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भारत-मॉरीशस कर संधि का अवलोकन: टाइगर ग्लोबल बनाम भारतीय राजस्व विभाग

Lokesh Pal January 21, 2026 05:00 21 0

संदर्भ:

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने फ्लिपकार्ट से बाहर निकलने (exit) पर हुए पूँजीगत लाभ पर ‘टाइगर ग्लोबल’ को कर राहत देने से मना कर दिया।

मुख्य बिन्दु:

  • DTAA (दोहरा कराधान परिहार समझौता): दो देशों के मध्य एक समझौता, ताकि एक निवेशक को एक ही आय पर दो बार कर न देना पड़े।
  • टैक्स हेवन (Tax Havens): मॉरीशस जैसे देश, जो शून्य पूँजीगत लाभ कर (zero capital gains tax) की पेशकश करते हैं, जिससे कंपनियाँ भारत में निवेश पर कर को बचाने के लिए वहाँ शेल इकाइयाँ स्थापित करती हैं।
  • कर निवास प्रमाण पत्र (TRC): पहले, मॉरीशस से प्राप्त TRC को निवास का पर्याप्त प्रमाण माना जाता था, जिससे कंपनियों को भारतीय कर संबंधी प्रश्नों से छूट मिल जाती थी।
    • इसे गोल्डन पास (Golden Pass) कहा जाता था, क्योंकि यह DTAA लाभों का दावा करने हेतु पर्याप्त था।
  • ग्रैंडफादरिंग क्लॉज (Grandfathering Clause): एक ग्रैंडफादरिंग क्लॉज पिछले लेनदेन या निवेशों को नए कानूनों या नीतिगत परिवर्तनों से बचाता है।
  • ट्रीटी शॉपिंग (Treaty shopping): यह निवेश को किसी तीसरे देश के माध्यम से रूट करने (परिवर्तित करने) की प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य केवल वहाँ वास्तविक व्यावसायिक संचालन के बिना अनुकूल कर संधि लाभों का प्रयोग करना है।

भारत द्वारा मॉरीशस DTAA की अनुमति

  • 1991 का भुगतान संतुलन संकट: भारत विदेशी मुद्रा की कमी का सामना कर रहा था, परिणामस्वरूप देश को तत्काल विदेशी पूँजी प्रवाह की आवश्यकता थी।
  • नीतिगत प्रतिक्रिया: सरकार ने जानबूझकर भारत-मॉरीशस DTAA को उदार रखने का विकल्प चुना। इसका उद्देश्य भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करना था।
  • निवेश संकेत: इस नीति ने प्रभावी रूप से संदेश दिया, कि “भारत में निवेश करें और हम आपके पूंजीगत लाभ पर कर नहीं लगाएंगे।”
  • परिणाम: यह रणनीति कई वर्षों तक मॉरीशस मार्ग के माध्यम से अरबों डॉलर का विदेशी निवेश आकर्षित करने में सफल रही।

वर्तमान मुद्दा

  • मॉरीशस इकाई के माध्यम से ‘ट्रीटी शॉपिंग’ का उपयोग: टाइगर ग्लोबल (एक अमेरिकी फर्म) ने फ्लिपकार्ट (तब सिंगापुर में मुख्यालय) में निवेश करने के लिए मॉरीशस स्थित एक शेल कंपनी का उपयोग किया।
  • कर प्राधिकरण का आरोप: जब टाइगर ग्लोबल ने वॉलमार्ट को अपने शेयर ₹14,500 करोड़ के लाभ पर बेचे, तो भारतीय कर विभाग ने टैक्स की माँग की, यह तर्क देते हुए कि मॉरीशस इकाई भारतीय करों से बचने के लिए केवल एक ‘शेल’ (shell) थी।
  • विवाद की प्रकृति: विवाद यह था, कि क्या भारत इन निकासों (exits) पर पूंजीगत लाभ कर लगा सकता है, या क्या निवेशक भारत-मॉरीशस कर संधि और ग्रैंडफादरिंग प्रावधानों के तहत संरक्षित था।

टाइगर ग्लोबल के दावे का कानूनी आधार

  • भारत-मॉरीशस DTAA: पिछली संधि के तहत, पूंजीगत लाभ केवल मॉरीशस में कर योग्य थे।
    • चूँकि मॉरीशस पूंजीगत लाभ कर नहीं लगाता था, इसलिए भारत में कोई कर देय नहीं था।
  • कर निवास प्रमाण पत्र (TRC): टाइगर ग्लोबल के पास एक TRC था, जो यह दर्शाता था कि उसका निवेश माध्यम (investment vehicle) मॉरीशस का टैक्स रेजिडेंट था।
    • पूर्व सरकारी नीति संधि लाभों का दावा करने के लिए TRC को पर्याप्त प्रमाण मानती थी।
  • 2016 के संशोधन के तहत ग्रैंडफादरिंग: 2016 में, भारत ने भारत में पूंजीगत लाभ पर कर लगाने के लिए संधि में संशोधन किया, लेकिन 1 अप्रैल, 2017 से पूर्व किए गए निवेशों को छूट दी गई थी।
    • टाइगर ग्लोबल के निवेश 2011 से 2015 के बीच किए गए थे तथा इसलिए उन्हें संरक्षित माना गया था।

