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फ्रंट-ऑफ-पैकेजिंग लेबलिंग (Front-of-Packaging Labelling) मुद्दा

Lokesh Pal February 18, 2026 05:00 7 0

संदर्भ:

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) को निर्देश दिया है कि वह ऐसे पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैकेज (FOP) चेतावनी लेबल अनिवार्य करने पर विचार करे, जिनमें चीनी, नमक और संतृप्त वसा की मात्रा अधिक है।

पृष्ठभूमि

  • याचिकाकर्ता: यह कानूनी पहल “3एस और अवर हेल्थ सोसाइटी (3s and Our Health Society)” नामक एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) द्वारा दायर याचिका के माध्यम से शुरू हुई। संगठन ने तर्क दिया कि उपभोक्ताओं को संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) के अंतर्गत “स्वास्थ्य का अधिकार” प्राप्त है।
    • NGO का कहना है कि उपभोक्ताओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वे क्या खा रहे हैं, क्योंकि यह जानकारी उनके स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश: दो न्यायाधीशों की पीठ ने FSSAI को चार सप्ताह के अंदर जवाब देने का आदेश दिया है।

भारत में स्वास्थ्य संकट

  • असंक्रामक रोगों (NCDs) का बढ़ता बोझ: अधिक चीनी, नमक और संतृप्त वसा का सेवन मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों से जुड़ा हुआ है। भारत में जीवनशैली से संबंधित बीमारियाँ महामारी का रूप ले रही हैं, जिसका मुख्य कारण अत्यधिक प्रसंस्कृत (Ultra-Processed) खाद्य पदार्थ हैं।
  • 2023 ICMR-INDIAB अध्ययन के अनुसार:
    • 101 मिलियन भारतीय (11.4%) मधुमेह से पीड़ित हैं।
    • 136 मिलियन लोग प्री-डायबिटीज से ग्रस्त हैं।
    • उच्च रक्तचाप से 35.5% (राष्ट्रीय औसत), पेट की चर्बी से 39.5% और उच्च कोलेस्ट्रॉल से 24% आबादी प्रभावित है।

उद्योग की रणनीतियाँ और “ब्लिस पॉइंट”

  • ब्लिस पॉइंट रणनीति: प्रसंस्कृत खाद्य उद्योग कथित रूप से “ब्लिस पॉइंट” रणनीति अपनाता है, जिसमें नमक और चीनी का ऐसा संतुलित अनुपात तय किया जाता है जो उपभोक्ताओं में लत जैसी आदत पैदा करे जिससे वे बार-बार उत्पाद खरीदें।
  • पोषण संबंधी जानकारी में पारदर्शिता की कमी: कंपनियाँ अक्सर पोषण संबंधी जानकारी पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में लिखती हैं, जिससे उपभोक्ता उसे आसानी से नहीं पढ़ पाते।
  • फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग से संबंधित न्यायिक पहल: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि स्वास्थ्य चेतावनी और प्रमुख पोषण संबंधी जानकारी पैकेट के सामने स्पष्ट और बड़े अक्षरों में प्रदर्शित की जाए, ताकि उपभोक्ता सूचित निर्णय ले सकें।

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) लागू करने संबंधी चुनौतियाँ:

  • संस्थागत निष्क्रियता और देरी: वर्ष 2020 में FSSAI द्वारा फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग मानकों को लागू करने की प्रतिबद्धता के बावजूद, 2026 तक भी प्रभावी नियम लागू नहीं हो पाए हैं, जो प्रशासनिक निष्क्रियता को दर्शाता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने FSSAI की रिपोर्ट की कड़ी आलोचना करते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने में सार्थक प्रगति की कमी पर असंतोष व्यक्त किया है।
  • FSSAI का स्टार रेटिंग प्रस्ताव: FSSAI 1 से 5 स्टार रेटिंग प्रणाली का समर्थन करता है, जो उपभोक्ताओं के लिए चुनाव को सरल बनाने हेतु विद्युत उपकरणों पर ऊर्जा दक्षता लेबल की तरह होगी।
    • हालाँकि, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि स्टार रेटिंग भ्रामक हो सकती है।
      • उदाहरण: फलों का जूस विटामिन की मात्रा के कारण उच्च रेटिंग प्राप्त कर सकता है, जबकि उसमें चीनी की मात्रा बहुत अधिक हो सकती है।
    • चेतावनी-आधारित लेबलिंग की मांग: स्वास्थ्य समूह स्पष्ट चेतावनी लेबल का समर्थन करते हैं, जैसा कि चिली जैसे देशों में उपयोग किया जाता है, जहाँ “चीनी अधिक” या “नमक अधिक” जैसे स्पष्ट संदेश लिखे होते हैं, ताकि उपभोक्ता सूचित निर्णय ले सकें।
    • उद्योग का दबाव और नीतिगत गतिरोध: नियामक देरी का एक कारण अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य कंपनियों की मजबूत लॉबिंग भी है, जो नीति निर्माण को प्रभावित करती है।
      • चिंता व्यक्त की जा रही है कि नियामक संस्थाएँ सार्वजनिक स्वास्थ्य के बजाय उद्योग हितों को प्राथमिकता दे रही हैं।

निष्कर्ष

स्पष्ट फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल उपभोक्ताओं को उपयोगी और कार्यात्मक जानकारी प्रदान करते हैं। इससे ध्यान जीवनशैली संबंधी बीमारियों के उपचार से हटकर उनके रोकथाम पर केंद्रित होता है, जो सूचित आहार विकल्पों के माध्यम से संभव है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: उपभोक्ता सूचना प्रकटीकरण तंत्र, जैसे फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग, किस प्रकार सूचित विकल्प के अधिकार को सुदृढ़ कर सकते हैं?

 (150 शब्द, 10 अंक)

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