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धान-गेहूँ पर अत्यधिक निर्भरता (Paddy–Wheat Fixation)

Lokesh Pal March 05, 2026 05:00 51 0

संदर्भ

हाल ही में नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था के बाहर की फसलों की ओर विविधीकरण करने का आग्रह किया है। इससे यह संकेत मिलता है कि धान और गेहूँ की खेती के लगातार बढ़ते विस्तार को कम करने और अधिक स्थायी फसल प्रणाली को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • स्वतंत्रता के बाद का संकट: स्वतंत्रता के बाद भारत को गंभीर खाद्य संकट का सामना करना पड़ा और उसे अमेरिका के PL-480 कार्यक्रम जैसे आयातों पर निर्भर रहना पड़ा।
  • भूराजनीतिक दबाव: अमेरिका ने खाद्य सहायता का उपयोग भारत पर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों, जैसे वियतनाम युद्ध, के संदर्भ में दबाव बनाने के लिए एक साधन के रूप में किया।
    • यह “शिप-टू-माउथ” (जहाज से सीधे उपभोग तक की स्थिति) वाली निर्भरता हरित क्रांति की आवश्यकता का कारण बनी।
  • सीमित उद्देश्य: खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, सरकार ने अनुसंधान और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लगभग पूरी तरह से धान और गेहूँ पर केंद्रित किया।

समस्या: एकल कृषि पद्धति (Monoculture) और इसके प्रभाव

  • एकल कृषि पद्धति (Monoculture): इन दो फसलों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण किसान प्रत्येक वर्ष वही फसल उगाते हैं, जिससे कई प्रकार के संकट उत्पन्न हुए हैं।
  • विविधीकरण के लिए प्रोत्साहन का अभाव: किसानों को दालों जैसी अन्य फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहन नहीं मिलता, साथ ही धान और गेहूँ का MSP प्रत्येक वर्ष बढ़ता है और इसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।
  • भूमि उपयोग का विस्तार: धान और गेहूँ के अंतर्गत क्षेत्रफल 1960 के दशक में 36 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर आज 80–85 मिलियन हेक्टेयर हो गया है।
  • मृदा का क्षरण: लगातार एकल कृषि पद्धति (Monoculture) से मृदा में विशिष्ट पोषक तत्वों की कमी हो जाती है।
    • किसान इसे सुधारने के लिए अत्यधिक यूरिया का उपयोग करते हैं, जिससे एक दुष्चक्र का निर्माण हो जाता है जिसमें मृदा का स्वास्थ्य कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता।
  • सब्सिडी का वित्तीय बोझ
    • यूरिया सब्सिडी: वर्ष 2010 में ₹63,000 करोड़ से बढ़कर लगभग ₹1,91,000 करोड़ हो गया है, जिससे करदाताओं का पैसा बुनियादी ढाँचे के विकास से हटकर इस क्षेत्र में खर्च हो रहा है।
    • बिजली सब्सिडी: भूजल पंप करने के लिए बिजली सब्सिडी पर लगभग ₹1,00,000 करोड़ प्रति वर्ष खर्च होते हैं।
  • जल संकट: 1 किलोग्राम चावल उगाने के लिए 3,000–5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।
    • केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब और हरियाणा में भूजल स्तर इतना नीचे चला गया है कि कई क्षेत्र अब ‘डार्क ज़ोन’ घोषित हो चुके हैं।
  • कीटनाशक और स्वास्थ्य: एकल कृषि पद्धति कीटों को अनुकूलित होने देती है, जिससे किसान अधिक कीटनाशकों का उपयोग करने को मजबूर होते हैं।
    • अत्यधिक कृषि-रसायनों के उपयोग को पंजाब के किसानों में कैंसर की अधिक घटनाओं से जोड़ा गया है। इसी कारण प्रसिद्ध “कैंसर ट्रेन” (जो मरीजों को इलाज के लिए बीकानेर ले जाती है) अक्सर चर्चा में रहती है।
  • खरीद (Procurement) और अनुसंधान में विद्यमान असंतुलन: पिछले दशक में सरकार ने गेहूँ और धान की खरीद पर ₹20.2 लाख करोड़ खर्च किए, जबकि दालों पर इसका 5% से भी कम (₹93,000 करोड़) खर्च हुआ।
    • साथ ही अधिकांश अनुसंधान एवं विकास (R&D) उच्च उत्पादकता वाली धान और गेहूँ की किस्मों पर केंद्रित रहा, जिससे अन्य फसलें उपेक्षित रह गईं।

फसल विविधीकरण में विद्यमान राजनीतिक और सामाजिक बाधाएँ

  • वोट बैंक राजनीति: सरकारें अक्सर फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने में हिचकती हैं, क्योंकि चुनावी लाभ जल अधिक खपत करने वाली फसलों (जैसे धान और गेहूँ) के लिए उच्च MSP खरीद नीतियों के पक्ष में होते हैं, जिससे पर्यावरणीय रूप से स्थायी विकल्पों का समर्थन करना राजनीतिक रूप से जोखिमपूर्ण हो जाता है।
  • आहार संबंधी प्राथमिकताएँ और उपभोग पैटर्न: पोषण और जलवायु सहनशीलता में बेहतर होने के बावजूद, पारंपरिक मिलेट्स जैसे बाजरा और रागी का उपयोग घट गया है, और गेहूँ की लोकप्रियता बढ़ गई क्योंकि गेहूँ का प्रसंस्करण आसान था और यह PDS के माध्यम से व्यापक रूप से उपलब्ध था।

आगे की राह 

  • फसल विविधीकरण: ज्वार, बाजरा और रागी जैसे न्यूट्री-सीरियल्स को बढ़ावा देना चाहिए, क्योंकि इनमें जल की खपत कम होती है और ये प्रोटीन व आयरन से भरपूर होते हैं।
    • दालों और न्यूट्री-सीरियल्स को बढ़ावा देने से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने में भी मदद मिलती है, जिससे मृदा के लिए प्राकृतिक उर्वरक उपलब्ध होता है।
  • सब्सिडी को तर्कसंगत बनाना: 5–10 वर्षों में MSP और सब्सिडी को धीरे-धीरे संतुलित किया जाए ताकि किसान अपनी फसल प्रणाली में बदलाव कर सकें।
  • वैकल्पिक प्रोत्साहन: दालों, मिलेट्स और तिलहनों के लिए खरीद प्रणाली को मजबूत करके सार्वजनिक समर्थन को स्थायी फसलों की ओर पुनर्निर्देशित किया जाना चाहिए, ताकि किसानों को निश्चित बाजार और आय सुरक्षा प्राप्त हो सके।

निष्कर्ष

अंततः उद्देश्य यह होना चाहिए कि किसानों की आजीविका सुरक्षित रहे, साथ ही धान और गेहूँ पर अत्यधिक निर्भरता से उत्पन्न पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकटों का समाधान किया जा सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न: 

प्रश्न: भारतीय कृषि में “धान–गेहूँ पर अत्यधिक निर्भरता (Paddy-Wheat Fixation)” हरित क्रांति के वरदान से बदलकर एक राजकोषीय और पारिस्थितिकीय बोझ बन गई है। इस फसल प्रणाली के सामाजिक-आर्थिक तथा पर्यावरणीय प्रभावों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और प्रभावी फसल विविधीकरण के लिए नीतिगत उपाय सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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