हालिया सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय:

  • परिणाम: न्यायालय ने टाइगर ग्लोबल के दावे को खारिज कर दिया, और भारत को पूंजीगत लाभ पर कर लगाने की अनुमति दी।
  • न्यायालय ने कहा, कि यदि आर्थिक वास्तविकता कुछ और दिखाती है, तो केवल कानूनी कागजी कार्रवाई के आधार पर संधि लाभों का दावा नहीं किया जा सकता है।
  • प्रमुख निष्कर्ष: हालाँकि निवेश इकाई मॉरीशस में निगमित (incorporated) थी, लेकिन वास्तविक नियंत्रण और निर्णय शक्ति, जिसे “हेड एंड ब्रेन” (Head and Brain) बताया गया, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित थी। मॉरीशस इकाई को एक कंडुइट (conduit) या साइनबोर्ड व्यवस्था माना गया।

पिछली कर-संधि प्रक्रिया से परिवर्तन

  • सरकारी परिपत्र की अनदेखी: CBDT सर्कुलर नंबर 789 (2000) में कहा गया था, कि TRC संधि लाभों का दावा करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य होगा, और किसी अन्य प्रकार की जाँच की आवश्यकता नहीं होगी।
  • न्यायिक बदलाव: 2003 में, सर्वोच्च न्यायालय ने निवेश के लिए “मॉरीशस रूट” को एक “आवश्यक बुराई” के रूप में बरकरार रखा था, लेकिन हालिया निर्णय कर विभाग का समर्थन करता है, जिससे “विश्वसनीयता का संकट” उत्पन्न होता है।
  • लॉर्ड बिंघम (“विधि के शासन” पर): “कानून सुलभ और पूर्वानुमानित होना चाहिए।”
  • वर्तमान स्थिति: वर्तमान निर्णय अधिकारियों को TRC से परे देखने और आर्थिक वास्तविकता (economic substance) की जाँच करने की अनुमति देता है, जो पहले की निश्चितता-आधारित संधि व्याख्या से परिवर्तन को चिह्नित करता है।
  • कर नियोजन और कर अपवंचन: न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया, कि वह कर नियोजन (tax planning) और कर अपवंचन (tax avoidance) के बीच कैसे रेखा खींचती है।
    • कर नियोजन वैध हो सकता है, यदि वह “कानून के ढाँचे के भीतर” संचालित होता है।
    • लेकिन जब किसी संरचना में जानबूझकर कर भुगतान से बचने के लिए छद्म युक्तियाँ, भ्रामक या अप्रत्यक्ष तरीके शामिल होते हैं, तो यह अवैध और अस्वीकार्य हो जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के निहितार्थ

  • ग्रैंडफादरिंग की विश्वसनीयता: 2017 से पहले के निवेशों के लिए सुरक्षा की अनदेखी करना इस विश्वास को कमजोर करता है, कि नीतिगत परिवर्तन पिछले निवेशों को प्रभावित नहीं करेंगे।
  • निवेशक विश्वास: जब पिछले वादों, परिपत्र और न्यायिक व्याख्याओं को दरकिनार कर दिया जाता है, तो यह दीर्घकालिक निवेशकों के लिए अनिश्चितता उत्पन्न करता है।
  • पूर्व अनुभव के साथ तुलना: यह निर्णय पहले के पूर्वव्यापी कर विवादों से जुड़ी आशंकाओं को पुनः विकसित करता है, जिसने भारत की निवेश प्रणाली को हानि पहुँचाई थी।

निष्कर्ष

हालाँकि यह निर्णय व्यापक जाँच (substance-based scrutiny) के माध्यम से कर-अपवंचन प्रवर्तन को सुदृढ़ करता है, लेकिन यह अंतर्राष्ट्रीय कराधान में पूर्वानुमान, विधिक निश्चितता और सरकारी आश्वासनों की विश्वसनीयता के संबंध में भी चिंताएँ उत्पन्न करता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: ‘सब्सटेंश ओवर फॉर्म’ (substance over form) सिद्धांत के तहत, टाइगर ग्लोबल मामले में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय पर चर्चा कीजिए। यह निर्णय भारत में विधिक निश्चितता और निवेशक विश्वास को किस प्रकार प्रभावित करता है?

(10 अंक, 150 शब्द)

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