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राज्य विधानमंडलों में राज्यपाल का अभिभाषण और संबंधित मुद्दे

Lokesh Pal January 26, 2026 05:30 9 0

संदर्भ:

विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपाल के वार्षिक अभिभाषण को लेकर हालिया विवादों ने संवैधानिक और संघीय चिंताएँ बढ़ा दी हैं, जिससे यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख के रूप में अपनी भूमिका के भीतर कार्य कर रहे हैं, या स्थापित परंपराओं का अतिक्रमण कर रहे हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

  • भारत शासन अधिनियम, 1935 (धारा 63): राज्यपाल अपने व्यक्तिगत विवेक का उपयोग करके प्रांतीय विधानमंडल को संबोधित कर सकते थे।
  • प्रांतीय स्वायत्तता (1937) के बाद: अभिभाषण मंत्रिपरिषद के साथ तैयार किया जाने लगा, जो चयनित सरकार के एजेंडे को दर्शाता था।
  • संविधान सभा का विचार: अभिभाषण का उद्देश्य सरकार की नीति को व्यक्त करना था, न कि राज्यपाल के व्यक्तिगत विचारों को।
  • परिणाम: इस परंपरा को भारत के संविधान में आगे बढ़ाया गया।

संवैधानिक प्रावधान:

  • अनुच्छेद 175: राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन या दोनों सदनों को संबोधित करने का अधिकार देता है।
    • यह अभिभाषण विवेकाधीन है, अनिवार्य नहीं।
  • अनुच्छेद 176: राज्यपाल के लिए विधानमंडल को संबोधित करना अनिवार्य बनाता है:
    • विधानसभा चुनावों के बाद प्रथम सत्र में; तथा
    • प्रत्येक कैलेंडर वर्ष के प्रथम सत्र में।
  • यह अभिभाषण:
    • मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार किया जाता है,
    • राज्यपाल द्वारा दिया जाता है,
    • सरकार की उपलब्धियों और नीतिगत रूपरेखा को रेखांकित करने के लिए होता है।
    • ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ का प्रावधान करता है, जो अभिभाषण पर विधायी चर्चा और मतदान को सक्षम बनाता है।

न्यायिक व्याख्या:

  • शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य वाद (1974): राज्यपाल एक संवैधानिक प्रमुख है, और उसे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना चाहिए।
  • नबाम रेबिया बनाम डिप्टी स्पीकर वाद (2016): अनुच्छेद 175 और 176 के तहत कार्यों का निर्वहन पूरी तरह से मंत्रिस्तरीय सलाह पर किया जाना चाहिए, न कि व्यक्तिगत विवेक पर।

वर्तमान मुद्दे:

  • विपक्ष शासित राज्यों में परंपरा में परिवर्तन:
    • तमिलनाडु: 2022-23 में अभिभाषण के कुछ हिस्सों को छोड़ दिया गया, और 2024 से राज्यपाल ने अभिभाषण दिया ही नहीं।
    • केरल: राज्यपाल ने कैबिनेट द्वारा अनुमोदित नीतिगत अभिभाषण के कुछ हिस्सों को हटा दिया।
    • कर्नाटक: राज्यपाल ने तैयार अभिभाषण को पढ़ने से इनकार कर दिया और एक संक्षिप्त व्यक्तिगत वक्तव्य दिया।
  • संवैधानिक संघर्ष: इस तरह के कार्य निम्नलिखित का उल्लंघन करते हैं:
    • संविधान के संरक्षण और प्रतिरक्षण के लिए अनुच्छेद 159 के तहत ली गई शपथ।
    • राज्यपाल की गैर-विवेकाधीन भूमिका की पुष्टि करने वाले न्यायिक निर्णय।
  • बढ़ता तनाव: हालाँकि केंद्र-राज्य टकराव 1960 के दशक से मौजूद है, लेकिन हालिया उदाहरण अधिक आवृत्ति तथा गंभीरता को दर्शाते हैं।

संघवाद और राज्यपाल की भूमिका:

  • संवैधानिक स्थिति: राज्यपाल राज्य कार्यपालिका के नाममात्र के प्रमुख के रूप में कार्य करते हैं, जो संघ स्तर पर राष्ट्रपति के समान है, और मुख्य रूप से मंत्रिस्तरीय सलाह पर कार्य करते हैं।
  • केंद्र-राज्य संतुलन: यद्यपि राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए केंद्र द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति की जाती है, लेकिन संघवाद संविधान की एक मूल विशेषता है।
  • राजनीतिकरण की चिंता: राज्यपाल के पद के बढ़ते राजनीतिक उपयोग ने राज्यों और केंद्र के मध्य विश्वास को कमजोर किया है।
  • पद समाप्ति पर चर्चा: ऐसे संघर्षों से समय-समय पर पद को समाप्त करने की माँग उठती है, लेकिन भारत की अर्द्ध-संघीय (quasi-federal) संवैधानिक संरचना को देखते हुए यह अव्यावहारिक है।

आगे की राह

सबसे व्यवहार्य सुधार सरकारिया और पुंछी आयोगों की सिफारिशों को लागू करने में निहित है:

  • राज्यपाल की नियुक्ति से पूर्व मुख्यमंत्री के साथ अनिवार्य परामर्श।
  • यद्यपि यह पूर्ण समाधान नहीं है, यह सुधार निम्न कार्य कर सकता है:
    • राजनीतिक संघर्ष में कमी;
    • सहकारी संघवाद को मजबूत करना;
    • वार्षिक अभिभाषण जैसी संवैधानिक परंपराओं को संरक्षित करना।

निष्कर्ष

राज्यपाल के अभिभाषण पर विवाद संवैधानिक नैतिकता और राजनीतिक व्यवहार के बीच के अंतराल को उजागर करता है। संघीय संतुलन और लोकतंत्र के लिए अनुच्छेद 175 और 176 को बनाए रखना आवश्यक है, साथ ही राज्यपाल की तटस्थता बहाल करने के लिए संस्थागत सुधार महत्त्वपूर्ण हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: राज्य विधानमंडलों में प्रथागत अभिभाषण से राज्यपालों के इनकार या विचलन से जुड़े हालिया विवादों ने गंभीर संवैधानिक चिंताएँ उत्पन्न की हैं। अनुच्छेद 175 और 176 के तहत राज्यपाल के अभिभाषण की संवैधानिक स्थिति का परीक्षण कीजिए, तथा चर्चा कीजिए कि ऐसे कार्य भारत में संसदीय लोकतंत्र और संघवाद के सिद्धांतों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।

(15 अंक, 250 शब्द)

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