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भारत में बढ़ता वायु प्रदूषण : एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या

Lokesh Pal April 03, 2025 05:15 10 0

संदर्भ:

भारत में वायु प्रदूषण एक गंभीर संकट बना हुआ है तथा भारतीय महानगर वैश्विक  प्रदूषण रैंकिंग में शीर्ष पर हैं। 

भारत में वायु प्रदूषण संकट

  • सतत महामारी: भारत में वायु प्रदूषण केवल एक मौसमी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सतत, मूक महामारी है जो वर्ष भर स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
  • प्रदूषण का प्रभाव: अस्पताल श्वसन रोगियों से भर गए हैं, स्कूलों को बंद करना पड़ रहा है, और शहर धुंध की परतों में अदृश्य हो गए हैं
  • रैंकिंग: भारतीय महानगर नियमित रूप से वैश्विक प्रदूषण रैंकिंग में शीर्ष पर रहते हैं, जो इस समस्या की गंभीर प्रकृति को दर्शाता है।
  • राष्ट्रीय प्रतिक्रियाराष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP)भारत VIप्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कोयला-जलाने वाले उद्योगों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के प्रयास जैसी पहलें प्रगति को दर्शाती हैं।
  • खंडित प्रतिक्रिया: हालाँकि, राष्ट्रीय प्रतिक्रिया खंडित और धीमी गति से आगे बढ़ रही है। सार्थक परिवर्तन के लिए मज़बूत संरेखण और तेजी से क्रियान्वयन आवश्यक है।

वायु प्रदूषण से निपटने संबंधी चुनौतियाँ

  • संरचनात्मक चुनौती: वायु प्रदूषण को प्रायः एक तकनीकी मुद्दा माना जाता है, लेकिन यह मूल रूप से एक संरचनात्मक चुनौती है, जो प्रशासन क्षमता, जनसांख्यिकीय दबाव, सामाजिक-आर्थिक असमानता, व्यवहार संबंधी मानदंडों  और  दृढ़ आर्थिक प्रणालियों जैसे कारकों से प्रभावित होती है।
  • हितधारकों की भूमिका: वायु गुणवत्ता के निदान में वैज्ञानिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन स्थायी समाधान नगरपालिका अधिकारियों, योजनाकारों, इंजीनियरों और सामुदायिक नेताओं पर निर्भर करता है, जो ग्राउंड लेवल पर कार्य करते हैं।
  • खराब बजट और बुनियादी ढाँचा: इन हितधारकों को खराब बजटपुराने बुनियादी ढाँचे और प्रतिस्पर्धी स्थानीय मांगों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो प्रभावी कार्रवाई में बाधा डालते हैं।
  • महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य: भारत का लक्ष्य 2026 तक PM2.5 के स्तर को 2017 के स्तर से 40% तक कम करना है। हालाँकि यह लक्ष्य महत्त्वाकांक्षी और आवश्यक है, लेकिन अगर इसमें जमीनी हकीकत को ध्यान में नहीं रखा गया तो यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा।
  • परिवहन समस्या: प्रदूषण के लिए सिर्फ़ वाहनों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है। इसका प्रभाव सड़क पर चलने वाले वाहनों के प्रकार, उनके द्वारा प्रयोग किए जाने वाले ईंधन, उनकी आयु, उनके द्वारा तय की जाने वाली दूरी और यातायात की स्थिति जैसे कारकों पर निर्भर करता है। 
    • इन पहलुओं पर विचार किए बिना, स्थानीय सरकारों के लिए यथार्थवादी और प्रभावी उत्सर्जन-कमी रणनीति विकसित करना मुश्किल है।
  • निम्न बजट: भारत का एनसीएपी बजट चीन के निवेश का 1% से भी कम है, लेकिन जब इसे संबद्ध कार्यक्रमों, जैसे- 
    • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) (₹18,128 करोड़)
    • फेम II (₹10,795 करोड़)
    • स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (₹1.4 लाख करोड़)
    • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) (₹11,542 करोड़), वायु गुणवत्ता वित्तपोषण का एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र बनाता है, कई उत्सर्जन स्रोतों को संबोधित करता है और भारत की स्वच्छ वायु रणनीति को मज़बूत करता है।
  • निधियों का कम उपयोग: 2019 और 2023 के बीच, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत जारी की गई निधियों का केवल 60% ही उपयोग किया गया। यह संस्थागत अव्यवस्था को प्रदर्शित करता है
  • वायु गुणवत्ता को नगरपालिका के मुख्य कार्य की बजाय एक समानांतर चिंता का विषय माना जाता है।
  • उच्च तकनीक समाधानों पर अत्यधिक निर्भरता: जैसे-जैसे भारत वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए अधिक डिजिटल उपकरणों को अपना रहा है, वैसे-वैसे “पश्चिमी जाल” में फंसने का खतरा है – उच्च तकनीकशहर-केंद्रित डेटा और समाधानों पर अत्यधिक निर्भरता, जो बुनियादी प्रदूषण स्रोतों को नजरअंदाज करती है।
  • अपर्याप्त समाधान: स्मॉग टावरवास्तविक समय आवंटन और एआई डैशबोर्ड जैसी प्रौद्योगिकियाँ नवीन प्रतीत हो सकती हैं, लेकिन अगर बायोमास जलाना, पुरानी औद्योगिक प्रक्रियाएँ और प्रदूषणकारी वाहन जैसे मुद्दे अनियंत्रित रहते हैं, तो वे बहुत कम मूल्य प्रदान करती हैं।
  • अभिजात वर्ग का कब्ज़ा: अभिजात वर्ग के कब्ज़े का जोखिम बहुत ज़्यादा है। शहरी केंद्रों को उन्नत तकनीकें मिल सकती हैं, जबकि ग्रामीण और अनौपचारिक क्षेत्र – जो उत्सर्जन के एक बड़े हिस्से के लिए उत्तरदायी हैं- उपेक्षित रह सकते हैं।
  • लक्ष्य में परिवर्तन: उच्च तकनीक समाधानों पर ध्यान केंद्रित करने से संरचनात्मक सुधारों से ध्यान कम  हो सकता है। यदि स्थानीय एजेंसियों के पास सार्थक परिवर्तनों को लागू करने के लिए अधिकार या संसाधनों की कमी है, तो अधिक डेटा का अर्थ अधिक कार्रवाई नहीं है।

