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गलगोटिया रोबोडॉग प्रकरण: भारत की AI संप्रभुता का संकट

Lokesh Pal February 20, 2026 05:30 4 0

संदर्भ:

गलगोटिया विश्वविद्यालय का रोबोडॉग प्रकरण केवल एक शर्मनाक घटना नहीं है, बल्कि यह भारत के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पारिस्थितिकी तंत्र की गहरी संरचनात्मक कमजोरियों को भी उजागर करता है। इससे डिजिटल उपनिवेशवाद और वास्तविक नवाचार की कमी को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।

घटना

  • कार्यक्रम: इंडिया AI इम्पैक्ट समिट के दौरान, जो राष्ट्रीय तकनीकी क्षमता प्रदर्शित करने हेतु आयोजित किया गया था, गलगोटिया विश्वविद्यालय (ग्रेटर नोएडा) द्वारा एक रोबोटिक कुत्ते का प्रदर्शन किया गया।
  • दावा: विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि “ओरियन” नामक यह रोबोट विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस द्वारा विकसित एक स्वदेशी नवाचार है।
  • वास्तविकता: इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने शीघ्र ही पहचान लिया कि यह रोबोट कोई स्वदेशी नवाचार नहीं, बल्कि चीन की कंपनी “Unitree” का एक व्यावसायिक उत्पाद है, जिसकी कीमत लगभग ₹2–3 लाख है।
  • प्रभाव: इससे विश्वविद्यालय और देश दोनों की छवि को ठेस पहुँची, तथा इस कथित “नकली नवाचार” ने समिट में प्रदर्शित वास्तविक भारतीय उत्पादों को भी प्रभावित किया।

ऐसी घटनाओं के मूल कारण

  • कार्यक्रम-केंद्रित दृष्टिकोण: दीर्घकालिक अनुसंधान क्षमता विकसित करने के बजाय सम्मेलनों और कार्यक्रमों में AI प्रदर्शन पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया जाता है।
  • “FOMO-AI” सिंड्रोम: संस्थान प्रासंगिक बने रहने के लिए अपने उत्पादों को “AI-सक्षम” के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि उनके पास मूलभूत तकनीकी क्षमता का अभाव हैं।
  • संरचनात्मक कमजोरी: आयातित तकनीकों पर अत्यधिक निर्भरता डिजिटल उपनिवेशवाद को मजबूत कर सकती है, न कि स्वदेशी नवाचार को।

AI के क्षेत्र में भारत के पिछड़ने के कारण

  • सीमित कंप्यूट अवसंरचना: अमेरिका और चीन के विपरीत, भारत के पास जटिल AI मॉडलों के प्रशिक्षण हेतु उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग और उन्नत सुपरकंप्यूटिंग की व्यापक उपलब्धता नहीं है।
  • मूलभूत अनुसंधान का कमजोर आधार: प्रमुख AI क्षेत्रों, जैसे फाउंडेशनल मॉडल और उन्नत एल्गोरिदम, में वैश्विक स्तर पर पर्याप्त अत्याधुनिक अनुसंधान परिणाम उपलब्ध नहीं हैं।
  • अर्धचालक (सेमीकंडक्टर) निर्भरता: घरेलू चिप निर्माण क्षमता सीमित है, जिससे विदेशी अर्धचालक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता बढ़ती है।
  • अल्पकालिक पूँजी दृष्टिकोण: दीर्घकालिक और उच्च-जोखिम अनुसंधान में सहयोग करने के लिए पूँजी का अभाव है, क्योंकि निवेशक अक्सर निरंतर नवाचार के बजाय अल्पकालिक व्यावसायिक लाभ को प्राथमिकता देते हैं।
  • विश्वसनीयता की कमी: बढ़ा-चढ़ा कर या भ्रामक तकनीकी दावों के विरुद्ध कमजोर नियामकीय प्रवर्तन से सार्वजनिक विश्वास कमजोर होता है और संस्थागत विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है।

डिजिटल उपनिवेशवाद का खतरा

  • तकनीकी निर्भरता: विदेशी AI मॉडलों और अवसंरचना पर निरंतर निर्भरता भारत को मुख्य बुद्धिमत्ता प्रणालियों का सृजनकर्त्ता बनने के बजाय केवल उपभोक्ता बना सकती है।
  • डेटा निष्कर्षण मॉडल: वैश्विक बिग टेक कंपनियाँ भारत की बड़ी आबादी को मुख्यतः डेटा स्रोत और लाभ के बाजार के रूप में देख सकती हैं, बिना मूलभूत तकनीक हस्तांतरित किए।
  • रणनीतिक संवेदनशीलता: महत्वपूर्ण AI क्षमताओं के लिए बाहरी प्लेटफार्मों पर निर्भरता तकनीकी संप्रभुता और दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।

आगे की राह

  • मूलभूत अनुसंधान: भारत को घरेलू लार्ज लैंग्वेज मॉडल(LLM) और कोर AI संरचनाओं के विकास में निवेश करके स्वदेशी मूलभूत अनुसंधान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • रणनीतिक अवसंरचना को राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में देखना: उन्नत चिप्स, कंप्यूट क्षमता और क्लाउड अवसंरचना को रणनीतिक संसाधन माना जाए।
  • नियामकीय जवाबदेही: ऐसा ढाँचा विकसित किया जाए जो वास्तविक नवाचार को प्रोत्साहित करे और झूठे तकनीकी दावों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करे।
  • STEM शिक्षा में सुधार: भारत की शिक्षा प्रणाली को रटंत शिक्षण से हटकर अनुसंधान-आधारित, AI-उन्मुख पाठ्यक्रमों की ओर अग्रसर होना चाहिए, जो आलोचनात्मक सोच और समस्या-समाधान कौशल को बढ़ावा दें।

निष्कर्ष

भारत को केवल प्रदर्शन-आधारित AI से आगे बढ़कर क्षमता-आधारित नवाचार की ओर बढ़ना होगा। संरचनात्मक सुधार ही वास्तविक तकनीकी संप्रभुता सुनिश्चित कर सकते हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: भारत एक वैश्विक AI केंद्र बनने की आकांक्षा रखता है, किन्तु मूलभूत (फाउंडेशनल) AI अनुसंधान में निवेश अभी भी सीमित है। विदेशी AI अवसंरचना और प्लेटफार्मों पर निर्भरता किस प्रकार डिजिटल उपनिवेशवाद के नए रूपों को जन्म दे सकती है? भारत अपनी तकनीकी संप्रभुता की रक्षा कैसे कर सकता है?

 (10 अंक, 150 शब्द)

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