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पक्ष लेना: प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा

Lokesh Pal February 27, 2026 05:30 8 0

संदर्भ

गाज़ा संघर्ष और इज़राइल की वैश्विक आलोचना के बीच प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत किया। इससे यह चिंता उत्पन्न हुई है कि क्या भारत अपनी पारंपरिक संतुलित इज़राइल–फिलिस्तीन नीति से पीछे हट रहा है।

ऐतिहासिक संदर्भ और डी-हाइफ़नेशन( De-hyphenation)

  • नीति में बदलाव: परंपरागत रूप से भारत ने फिलिस्तीनी मुद्दे के साथ मजबूत एकजुटता कायम रखी है और वर्ष 1992 में ही इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए।
  • डी-हाइफ़नेशन (De-hyphenation): हाल के वर्षों में भारत ने डी-हाइफ़नेशन की नीति अपनाई, अर्थात वह इज़राइल और फिलिस्तीन के साथ अपने संबंधों को स्वतंत्र रूप से संचालित करता है, न कि उन्हें आपस में जोड़कर।
  • पूर्व उपलब्धियाँ: वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री मोदी इज़राइल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने।
    • हालाँकि उन्होंने उस यात्रा के दौरान फिलिस्तीन का दौरा नहीं किया, परंतु बाद में वहाँ जाकर भारत की कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।

वर्ष 2026 की यात्रा और कूटनीतिक पहुँच

  • इज़राइल की रुचि: यह यात्रा एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय पहल थी, जिसे इज़राइल ने विशेष रूप से आगे बढ़ाया।
  • संबंधों में उन्नयन: दोनों देशों ने एक विशेष रणनीतिक साझेदारी को औपचारिक रूप दिया, जो पारंपरिक सहयोग से परे द्विपक्षीय संबंधों के गुणात्मक उन्नयन का संकेत देता है।
  • मुख्य समझौते: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि, संस्कृति, शिक्षा और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों सहित विभिन्न क्षेत्रों में 15 से अधिक समझौता ज्ञापन (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए।
  • श्रम सहयोग: इज़राइल में युद्धकालीन श्रमिक कमी को पूरा करने के लिए, भारत ने पांच वर्षों में 5,000 भारतीय श्रमिकों के परिनियोजन की सुविधा प्रदान करने पर सहमति दी, जो आर्थिक कूटनीति को विदेश रोजगार सृजन के साथ जोड़ती है।

भू-राजनीतिक संदर्भ और रणनीतिक निहितार्थ

  • इज़राइल का अंतरराष्ट्रीय अलगाव: यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब गाज़ा में अत्यधिक संख्या में नागरिक हताहतों (72,000 से अधिक मौतें) और वेस्ट बैंक में बस्तियों के विस्तार को लेकर इज़राइल की वैश्विक आलोचना बढ़ रही है।
    • परंपरागत यूरोपीय साझेदारों जैसे जर्मनी, फ्रांस और यू.के. ने भी चिंता व्यक्त की है।
  • नेतन्याहू पर घरेलू दबाव: इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भ्रष्टाचार के आरोपों, अक्टूबर 2023 की सुरक्षा चूकों की जाँच और आगामी चुनावों के दबाव का सामना कर रहे हैं।
    • यह दौरा कूटनीतिक अलगाव की धारणा को कम करने में मदद करता है और उनके घरेलू स्थिति को मजबूत करता है।

“पक्ष लेने” संबंधी बहस

  • कनेसेट (Knesset) में भाषण: प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी नेतृत्व वाली गाज़ा शांति पहल के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से दो-राष्ट्र समाधान का उल्लेख किया।
  • चयनात्मक प्रमुखता: उन्होंने अक्टूबर 2023 के हमास हमले की निंदा की, किंतु गाज़ा में बड़े पैमाने पर नागरिक हताहतों का उल्लेख नहीं किया।
  • निष्पक्षता पर प्रश्न: इससे यह आशंका उत्पन्न हुई कि क्या भारत की पारंपरिक संतुलित नीति इज़राइल की ओर झुक रही है।
    • एक कथित नीति परिवर्तन अरब देशों के साथ संबंधों को प्रभावित कर सकता है, जो ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय प्रवासियों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

रणनीतिक ढाँचे

  • पहलों को पुनर्जीवित करना: इस दौरे के दौरान, पीएम मोदी ने दो प्रमुख पहलों के प्रति भारत की गंभीर प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की, जो युद्ध के कारण धीमी पड़ गई थीं:
    • I2U2: भारत, इज़राइल, अमेरिका और UAE के बीच साझेदारी, जो पश्चिम एशिया में आर्थिक और प्रौद्योगिकीय सहयोग पर केंद्रित है।
    • IMEC (भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा): IMEC एक प्रस्तावित कनेक्टिविटी कॉरिडोर है, जो रेल, बंदरगाह, ऊर्जा और डिजिटल अवसंरचना के माध्यम से भारत को मध्य पूर्व होते हुए यूरोप से जोड़ता है, ताकि व्यापार और रणनीतिक एकीकरण को बढ़ावा मिले।

निष्कर्ष

यद्यपि इज़राइल के साथ घनिष्ठ संबंध भारत के सुरक्षा और प्रौद्योगिकी हितों को बढ़ावा देता हैं, फिर भी भारत को दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करते हुए तथा मजबूत अरब साझेदारियों को बनाए रखते हुए अपनी संतुलित पश्चिम एशिया नीति को संरक्षित रखना आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: पश्चिम एशिया में भारत की विदेश नीति रणनीतिक साझेदारियों और ऐतिहासिक प्रतिबद्धताओं के सावधानीपूर्वक संतुलन को दर्शाती है। भारत–इज़राइल संबंधों के संदर्भ में परीक्षण कीजिए।

 (10 अंक, 150 शब्द)

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