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निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता

Lokesh Pal February 25, 2026 05:30 4 0

संदर्भ

विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान कथित मतदाता चोरी और मतदाता सूची में हेरफेर के आरोपों ने भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की विश्वसनीयता पर बहस को पुनर्जीवित कर दिया है।

संवैधानिक स्थिति और प्रमुख विधिक आधार

  • मूल संरचना का सिद्धांत: इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं, अतः संसद इन्हें संशोधित या कमजोर नहीं कर सकती।
  • अनुच्छेद 324: यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्तियों से युक्त एक स्थायी निर्वाचन आयोग की स्थापना करता है, जिससे संविधान निर्माताओं की मंशा के अनुरूप संस्थागत स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।

वर्त्तमान चुनौतियाँ और विवाद

  • मतदाता सूची में हेरफेर: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची की शुचिता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न की हैं, जिसके तहत आरोप हैं कि लगभग 65 लाख मतदाता, विशेषकर अल्पसंख्यक या विपक्ष समर्थक समुदायों से, सूची से हटा दिए गए।
  • नियुक्ति प्रक्रिया पर विवाद: अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में, सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए एक चयन समिति का गठन अनिवार्य किया, जिसमें प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), और विपक्ष के नेता शामिल हों।
  • विधायी अतिक्रमण और कानूनी चुनौती: वर्ष 2023 के एक अधिनियम ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) को सरकार द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री से बदल दिया, जिससे आलोचना हुई कि यह कार्यपालिका के पक्ष में 2–1 बहुमत निर्मित करता है।
    • इस संशोधन को जया ठाकुर बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के लिए सुरक्षा प्रावधान

  • पदच्युति की प्रक्रिया: अनुच्छेद 324(5) के तहत, चुनाव आयुक्त (CEC) को केवल उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
  • पदच्युति के आधार: केवल सिद्ध दुराचार (proven misbehaviour) या अक्षमता (incapacity) के आधार पर।
  • सेवा की शर्तें: चुनाव आयुक्त (CEC) की नियुक्ति के बाद उनकी सेवा की शर्तों में कोई भी बदलाव नहीं किया जा सकता है।
  • प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत: हटाने की प्रक्रिया में उचित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है, जिसमें संसद में प्रस्ताव पर मतदान से पहले सुनवाई का अधिकार और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जानी चाहिए।

CEC को हटाने की महाभियोग-सदृश प्रक्रिया

  • प्रस्ताव की शुरुआत: लोकसभा के कम से कम 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव आवश्यक है जो उच्च मानदंड को दर्शाता है।
  • जाँच की प्रक्रिया: स्पीकर/अध्यक्ष द्वारा स्वीकार किए जाने पर, एक तीन-सदस्यीय जाँच समिति गठित होती है, जिसमें एक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, और एक प्रतिष्ठित विधिविद शामिल होते हैं, जो आरोपों की जाँच करती है।
  • अंतिम संसदीय अनुमोदन: दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है—कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत।

अन्य निर्वाचन आयुक्तों की पदच्युति

  • राष्ट्रपति का अधिकार: अन्य चुनाव आयुक्तों को राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाता है, लेकिन केवल मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की सलाह पर।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की सलाह पर सीमाएँ: विनीत नारायण बनाम भारत संघ, 1997 के अनुसार, CEC स्वयं से इस प्रकार की सलाह नहीं दे सकते।
    • वे केवल तभी राय दे सकते हैं जब राष्ट्रपति विशेष रूप से किसी आयुक्त को हटाने के संबंध में उनसे सलाह मांगे।
  • सुरक्षा की प्रकृति: हालाँकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को CEC जैसा महाभियोग-स्तरीय संरक्षण प्राप्त नहीं है, फिर भी CEC की अनुशंसा की आवश्यकता कार्यपालिका द्वारा मनमाने हटाने के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच प्रदान करती है।

निष्कर्ष

निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता की सुरक्षा के लिए, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित एक सख़्त हटाने की प्रक्रिया आवश्यक है, ताकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को संविधान की बुनियादी संरचना के हिस्से के रूप में बनाए रखा जा सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग के महत्व का विश्लेषण कीजिए। इसकी स्वायत्तता सुनिश्चित करने में संवैधानिक सुरक्षा प्रावधानों तथा सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर चर्चा कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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