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उच्चतर शिक्षा में विद्यार्थियों की अनिवार्य उपस्थिति: कितनी आवश्यक?

Lokesh Pal January 02, 2026 05:30 24 0

सन्दर्भ:

हाल ही में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि विधि के छात्रों को केवल कठोर उपस्थिति आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहने के कारण परीक्षाओं से वंचित नहीं किया जा सकता है, जिससे उच्चतर शिक्षा संबंधी उद्देश्यों पर एक लंबे समय से चली आ रही चर्चा पुनः आरंभ हो गई है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय का महत्त्व

  • शिक्षक नवाचार: खाली कक्षाओं के भय से शिक्षकों को अपने शिक्षण विधियों को उन्नत करने और अधिगम प्रक्रिया को अधिक रुचिकर बनाने हेतु बाध्य होना पड़ेगा।
  • सहकर्मी प्रेरणा: विद्यार्थियों की प्रेरणा सजा के भय से हटकर FOMO (कुछ छूट जाने का डर) में बदल जाएगी, जो सहकर्मियों की रुचि और कक्षा में उनकी सहभागिता से प्रेरित होगी।
  • वास्तविक खोज: यह निर्णय इस बात की पुष्टि करता है, कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य खोज और आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा देना है, न कि केवल सूचना का वितरण करना, जो कि डिजिटल उपकरण पहले से ही कर सकते हैं।
  • शैक्षणिक उद्देश्य की बहाली: निर्णय इस बात की पुष्टि करता है, कि अधिगम प्रक्रियाओं को बाध्यकारी तरीके से लागू नहीं किया जा सकता है

उपस्थिति प्रवर्तन के पीछे शैक्षणिक विफलता

  • कक्षा में सूचना का आदान-प्रदान: जहाँ कक्षाएँ केवल पुराने नोट्स और पूर्वनिर्मित ज्ञान को प्रसारित करती हैं, वहाँ उपस्थिति अक्सर कम होती है। उपस्थिति अधिगम या सहभागिता की बजाय आज्ञापालन की माप है।
  • दबाव बनाम विद्वत्ता: दबाव से न तो बौद्धिक गंभीरता उत्पन्न होती है, और न ही वास्तविक विद्वत्ता।
  • संस्थागत उदासीनता: अनिवार्य उपस्थिति शैक्षणिक विफलता को दूर करने की बजाय उसे छुपा देती है।

पाउलो फ्रेयर – शिक्षा संबंधी मॉडल

  • बैंकिंग मॉडल:अपनी पुस्तक ‘पेडागॉजी ऑफ द ऑप्रेस्ड’ में पाउलो फ्रेयर शिक्षा के बैंकिंग मॉडल की आलोचना करते हैं, जहाँ शिक्षक छात्रों में ज्ञान “एकत्र” करते हैं और उन्हें खाली पात्र की तरह मानते हैं। यह मॉडल अधिगम को रटने तक सीमित कर देता है और प्रश्न पूछने, संवाद तथा आलोचनात्मक चिंतन के विकास को हतोत्साहित करता है।
  • संवादपरक मॉडल: संवादपरक मॉडल में, शिक्षा को संवाद की प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है।
    • शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर चर्चा और प्रश्नों के माध्यम से सत्य की खोज करते हैं।
    • यह दृष्टिकोण आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ाता है और चिंतनशील विचारों को जन्म देता है।

केस स्टडी – चुंबकीय कक्षा (The Magnetic Classroom)

  • इसाया बर्लिन की बौद्धिक शिल्पकारी: सर इसाया बर्लिन के व्याख्यान अपनी सावधानीपूर्वक तैयारी और कथात्मक शिल्पकारी के कारण विद्यार्थियों को मंत्रमुग्ध कर देते थे
  • प्रकृति में वर्ड्सवर्थ को पढ़ना:“टिंटेर्न एबे” को खुले में पढ़ाना, कविता को स्मृति और धारणा पर एक जीवंत प्रतिबिंब में बदल देता है।
    • अच्छे विश्वविद्यालय विद्यार्थियों की परिपक्वता पर भरोसा करते हैं।

भारतीय संदर्भ – हम कहाँ असफल हो रहे हैं?

  • पुराने नोट्स: शिक्षक अक्सर दशकों पुरानी सामग्री को दुहराते हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि जब जानकारी आसानी से ऑनलाइन उपलब्ध है तो विद्यार्थियों को कक्षाओं में क्यों आना चाहिए।
  • स्वायत्तता का हनन: विश्वविद्यालय “बौद्धिक जागीरदार” बन गए हैं, जहाँ असहमति को दबा दिया जाता है और स्वतंत्र चिंतन को हतोत्साहित किया जाता है।
  • नौकरशाही की अधिक भागीदारी: प्रशासनिक अधिकारी शिक्षकों की बजाय पाठ्यक्रम निर्धारित करने लगे हैं, साथ ही अत्यधिक निगरानी भी बरती जा रही है।
  • पितृसत्तात्मक मानसिकता: वयस्क विद्यार्थियों को सोचने-समझने वाले, स्वायत्त व्यक्तियों की बजाय बच्चों या ‘आश्रितों’ की तरह माना जाता है।

निष्कर्ष

दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय ने इस बात की पुष्टि की है, कि उच्चतर शिक्षा आज्ञापालन पर नहीं बल्कि सहभागिता पर विकसित होती है, और संस्थानों से आग्रह किया है कि वे शैक्षणिक उत्कृष्टता तथा अकादमिक स्वतंत्रता को अपनाएँ। जैसा कि सुकरात ने कहा था, कि – “शिक्षा एक लौ को प्रज्वलित करना है न कि किसी बर्तन को भरना।”

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: उच्चतर शिक्षा में उपस्थिति अनिवार्य करने से अक्सर अधिगम मात्र निगरानी में सिमट जाता है, जिससे जिज्ञासा की जगह अनुपालन को प्राथमिकता मिलती है। दिल्ली उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों और पाउलो फ्रेयर के ‘आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र’ के आलोक में, भारतीय विश्वविद्यालयों में शिक्षा के ‘बैंकिंग मॉडल’ के नैतिक तथा शैक्षणिक निहितार्थों पर चर्चा कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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