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Lokesh Pal
January 03, 2026 05:15
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दिल्ली विश्वविद्यालय में एक वरिष्ठ प्रोफेसर को एक छात्र द्वारा नस्लीय गाली देकर परेशान करने की घटना इस बात को उजागर करती है कि कैसे नस्लवाद को “हास्यजनक” या “कूल” के रूप में सामान्य बना गया है।
भारत का “विविधता में एकता” का आदर्श वास्तविक जीवन में भी परिलक्षित होना चाहिए। यदि नागरिक असुरक्षित या भेदभावग्रस्त महसूस करेगें, तो हमारा राष्ट्र निर्माण का कार्य अधूरा रह जाता है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:प्रश्न: शैक्षणिक संस्थानों में ‘अनौपचारिक नस्लवाद’ का सामान्यीकरण केवल व्यवहार संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि संस्थागत नैतिकता की विफलता है। बेजबरुआ समिति की सिफारिशों के आलोक में, चर्चा कीजिए कि शैक्षणिक संस्थान और नागरिक समाज पूर्वोत्तर के साथ भावनात्मक एकीकरण की खाई को कैसे कम कर सकते हैं। (15 अंक, 250 शब्द) |
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