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पाकिस्तान की निरंतर शत्रुता के पीछे का आर्थिक तर्क

Lokesh Pal March 20, 2026 05:15 10 0

संदर्भ

पाकिस्तान सेना का “मिलिट्री इंक.” (Military Inc.) के रूप में विकास—एक व्यावसायिक-सैन्य जटिल संरचना—यह दर्शाता है कि भारत के साथ संघर्ष और शत्रुता बनाए रखने में सेना के आर्थिक और संस्थागत हित निहित हैं।

पाकिस्तानी सेना और शांति के मार्ग में संरचनात्मक बाधा

  • स्वायत्त वित्तीय संरचना: पाकिस्तानी सेना एक स्व-वित्तपोषित इकाई के रूप में कार्य करती है, जो प्रभावी संसदीय निगरानी और जवाबदेही के दायरे से बाहर संचालित होती है।
  • स्वतंत्र आर्थिक साम्राज्य: पारंपरिक सेनाओं के विपरीत, जो राज्य के बजट पर निर्भर होती हैं, पाकिस्तानी सेना ने फौजी, शाहीन, बहरिया और आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट जैसी कल्याणकारी संस्थाओं के माध्यम से एक विशाल आर्थिक नेटवर्क विकसित किया है।

व्यापक व्यावसायिक हित

  • विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक उपस्थिति: पाकिस्तानी सेना का वित्त, उद्योग, सेवाओं, खुदरा और रियल एस्टेट में गहरा आर्थिक प्रभाव है, जिससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर उसका असमान नियंत्रण स्थापित हो गया है।
  • वित्त और सेवाएँ: यह अस्करी बैंक (Askari Bank), बीमा कंपनियों और कई विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों का संचालन करती है।
  • उद्योग और खुदरा: यह फौजी सीरियल्स और फौजी सीमेंट जैसे प्रमुख व्यावसायिक उपक्रमों का भी स्वामित्व रखती है, तथा कैंटीन स्टोर्स सिस्टम के माध्यम से एक बड़े खुदरा नेटवर्क का संचालन करती है।
  • रियल एस्टेट में प्रभुत्व: सेना अक्सर बहुत कम कीमत पर भूमि प्राप्त करती है और उसे सेवानिवृत्त अधिकारियों को भारी लाभ पर बेचती है, तथा इन लाभों पर कर भी नहीं लगता।
  • निहितार्थ: इस प्रकार की व्यापक व्यावसायिक भागीदारी आर्थिक शक्ति को मजबूत करती है, बाजार प्रतिस्पर्धा को विकृत करती है और नागरिक संस्थाओं पर सैन्य वर्चस्व को बढ़ावा देती है।

“स्थायी शत्रु” की आवश्यकता

  • शत्रुता की संरचनात्मक आवश्यकता: पाकिस्तानी सेना का आर्थिक और संस्थागत प्रभुत्व बाहरी खतरे की निरंतर कथा बनाए रखने पर निर्भर करता है, विशेष रूप से भारत से संबंधित।
  • संसाधनों का औचित्य: शांति की स्थिति उच्च रक्षा व्यय पर सार्वजनिक जाँच को आमंत्रित करेगी और बैंकिंग तथा उद्योग जैसे वाणिज्यिक कार्यों में सेना की भागीदारी पर प्रश्न उठाएगी।
  • उच्च वर्ग का अस्तित्व: निरंतर खतरे की धारणा सेना के राज्य पर नियंत्रण को वैध ठहराती है और उसके शीर्ष नेतृत्व के विशेषाधिकारों तथा प्रभाव को बनाए रखती है।

लोकतंत्र का दमन

  • सैन्य प्रधानता: सेना शासन और संसाधनों पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए नागरिक सत्ता को सीमित करती है।
  • लोकतंत्र एक खतरा: एक अधिक सशक्त लोकतांत्रिक प्रणाली उसके आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण को चुनौती देगी।
  • संघर्ष एक उपकरण: निरंतर शत्रुता का उपयोग सैन्य प्रभुत्व को उचित ठहराने और लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण को रोकने के लिए किया जाता है।

वित्तपोषण की उत्पत्ति – निर्भरता का जाल

  • विदेशी सहायता एक पूँजी आधार: पाकिस्तानी सेना का आर्थिक साम्राज्य मुख्यतः बाह्य वित्तपोषण, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका से प्राप्त सहायता, के माध्यम से निर्मित हुआ है।
  • शीत युद्ध काल (1979): सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान अमेरिका की सहायता ने सैन्य को रणनीतिक समर्थन के नाम पर अपने संसाधनों का विस्तार करने में सक्षम बनाया।
  • 9/11 के बाद का चरण (2001): आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के दौरान वित्तीय प्रवाह में हुई वृद्धि ने सैन्य के आर्थिक उपक्रमों को और मजबूत किया।
    • विदेशी सहायता पर निर्भरता ने सैन्य प्रभुत्व को और मजबूत किया तथा वाणिज्यिक उपक्रमों में धन के प्रवाह को मोड़ने में सक्षम बनाया।
  • विदेशी निवेश पर नियंत्रण: पाकिस्तानी सेना ने विशेष निवेश सुविधा परिषद (SIFC) के माध्यम से अपनी आर्थिक भूमिका को और अधिक संस्थागत बना लिया है।
    • यह परिषद, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की देखरेख करती है, इसकी सह-अध्यक्षता सेना प्रमुख और प्रधानमंत्री करते हैं।

निष्कर्ष

पाकिस्तान के साथ शांति संरचनात्मक रूप से बाधित है, क्योंकि सेना का आर्थिक प्रभुत्व और संस्थागत अस्तित्व एक “स्थायी शत्रु” की अवधारणा से जुड़ा हुआ है। भारत के साथ वास्तविक सामान्यीकरण “मिलिट्री इंक.” मॉडल की नींव को कमजोर कर देगा।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: पाकिस्तान की ‘सैन्य अर्थव्यवस्था’ (Military Economy) की अवधारणा पर चर्चा कीजिए। यह पाकिस्तान की लोकतांत्रिक संरचना को किस प्रकार प्रभावित करती है, और दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय सुरक्षा पर इसके क्या प्रभाव हैं?

 (15 अंक, 250 शब्द)

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