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राज्यों के पुनर्गठन के लिए स्थायी ढाँचा

Lokesh Pal February 12, 2026 05:30 3 0

संदर्भ:

संसद में राज्यों के पुनर्गठन के लिए एक स्थायी ढाँचा स्थापित करने हेतु एक निजी विधेयक (Private Member’s Bill) पेश किया गया।

निजी विधेयक (Private Member’s Bill) के बारे में:

  • परिभाषा: निजी विधेयक एक विधायी प्रस्ताव है जिसे संसद के ऐसे सदस्य द्वारा पेश किया जाता है जो मंत्री नहीं है।
    • यह गैर-मंत्री सांसदों को कानून प्रस्तावित करने और महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दों को उठाने की अनुमति प्रदान करता है, हालाँकि ऐसे विधेयक शायद ही कभी पारित हो पाते हैं।

राज्यों के पुनर्गठन के लिए एक स्थायी ढाँचे की आवश्यकता के कारण

  • राजनीतिक मजबूरी से वैज्ञानिक आधार की ओर: राज्यों को बनाने या विभाजित करने का निर्णय राजनीतिक मजबूरी या संकट-संचालित प्रतिक्रियाओं के बजाय वैज्ञानिक और स्थायी मानदंडों पर आधारित होना चाहिए।
    • तेलंगाना का निर्माण यह दर्शाता है कि राज्य गठन से पहले अक्सर लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन होते हैं, जो एक व्यवस्थित प्रक्रिया की आवश्यकता को उजागर करता है।

नए राज्यों के लिए तर्क में बदलाव

  • भाषाई पहचान (1953): पोट्टी श्रीरामुलु की मृत्यु के बाद, भारत सरकार ने राज्यों के पुनर्गठन की जाँच के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC) की स्थापना की।
    • आयोग ने प्रशासनिक सुविधा, शिक्षा तक पहुँच बढ़ाने और सांस्कृतिक व भाषाई पहचान को संरक्षित करने के लिए राज्यों के भाषाई पुनर्गठन की सिफारिश की।
  • विकास और दक्षता (2000 के दशक): उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों का निर्माण क्षेत्रीय उपेक्षा को दूर करने और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए किया गया, क्योंकि शासन को दूरस्थ और अप्रभावी माना जाता था।

प्रशासनिक दूरी संबंधित समस्या

  • बड़े राज्यों की प्रशासनिक चुनौतियाँ: उत्तर प्रदेश (लगभग 2.4 करोड़ लोग) और महाराष्ट्र व बिहार (लगभग 1.25–1.30 करोड़ लोग प्रत्येक) जैसे राज्य कई यूरोपीय देशों की तुलना में प्रशासनिक क्षेत्रफल में बड़े हैं, जिससे आकार से संबंधित शासन चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
  • नौकरशाही के स्तर: कई प्रशासनिक स्तर नागरिकों की चिंताओं/समस्याओं को राज्य की राजधानी तक पहुँचाने की प्रक्रिया को कमजोर कर देते हैं।
  • शासन का घाटा: उच्च स्तर पर बनाई गई नीतियों को दूरदराज के क्षेत्रों में कार्यान्वयन संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिससे आवंटन और परिणामों के बीच असंतुलन उत्पन्न होता है।
  • प्रशासनिक दक्षता: केरल या हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य अक्सर अपने प्रबंधनीय आकार के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रशासनिक जवाबदेही और त्वरित संचार प्रदर्शित करते हैं।

विधेयक में पुनर्गठन के लिए प्रस्तावित मानदंड

  • प्रतिक्रियाशील लोकलुभावनवाद से बदलाव: विशिष्ट क्षेत्रीय मांगों का समर्थन करने के बजाय, यह प्रस्ताव राज्य पुनर्गठन के लिए एक संरचित और उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया को संस्थागत बनाने का प्रयास करता है, ताकि विरोध या आंदोलन से प्रेरित प्रतिक्रियाशील लोकलुभावनवाद से दूर रहा जा सके।
  • आर्थिक व्यवहार्यता: प्रस्तावित राज्य वित्तीय रूप से सतत होना चाहिए और केंद्रीय अनुदानों पर अत्यधिक निर्भर नहीं होना चाहिए।
  • प्रशासनिक दक्षता: पुनर्गठन से बेहतर शासन, तीव्र सेवा वितरण और प्रभावी न्याय प्रशासन सुनिश्चित होना चाहिए।
  • राष्ट्रीय एकता: संघीय ढाँचा अक्षुण्ण रहना चाहिए, और राज्य पुनर्गठन को राष्ट्रीय लक्ष्यों को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करना चाहिए।

निष्कर्ष

राज्य पुनर्गठन केवल एक क्षेत्रीय प्रयोग नहीं है, बल्कि यह संघीय ढाँचे के भीतर विद्यमान शासन, राजकोषीय क्षमता और दीर्घकालिक विकास को बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया एक संरचनात्मक सुधार है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: राज्यों के पुनर्गठन के लिए अस्थायी राजनीतिक निर्णयों के बजाय एक स्थायी, वस्तुनिष्ठ राष्ट्रीय ढाँचे की आवश्यकता का मूल्यांकन करें। उपयुक्त सुधार सुझाएँ।

(15 अंक, 250 शब्द)

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