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संसद और संसदीय मानदंड: एक विश्लेषण

Lokesh Pal February 09, 2026 05:00 5 0

संदर्भ:

संसदीय परंपरा से एक असामान्य विचलन को दर्शाते हुए, लोकसभा ने सुरक्षा चिंताओं और सदस्यों द्वारा अप्रत्याशित आचरण की संभावना का हवाला देते हुए, संसदीय चर्चा के बाद प्रधानमंत्री के उत्तर के बिना ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

संसदीय सत्र की शुरुआत को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक और प्रक्रियात्मक मानदंड

  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 87 यह अनिवार्य करता है, कि भारत के राष्ट्रपति प्रत्येक आम लोकसभा चुनाव के बाद पहले सत्र की शुरुआत में और प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में संसद के दोनों सदनों को संबोधित करेंगे।
  • विशेष अभिभाषण का उद्देश्य: यह अभिभाषण सरकार के दृष्टिकोण, प्राथमिकताओं और नीतिगत उद्देश्यों की रूपरेखा तैयार करता है, जो संसद को सरकार के लक्ष्यों का एक औपचारिक विवरण प्रदान करता है।
  • संसदीय उपकरण के रूप में धन्यवाद प्रस्ताव: अभिभाषण के बाद ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ लाया जाता है, जिससे सदस्यों को सरकार के दावों पर चर्चा और उनकी आलोचनात्मक जाँच करने का अवसर मिलता है।
  • विश्वास परीक्षण के रूप में धन्यवाद प्रस्ताव: धन्यवाद प्रस्ताव का पारित होना सरकार के बहुमत के परीक्षण के रूप में कार्य करता है; इसके पास न होने का अर्थ है – सरकार में विश्वास की कमी और सरकार का इस्तीफा।

धन्यवाद प्रस्ताव चर्चा के निष्कर्ष को नियंत्रित करने वाली परंपरा

  • स्थापित संसदीय अभ्यास: लंबे समय से चली आ रही परंपरा के अनुसार, धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के अंत में प्रधानमंत्री का उत्तर देना अनिवार्य है।
  • उत्तर का जवाबदेही कार्य: यह उत्तर कार्यपालिका को आलोचना का जवाब देने, नीतिगत रुख स्पष्ट करने और विधायिका के समक्ष अपने कार्यों को सही ठहराने की अनुमति देता है।
  • नेतृत्व की जिम्मेदारी: सदन के नेता के रूप में, प्रधानमंत्री का उत्तर संसद के प्रति कैबिनेट के ‘सामूहिक उत्तरदायित्व’ का प्रतीक है।

चर्चा के दौरान उठाए जाने वाले मुद्दे

  • मुद्दों का स्रोत: विपक्ष ने एक पूर्व वरिष्ठ सैन्य अधिकारी द्वारा लिखित सार्वजनिक रूप से उपलब्ध पुस्तक का सहारा लिया।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएँ: कथित तौर पर इस पुस्तक में 2020 के गलवान संघर्ष से जुड़ी घटनाओं को शामिल किया गया था, जिसमें सैनिकों की आवाजाही और तैयारियाँ शामिल थी।
  • रक्षा नीति और भर्ती सुधार: इसमें मूल रूप से प्रस्तावित रक्षा भर्ती मॉडल और अंततः लागू की गई योजना (अग्निपथ) के बीच के अंतर पर भी प्रकाश डाला गया था।
  • अवसर का खंडन: संसदीय नियमों के तहत, पुस्तक का हवाला देने वाले सदस्य को उसे संसद के समक्ष रखकर प्रमाणित करना होता है, तथा उसका उत्तरदायित्व लेना होता है; अनुपालन की तैयारी के बावजूद अनुमति नहीं दी गई।

संसदीय लोकतंत्र के लिए निहितार्थ

  • जवाबदेही में कमी: प्रधानमंत्री के उत्तर वक्तव्य का स्थगन, संसदीय लोकतंत्र के मुख्य विचार-विमर्श तंत्र को कमजोर करता है।
  • एकतरफा विचार-विमर्श: कार्यकारी प्रतिक्रिया के बिना, चर्चा एक वास्तविक आदान-प्रदान की बजाय केवल सरकारी विमर्श बनकर रह जाती है।
  • प्रक्रियात्मक अनियमितता: सामान्यतः, उत्तर के बिना चर्चा को बंद करने के लिए एक औपचारिक प्रक्रियात्मक प्रस्ताव की आवश्यकता होती है, जो इस विषय में अनुपस्थित था।
  • पीठासीन अधिकारी की भूमिका: अध्यक्ष से एक तटस्थ संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करने की अपेक्षा की जाती है, जो निष्पक्षता और अल्पमत के प्रतिनिधित्व की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
  • लोकतांत्रिक परंपराओं पर प्रभाव: संसदीय परंपराएँ लोकतंत्र की स्थापना हेतु अनिवार्य हैं, और उनका कमज़ोर होना एक गंभीर अभाव उत्पन्न कर सकता है।
  • यू.के. के साथ तुलना: यू.के. में, प्रधानमंत्री प्रत्येक सप्ताह विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते हैं, जो इस मामले में जवाबदेही की कमी को उजागर करता है।

निष्कर्ष

चर्चा और उत्तर देने की प्रक्रिया को दरकिनार करके, यह प्रकरण संसदीय जवाबदेही और लोकतांत्रिक मानदंडों के चिंताजनक रूप से कमजोर होने का संकेत देता है। संसदीय परंपराएँ विधायी कार्यों हेतु अत्यंत आवश्यक हैं, तथा उनका कमजोर होना एक गंभीर संस्थागत उदाहरण स्थापित करता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा संसदीय जवाबदेही का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है।” धन्यवाद प्रस्ताव के महत्त्व को बताइए तथा परीक्षण कीजिए, कि संसदीय परंपराओं से विचलन किस प्रकार भारत में कार्यकारी जवाबदेही और संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करता है।

(250 शब्द, 15 अंक)

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