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द ग्रेट इंडियन रिटेल डिलेम्मा (The Great Indian Retail Dilemma)

Lokesh Pal February 14, 2026 05:15 6 0

संदर्भ

“द ग्रेट इंडियन रिटेल डिलेम्मा” 1991 के LPG (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) सुधारों के बाद से चली आ रही नीति-संबंधी असमंजस को दर्शाती है। एक ओर विकास और आधुनिकीकरण के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित करने की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर छोटे घरेलू खुदरा व्यापारियों को बड़ी वैश्विक कंपनियों से बचाना भी जरूरी है।

छोटे व्यापारियों की सुरक्षा हेतु खुदरा क्षेत्र में FDI नीति

  • संरक्षणवादी नीतियों की सीमाएँ: तीन दशकों से अधिक समय से सरकारें उदारीकरण और छोटे खुदरा व्यापारियों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती रही हैं, परंतु ये प्रयास उन्हें पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सके।
  • मल्टी-ब्रांड रिटेल पर प्रतिबंध: अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में, वॉलमार्ट जैसी “बिग बॉक्स” स्टोर्स एक ही छत के नीचे मल्टी-ब्रांड रिटेल संचालित करती हैं।
    • भारत ने पड़ोस की किराना दुकानों को वैश्विक खुदरा श्रृंखलाओं से बचाने के लिए मल्टी-ब्रांड खुदरा में FDI पर प्रतिबंध लगाए, जिससे उपभोक्ता-उन्मुख बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी भागीदारी सीमित रहा।
  • सिंगल-ब्रांड बनाम मल्टी-ब्रांड FDI: भारत में सिंगल-ब्रांड रिटेल (जैसे, Apple, IKEA, Nike) में 100% FDI की अनुमति है, जहाँ कंपनियाँ केवल अपने उत्पाद ही बेचती हैं, जबकि मल्टी-ब्रांड रिटेल पर प्रतिबंध बनाए रखे गए हैं ताकि उपभोक्ता श्रेणियों में किसी एक कंपनी का वर्चस्व न हो।
  • B2B प्रवेश मार्ग: विदेशी कंपनियों को बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B) क्षेत्र में संचालन की अनुमति दी गई।
    • उदाहरण के लिए, Walmart जैसी कंपनियाँ छोटे खुदरा विक्रेताओं को सामान बेच सकती थीं, पर सीधे उपभोक्ताओं को नहीं।

घरेलू दिग्गजों और क्विक कॉमर्स का उदय

  • घरेलू रिटेल चेन का विकास: रिलायंस रिटेल (स्मार्ट बाज़ार), टाटा समूह (स्टार बाज़ार), और डी-मार्ट जैसी कंपनियों ने तेजी से विस्तार किया, और छोटे खुदरा विक्रेताओं के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा की।
  • क्विक कॉमर्स का विघटन: ज़ोमैटो और स्विग्गी जैसी प्लेटफ़ॉर्म्स ने “डार्क स्टोर्स” के माध्यम से 10 मिनट की डिलीवरी मॉडल पेश की, जिससे सुविधा बढ़ी और स्थानीय दुकानों में ग्राहकों की संख्या कम हुई।
  • वेंचर कैपिटल का लाभ: छोटे दुकानदारों के विपरीत, तकनीकी प्लेटफ़ॉर्म्स को बड़े वेंचर कैपिटल फंडिंग तक पहुँच होती है, जिससे वे गहभारी री छूट और मुफ्त डिलीवरी के जरिए नुकसान झेल सकते हैं, जो छोटे खुदरा विक्रेता वहन नहीं कर सकते।

ई-कॉमर्स में विद्यमान नियामकीय चुनौतियाँ

  • मार्केटप्लेस बनाम इन्वेंट्री मॉडल: सरकार ने यह अनिवार्य किया कि विदेशी ई-कॉमर्स दिग्गज जैसे अमेज़न और फ्लिपकार्ट “इन्वेंट्री मॉडल” (अपनी खुद की वस्तुएँ बेचने) के बजाय “मार्केटप्लेस मॉडल” (अन्य विक्रेताओं के लिए प्लेटफ़ॉर्म के रूप में कार्य करना) का पालन करें।
    • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि वे अपनी खुद की कम कीमत वाली वस्तुओं के जरिए छोटे व्यवसायों की कीमतों को प्रभावित न करें।
  • वॉलमार्ट का अप्रत्यक्ष प्रवेश: विदेशी भौतिक स्टोरों पर प्रतिबंध के बावजूद, कंपनियों ने बाजार में प्रवेश के लिए अप्रत्यक्ष तरीके ढूंढ निकाले।
    • उदाहरण के लिए, वॉलमार्ट फ्लिपकार्ट और फोनपे में बहुमत की हिस्सेदारी रखता है, जिससे वह डिजिटल चैनलों के माध्यम से भारतीय रिटेल और पेमेंट्स बाजार का बड़ा हिस्सा प्रभावी रूप से नियंत्रित करता है।
  • ONDC पहल: सरकार ने छोटे खुदरा विक्रेताओं को अपने उत्पाद ऑनलाइन बेचने में मदद करने के लिए ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) की शुरुआत की, लेकिन यह अभी तक बड़ी सफलता नहीं बन सका है।

आगे की राह

  • सृजनात्मक विनाश: सृजनात्मक विनाश की अवधारणा बताती है कि तकनीकी प्रगति और नवाचार को स्थायी रूप से नियमन के जरिए रोका नहीं जा सकता।
    • जब व्यापार करने का कोई अधिक कुशल या बेहतर तरीका सामने आता है, तो वह अंततः जीतता है, नियामक बाधाओं को पार करता है और प्रक्रिया में बाजारों को नया रूप देता है।
  • सुरक्षा के बजाय समर्थन: केवल प्रतिस्पर्धा को रोकने के बजाय, सरकार को छोटे खुदरा विक्रेताओं का समर्थन करना चाहिए, जैसे उन्हें सस्ते ऋण और तकनीकी उन्नयन की सुविधा प्रदान करना, ताकि वे स्विगी और जोमैटो जैसे प्लेटफ़ॉर्म के साथ निष्पक्ष रूप से प्रतिस्पर्धा कर सकें।
  • नीति में बदलाव: “उपभोक्ता पहले” नीति की ओर बदलाव होना चाहिए।
    • नियम सभी के लिए निष्पक्ष होने चाहिए, लेकिन प्राथमिक उद्देश्य उन चीज़ों पर होना चाहिए जो उपभोक्ता को लाभ पहुँचाती हैं, जैसे कम कीमतें और वस्तुओं तक बेहतर पहुँच।

निष्कर्ष

भारत की रिटेल नीति को संरक्षणवाद से आगे बढ़कर प्रतिस्पर्धात्मकता की दिशा में विकसित होना चाहिए। स्थायी सुधार छोटे खुदरा विक्रेताओं को प्रभावी रूप से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाकर ही संभव है, साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि नीति निर्माण में उपभोक्ता के हित केंद्रीय रहें।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारत के मल्टी-ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रति सतर्क दृष्टिकोण के पीछे तर्क क्या है? क्या संरक्षणवाद ने छोटे खुदरा विक्रेताओं को मजबूत किया है या इसने इस क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एकीकरण को सीमित किया है?

 (15 अंक, 250 शब्द)

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