ही समय के भीतर, न्यायालय ने आदेश पर रोक लगा दी क्योंकि परिभाषा से अनपेक्षित कानूनी परिणाम उत्पन्न हुए थे
    • सभी हितधारकों से पूरी तरह परामर्श किए बिना तदर्थ समितियों पर निर्भर रहने से वैज्ञानिक और कानूनी दोनों प्रकार की त्रुटियां होती हैं।

न्यायालय अनुमोदन प्राधिकारी के रूप में

  • वैधानिक नियामकों को दरकिनार करना: परियोजना के प्रस्तावक और सरकारें परियोजनाओं की जाँच पूरी करने के लिए वैधानिक अधिकारियों (जैसे, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण) के समक्ष अनुमति प्राप्त करने के लिए तेजी से सर्वोच्च न्यायालय का रुख कर रहे हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट से जल्दी संपर्क करने का कारण: सुप्रीम कोर्ट से अनुमोदन या टिप्पणी प्राप्त करने से अंतिम निर्णय की धारणा बनती है, जिससे निचली या विशेष अदालतों द्वारा आगे की जाँच को हतोत्साहित किया जाता है।
  • न्यायिक समीक्षा के लिए खतरा: यह प्रथा निचली अदालतों और विशेष न्यायाधिकरणों में सार्थक न्यायिक समीक्षा को कमजोर करती है
  • नागरिकों के अधिकारों पर प्रभाव: नागरिकों को परियोजनाओं को चुनौती देने का एक प्रभावी अवसर खोना पड़ता है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही अनुमोदन प्रक्रिया को “प्रबंधित” या प्रभावित कर चुका होता है, जिससे बाद में चुनौतियां देना मुश्किल हो जाता है।

आगे की राह

  • राज्य की विनियामक प्रधानता को बहाल करें: पर्यावरण संरक्षण को न्यायालय द्वारा विनियामक संस्थानों के स्थान पर स्वयं को स्थापित करने की बजाय, राज्य को अपने विनियामक कर्तव्यों को प्रभावी ढंग से निभाने के लिए बाध्य करके प्राप्त किया जाना चाहिए।
  • न्यायिक हस्तक्षेप के लिए सीमाएँ: न्यायालय को उन वस्तुनिष्ठ शर्तों को निर्दिष्ट करना चाहिए जिनके तहत वह प्रबंधकीय या पर्यवेक्षी निर्देश जारी करेगा, ताकि न्यायिक आदेशों के माध्यम से नियमित शासन को रोका जा सके।
  • समयबद्ध विनियामक कार्रवाई: न्यायालयों को नियामकों से निर्धारित समयसीमा के भीतर कार्रवाई करने और संबंधित मंत्रालयों से सत्यापित, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा को रिकॉर्ड में रखने की आवश्यकता होनी चाहिए।
  • व्यापक और तत्काल नियमों से बचें: न्यायालय को व्यापक, एक समान निर्देश थोपने से बचना चाहिए और व्यावहारिक या विधिक बाधाओं के आधार पर किसी भी अपवाद को स्पष्ट रूप से उचित ठहराना चाहिए।

निष्कर्ष

एक संयमित और प्रक्रिया-केंद्रित न्यायपालिका विनियामक जवाबदेही को लागू करके, नीतिगत स्थिरता तथा उचित कानूनी चैनलों के माध्यम से पर्यावरणीय हानि को चुनौती देने के नागरिकों के अधिकार की रक्षा करके, पर्यावरण संरक्षण को मजबूत कर सकती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: पर्यावरण संरक्षण में न्यायिक सक्रियता की एक ओर शासन व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए प्रशंसा की गई है, वहीं दूसरी ओर विधिक अनिश्चितता उत्पन्न करने के लिए इसकी आलोचना भी की गई है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पर्यावरण संबंधी मामलों में दिए गए हालिया निर्णयों के संदर्भ में इस विरोधाभास का विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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