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‘ऑलवेज-ऑन’ अर्थव्यवस्था में राइट टू डिस्कनेक्ट

Lokesh Pal January 07, 2026 05:00 20 0

संदर्भ:

डिजिटल ‘ऑलवेज-ऑन’ (हमेशा सक्रिय) अर्थव्यवस्था ने 24×7 उपलब्धता को सामान्य बना दिया है, जिससे कार्य-जीवन (वर्क-लाइफ) के बीच की सीमाएँ समाप्त हो गई हैं, और भारत में ‘बर्नआउट’ (अत्यधिक थकान और तनाव) की समस्या बढ़ी है। यह स्थिति कानूनी रूप से लागू करने योग्य ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ (काम से अलग होने का अधिकार) के पक्ष में एक मजबूत आधार तैयार करती है।

‘ऑलवेज-ऑन’ अर्थव्यवस्था के बारे में:

  • क्या है?: यह एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था है, जिसमें कार्य, सेवाएँ, बाज़ार और संचार निरंतर संचालित होते हैं, जो डिजिटल तकनीक तथा वैश्विक कनेक्टिविटी द्वारा सक्षम होते हैं।
  • तकनीकी प्रभाव: स्मार्टफोन और लैपटॉप जैसी तकनीकें, जो लचीलापन बढ़ाने के लिए बनाई गई थी, अब ‘मौन कार्यवाहक’ (Silent taskmasters) बन गई हैं, जो पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन के बीच की सीमा को समाप्त कर रही हैं।
  • डिजिटल अतिरेक और अति-कार्य का सामान्यीकरण: पारंपरिक 9-से-5 कार्यदिवस अब “किसी भी समय कार्य समय है” की संस्कृति में बदल गया है, जहाँ अत्यधिक कार्य (Overwork) को समर्पण समझ लिया जाता है।
  • विस्तार: शाम के समय, सप्ताहांत (Weekends) और छुट्टियों को तेजी से कार्यदिवस के विस्तार के रूप में माना जा रहा है।

भारत का अति-कार्य संकट: ILO के आँकड़ें

  • कार्य के घंटे: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, भारत के 51% कार्यबल प्रति सप्ताह 49 घंटे से अधिक कार्य करते हैं, जिससे भारत लंबे कार्य घंटों के मामले में विश्व स्तर पर दूसरे स्थान पर है।
  • जॉब बर्नआउट (Job Burnout): 78% भारतीय कर्मचारी ‘जॉब बर्नआउट’ की रिपोर्ट करते हैं, जो केवल थकान नहीं बल्कि एक प्रणालीगत तनाव (Systemic stress) का संकेत है।

अति-कार्य और इसके मानवीय परिणाम:

  • दुखद उदाहरण: वर्ष 2024 में ईवाई (EY – Ernst & Young) की एक युवा कर्मचारी अन्ना सेबेस्टियन पेरायिल की मृत्यु ने अत्यधिक कार्य दबाव के घातक परिणामों को उजागर किया।
  • कार्यबल के लिए चेतावनी: यह घटना पूरे कार्यबल के लिए अनियंत्रित पेशेवर माँगों के खतरों के बारे में एक चेतावनी (Wake-up call) साबित हुई।

‘ऑलवेज-ऑन’ अर्थव्यवस्था का प्रभाव:

  • जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ (Lifestyle Diseases): निरंतर कार्य तनाव जीवनशैली से संबंधित बीमारियों और मानसिक विकारों में योगदान देता है, जिसमें उच्च रक्तचाप, मधुमेह, चिंता तथा अवसाद शामिल हैं।
    • ‘राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य के 10-12% मामलों में कार्य का तनाव उत्तरदायी है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव में वृद्धि करता है।
  • उत्पादकता में गिरावट: अत्यधिक कार्य करने वाले कर्मचारियों से गलतियाँ होने की संभावना अधिक होती है, वे कम रचनात्मक और कम उत्पादक होते हैं, जिससे लंबे कार्य घंटे आर्थिक रूप से अक्षम (Inefficient) हो जाते हैं।
    • कार्य को ‘गुणवत्ता’ (Quality) की बजाय ‘अवधि’ (Duration) से मापना पुरातन सोच है।
  • शारीरिक और भावनात्मक थकावट: निरंतर (Chronic) तनाव भावनात्मक थकावट, शारीरिक बीमारी और कार्यस्थल पर गिरते प्रदर्शन का कारण बनता है।
  • बर्नआउट की संरचनात्मक प्रकृति: ‘बर्नआउट’ अब केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि विषाक्त कार्य संस्कृति का संरचनात्मक परिणाम है।

आधुनिक कार्यस्थलों के लिए अपर्याप्त कानूनी सुरक्षा:

  • सीमित कार्य-घंटे: “व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति (OSH) संहिता, 2020”, मुख्य रूप से श्रमिकों (फैक्ट्री/ब्लू-कॉलर श्रमिकों) के लिए कार्य के घंटों को सीमित करती है, न कि ‘कर्मचारी’ (व्हाइट-कॉलर, आईटी और प्रबंधन) के लिए।
  • सुभेद्य श्रमिकों का बहिष्कार: संविदात्मक (Contractual), फ्रीलांस और गिग श्रमिकों को अक्सर पर्याप्त सुरक्षा से बाहर रखा जाता है।
  • युवा डिजिटल कार्यबल की उच्च जोखिम स्थिति: रोजगार की असुरक्षा के कारण युवा और डिजिटल रूप से जुड़े कर्मचारी शोषण के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं।
  • असंतुलित शक्ति संबंध: अनुशासनात्मक कार्रवाई या नौकरी से निकाले जाने का भय कर्मचारियों को कार्यालय समय के बाद के संचार को अस्वीकार करने से रोकता है।
    • यह एक असमान शक्ति संरचना बनाता है, जो नियोक्ताओं (Employers) के पक्ष में व्यापक रूप से झुकी हुई है।

‘ऑलवेज-ऑन’ कार्य संस्कृति पर अंतर्राष्ट्रीय विधिक प्रतिक्रिया:

  • प्रारंभिक विधायी नेतृत्व: फ्रांस ने कार्यालय समय के बाद डिजिटल संचार को सीमित करने के लिए 2017 में “राइट टू डिस्कनेक्ट” पेश किया।
  • व्यापक अंतरराष्ट्रीय अंगीकरण: पुर्तगाल, इटली, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने समान विधिक सुरक्षा को अपनाया है।
  • विश्राम के माध्यम से उत्पादकता: ये कानून कंपनियों को कार्यालय समय के बाद डिजिटल संचार को सीमित करने के लिए विशिष्ट प्रोटोकॉल पर वार्ता करने का आदेश देते हैं।
    • यह एक स्पष्ट संकेत है, कि विकसित अर्थव्यवस्थाएँ समझती हैं कि खाली समय (Downtime) का सम्मान करना आर्थिक विकास में बाधा नहीं डालता, बल्कि सतत विकास (Sustainable growth) के लिए एक पूर्व शर्त है।

प्रस्तावित ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ विधेयक:

  • सार्वभौमिक कार्य-घंटे सुरक्षा: यह विधेयक सभी ‘कर्मचारियों’ के लिए कार्य के घंटों को स्पष्ट रूप से सीमित करने हेतु OSH संहिता में संशोधन का प्रस्ताव करता है।
  • प्रतिशोध से कानूनी सुरक्षा: यह विधिक गारंटी सुनिश्चित करना चाहता है, कि कार्यालय समय के बाद कार्य संचार की अनदेखी के लिए कर्मचारियों को दंडित नहीं किया जा सकता।
  • संस्थागत शिकायत तंत्र: इस अधिकार के उल्लंघन के लिए एक शिकायत निवारण तंत्र प्रस्तावित है।
  • व्यावसायिक सुरक्षा के रूप में मानसिक स्वास्थ्य: यह विधेयक मानसिक कल्याण को केवल कल्याणकारी मुद्दा नहीं, बल्कि व्यावसायिक सुरक्षा का हिस्सा मानता है।
  • गिग और संविदा श्रमिकों का समावेश: इसका लक्ष्य गिग और संविदात्मक श्रमिकों की रक्षा करना है, जो वर्तमान में श्रम सुरक्षा से बाहर हैं।

आगे की राह:

  • विषाक्त कार्यस्थल मानदंडों में सुधार: ‘प्रेजेंटिइज़्म’ (उत्पादक न होने पर भी भौतिक या डिजिटल रूप से उपस्थित रहने की अपेक्षा) और देर रात के ईमेल जैसी विषाक्त परंपराओं को चुनौती दी जानी चाहिए, जिन्हें प्रतिबद्धता का संकेत माना जाता है।
  • संस्थागत मानसिक स्वास्थ्य सहायता: परामर्श और मनोवैज्ञानिक सहायता सेवाओं को मानक कार्यस्थल प्रथाओं का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
  • दृष्टिकोण में बदलाव (Paradigm Shift): यह पहचानने के लिए मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता है, कि बेहतर ढंग से आराम करने वाले कर्मचारी दीर्घकालिक रूप से अधिक अभिनव, प्रतिबद्ध और उत्पादक होते हैं।

निष्कर्ष:

भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को अत्यधिक कार्य या सतत विकास को अपनाने में से एक को चुनना होगा। कानूनी रूप से लागू करने योग्य ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ उत्पादकता को गरिमा, स्वास्थ्य और मानवीय कल्याण से जोड़ेगा, जो यह सिद्ध करेगा कि विश्राम कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक आर्थिक निवेश है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: कार्यस्थलों के तीव्र डिजिटलीकरण ने पेशेवर दायित्वों और व्यक्तिगत जीवन के बीच की सीमा को तेजी से धुंधला कर दिया है। इस संदर्भ में, ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ पर हाल ही में पेश किए गए ‘निजी सदस्य विधेयक’ के महत्त्व का परीक्षण कीजिए तथा भारत में इसके कार्यान्वयन से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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