NCAP की चुनौतियाँ

  • निधि आवंटन से संबंधित समस्याएँराष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) को इस बात में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, कि निधि का आवंटन कैसे किया जाए और प्रगति को कैसे मापा जाए।
  • वायु गुणवत्ता पर निर्भरता: यह परिवेशी वायु गुणवत्ता डेटा पर बहुत अधिक निर्भर करता है, जो मौसम और भूगोल से प्रभावित होता है, जिससे अल्पकालिक सुधारों को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।
    • उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और अपशिष्ट-जलाने पर नियंत्रण जैसी पहलों ने कुछ क्षेत्रों में उत्सर्जन को कम किया है, लेकिन ये सुधार हमेशा प्रदूषण आकलन में दिखाई नहीं देते हैं, जिससे ठहराव की भ्रामक भावना उत्पन्न होती है

वैश्विक उदाहरण

  • चीन: चीन ने प्रदूषण कम करने के लिए कोयला संयंत्र बंद कर दिए।
  • ब्राज़ील: ब्राज़ील ने समुदाय-नेतृत्व वाली अपशिष्ट प्रणाली लागू की।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: कैलिफोर्निया ने प्रदूषण से प्राप्त राजस्व को गरीब समुदायों में पुनर्निवेशित किया।
  • लंदन: लंदन ने उन्नत वायु गुणवत्ता सेंसर लगाने से पहले कोयले के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया।

