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मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने का प्रस्ताव

Lokesh Pal April 01, 2026 05:30 27 0

संदर्भ:

विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के खिलाफ उन्हें हटाने का प्रस्ताव पेश किया है।

पृष्ठभूमि:

  • चुनाव कार्यक्रम की घोषणा: 15 मार्च, 2026 को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ने असम, केरल, पुदुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की, जिससे नियमित चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई।
  • विपक्ष द्वारा हटाने का नोटिस: घोषणा के बाद, 193 विपक्षी सांसदों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की माँग करते हुए एक नोटिस प्रस्तुत किया।
  • ‘महाभियोग’ शब्द का प्रयोग: हालाँकि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत CEC के लिए केवल ‘पदच्युति’ का प्रावधान है, लेकिन राजनीतिक चर्चा और मीडिया ने चुनौती की गंभीरता को व्यक्त करने के लिए व्यापक रूप से ‘महाभियोग’ शब्द का उपयोग किया।

संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 324 और CEC को उनके पद से हटाना

  • अनुच्छेद 324 (निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ): संसद, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के कार्यालयों के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण की शक्ति भारत के निर्वाचन आयोग में निहित करता है।
  • अनुच्छेद 324(5) (मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाना):
    • प्रक्रिया: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के समान।
    • आधार: सिद्ध कदाचार या अक्षमता।
    • नोटिस की आवश्यकता: लोकसभा के 100 सांसद या राज्यसभा के 50 सांसद।
    • मतदान: संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।

CEC के खिलाफ लगाए गए मुख्य आरोप:

  • पक्षपातपूर्ण आचरण: आरोप है कि निर्वाचन आयोग ने पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण तरीके से कार्य किया, चुनावी फैसलों में विपक्ष पर सत्ताधारी दल को तरजीह दी।
  • न्याय में बाधा: दावे हैं, कि CEC ने कथित तौर पर चुनावी कदाचार या धोखाधड़ी के मामलों की जाँच को बाधित किया।
  • बड़े पैमाने पर मताधिकार का हनन: सबसे गंभीर आरोप मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) से संबंधित है, जिसके बारे में आलोचकों का तर्क है कि इससे पात्र मतदाताओं को बाहर कर दिया गया तथा नागरिकों के मतदान अधिकारों का हनन हुआ।

‘किसी की जीत नहीं’ की रणनीति:

  • सांकेतिक कदम: विपक्ष ने यह जानते हुए भी पदच्युति का प्रस्ताव पेश किया, कि संसद में इसके पारित होने की संभावना कम है।
  • उद्देश्य निर्धारित करना: इस कदम ने निर्वाचन आयोग की तटस्थता के बारे में चिंताओं की ओर जनता और मीडिया का ध्यान आकर्षित किया।
  • राजनीतिक संकेत: इसने चुनावी अखंडता पर सवाल उठाने और जवाबदेही की माँग करने के उपकरण के रूप में कार्य किया।
  • संस्थागत चिंता: यह विवाद निर्वाचन आयोग में जनता के विश्वास के व्यापक क्षरण को दर्शाता है, जिसे कभी चुनावी विश्वसनीयता का बेंचमार्क माना जाता था।

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और AI पर विवाद:

  • AI-आधारित रोल क्लीनिंग: निर्वाचन आयोग ने ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के दौरान मतदाता सूची में त्रुटियों और विसंगतियों का पता लगाने के लिए एक AI टूल का उपयोग किया।
  • बड़े पैमाने पर मतदाता जाँच: पश्चिम बंगाल में, लगभग 60 लाख मतदाताओं (लगभग 10% मतदाता) को न्यायनिर्णयन के तहत रखा गया, जिससे उनकी मतदान पात्रता के बारे में अनिश्चितता उत्पन्न हुई।
  • राजनीतिक और विधिक चुनौती: यह मुद्दा तब बढ़ गया, जब राज्य सरकार ने प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।
  • प्रशासनिक परिणाम: कार्यान्वयन ने जमीन पर विरोध और तनाव पैदा किया, जिससे तकनीक-आधारित मतदाता सूची प्रबंधन पर चिंताएँ उजागर हुईं।

न्यायिक हस्तक्षेप और संस्थागत प्रभाव:

  • असाधारण न्यायिक निरीक्षण: सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव प्रक्रिया के पहलुओं की निगरानी करने और निष्पक्षता की रक्षा के लिए, अल्प सूचना पर लगभग 500 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया।
  • चुनावी विश्वसनीयता बहाल करना: हस्तक्षेप का उद्देश्य पारदर्शिता सुनिश्चित करना, तथा चुनाव के संचालन में विश्वास बनाए रखना था।

निष्कर्ष

यह प्रकरण निर्वाचन आयोग में विश्वास के गहन क्षरण को दर्शाता है, जिससे भारतीय लोकतंत्र के पास एक ऐसा चुनावी निकाय रह गया है जिसकी तटस्थता पर राजनीतिक स्पेक्ट्रम और मतदाताओं के एक बड़े वर्ग द्वारा खुले तौर पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ प्रस्तावित महाभियोग प्रस्ताव संस्थागत जवाबदेही और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संबंध में चिंताएँ उत्पन्न करता है। भारत में निर्वाचन आयुक्तों को हटाने से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों एवं चुनौतियों की चर्चा कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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