आवश्यक समाधान एवं उपाय

  • गतिविधि-आधारित मीट्रिक्स: गतिविधि-आधारित मीट्रिक्स (जैसे- प्रतिस्थापित भट्ठी या डीजल बसों की संख्या) में परिवर्तन से प्रभाव की स्पष्ट छवि सामने आएगी और जवाबदेही मज़बूत होगी
  • क्षमता निर्माण: जमीनी स्तर (ग्राउंड लेवल) के कार्यकर्ताओं की क्षमता को मज़बूत करना और उनके अधिदेशों को वायु गुणवत्ता लक्ष्यों के साथ संरेखित करना निरंतर परिवर्तन के लिए आवश्यक है
  • डेटा को पुनः संरेखित करना: स्थानीय सरकारों को उत्सर्जन उत्पन्न करने वाली गतिविधियों पर उच्च-रिज़ॉल्यूशन, ओपन-सोर्स डेटा तक पहुँच की आवश्यकता है, जैसे:
    • वे क्षेत्र जहाँ अपशिष्ट जलाया जाता है
    • ठोस ईंधन का उपयोग करने वाले लोग।
    • विनिर्माण वाले स्थान।
    • भारी यातायात वाली सड़कें।
    • इस डेटा के बिना वायु प्रदूषण एक अमूर्त मुद्दा बना रहेगा, जो दैनिक शासन से कटा हुआ होगा, जिससे इसे प्रभावी ढंग से संबोधित करना कठिन हो जाएगा।
  • डेटा-संचालित दृष्टिकोण: 
    • चरण-I: विशिष्ट क्षेत्रों में सबसे बड़े प्रदूषण स्रोतों की पहचान करने के लिए स्थानीय उत्सर्जन प्रोफाइल बनाएँ।
    • चरण II: चरण I में एकत्रित आँकड़ों के आधार पर वित्तपोषण को सीधे लक्षित कार्यों से जोड़ना।
    • चरण IIIवास्तविक प्रगति को मापने के लिए केवल प्रदूषण सांद्रता ही नहीं, बल्कि उत्सर्जन में कमी पर भी नज़र रखना ।
  • दृष्टिकोण में परिवर्तन: यह दृष्टिकोण निष्क्रिय निगरानी से सक्रिय प्रबंधन की ओर स्थानांतरित होता है, जिससे जमीनी स्तर पर सार्थक परिवर्तन सुनिश्चित होता है।
  • मूलभूत मुद्दों पर ध्यान देना: लंदन और लॉस एंजिल्स जैसे शहरों में दशकों के व्यवस्थित सुधार के बाद ही इन उन्नत तकनीकों को प्रस्तुत किया गया। भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए, कि वह अपनी रणनीतियों को सही ढंग से क्रमबद्ध करे और सबसे पहले मूलभूत मुद्दों पर ध्यान दे।
  • स्केलेबल मॉडल: शैक्षणिक अनुसंधान और दीर्घकालिक नवाचार मूल्यवान हैं, लेकिन तत्काल प्रगति के लिए  समाधान-केंद्रित कार्यान्वयन महत्त्वपूर्ण है।
    • नीति निर्माताओं को अल्पकालिक, मापनीय मॉडलों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जो जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन योग्य हों तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत भविष्य में नवाचार की तैयारी करते हुए अभी कार्य कर सके।
  • पृथक वित्तपोषण: भारत को पृथक वित्तपोषण प्रणाली निर्धारित करनी होगी:
    • एक, दीर्घकालिक नवाचार को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान हेतु।
    • एक, तत्काल, जमीनी स्तर पर हस्तक्षेप के लिए, जो प्रदूषण संबंधी गंभीर मुद्दों का समाधान करता है।

निष्कर्ष

भारत को एक स्वच्छ वायु रणनीति बनानी चाहिए, जो उसके अद्वितीय संदर्भ और प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करे तथा आधारभूत मुद्दों और अनुरूप समाधानों पर ध्यान केंद्रित करे। साझेदारी निर्मित करके तथा संघवाद को अपनाकर, भारत अपने सभी नागरिकों के लिए स्वच्छ वायु के अधिकार को सुरक्षित कर सकता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

भारत का वायु प्रदूषण संकट पर्यावरण क्षरण से कहीं अधिक गहरे संरचनात्मक मुद्दों को दर्शाता है। राष्ट्रीय स्तर पर वायु प्रदूषण से प्रभावी तरीके से निपटने में सामाजिक-आर्थिक और शासन-संबंधी चुनौतियों की जाँच कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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