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पुलिस हिरासत में यातना : भारत की न्यायिक प्रणाली के लिए एक गंभीर समस्या

Lokesh Pal April 04, 2025 05:00 12 0

संदर्भ:

हाल ही में, कॉमन कॉज ने CSDS के लोकनीति कार्यक्रम के साथ मिलकर भारत में पुलिस द्वारा हिंसा और यातना का विश्लेषण करते हुए एक रिपोर्ट जारी की।

मुख्य बिंदु

  • यह अध्ययन 17 राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के 8,276 पुलिस कर्मियों से चर्चा पर आधारित है ।
  • इसमें भारत में पुलिस द्वारा क्रूरता की प्रकृति, कारणों और योगदान देने वाले कारकों की जाँच की गई है।

हिरासत में यातना (Custodial Torture)

  • यातना की परिभाषा: यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCAT), 1984 यातना को सूचना प्राप्त करने, दंडित करने, धमकाने या भेदभाव करने के लिए  जानबूझकर गंभीर शारीरिक या मानसिक पीड़ा पहुँचाने के रूप में परिभाषित करता है।
    • जब यह कृत्य सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा या उनकी सहमति से किया जाता है, तो इसे यातना माना जाता है।
  • भारत की कानूनी स्थितिभारत ने 1997 में UNCAT पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं की है, जिसका अर्थ है कि वह इसके प्रावधानों को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

  • कठोर प्रक्रिया: 55% पुलिस कर्मियों का मानना ​​है, कि जनता में भय उत्पन्न करने के लिए “कठोर प्रक्रिया” का प्रयोग करना आवश्यक है, 20% इसे “बहुत आवश्यक” मानते हैं और 35% इसे “कुछ हद तक ज़रूरी” मानते हैं। “कठोर प्रक्रियाओं” की परिभाषा अस्पष्ट है, तथा रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि वे कब यातना की सीमा पार कर जाते हैं
  • भीड़ द्वारा हिंसा का औचित्य25% पुलिसकर्मी यौन उत्पीड़न और बच्चों की चोरी के मामलों में भीड़ द्वारा हिंसा को उचित ठहराते हैं। यह दर्शाता है, कि कुछ पुलिसकर्मी सतर्कता न्याय को सहन करते हैं, जिससे भीड़ को न्यायाधीश और जूरी की भूमिका निभाने की अनुमति मिलती है।
  • एनकाउंटर द्वारा हत्याओं पर विचार: 22% पुलिसकर्मियों का मानना ​​है, कि “खतरनाक एवं हिंसक अपराधियों” को मारना विधिक प्रक्रिया से बेहतर है। हालाँकि, 74% उचित कानूनी प्रक्रियाओं का समर्थन करते हैं, उनका कहना है कि सभी अपराधियों को, चाहे उनका अपराध कुछ भी हो, पकड़ा जाना चाहिए और निष्पक्ष सुनवाई होनी चाहिए
  • गिरफ्तारी प्रक्रियाओं का पालन: 41% पुलिसकर्मियों का कहना है, कि गिरफ्तारी प्रक्रियाओं का “हमेशा” पालन किया जाता है। 24% ने स्वीकार किया, कि प्रक्रियाओं का “शायद ही कभी या कभी भी” पालन नहीं किया जाता है। केरल में सबसे ज़्यादा अनुपालन की रिपोर्ट मिली, जहाँ 94% पुलिसकर्मियों ने कहा कि प्रक्रियाओं का “हमेशा” पालन किया जाता है।
  • थर्ड-डिग्री का प्रयोग: 30% पुलिसकर्मी गंभीर आपराधिक मामलों में थर्ड-डिग्री के उपयोग को उचित ठहराते हैं। चौंकाने वाली बात यह है, कि 9% लोग छोटे-मोटे अपराधों में भी थर्ड-डिग्री विधियों का समर्थन करते हैं।
  • पुलिस यातना के शिकार: यातना से आदिवासी, दलित, मुस्लिमअशिक्षित व्यक्ति और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग सहित हाशिए पर व्याप्त समुदाय अत्यधिक प्रभावित होते हैं
  • विसंगतियाँ: रिपोर्ट में विभिन्न एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराए गए हिरासत में मौत के आँकड़ों में विसंगतियों को उजागर किया गया है। विभिन्न एजेंसियों ने 2020 में हिरासत में मौत के अलग-अलग आँकड़े बताए हैं:
    • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB): 76 मामले
    • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC): 70 मामले
    • NCAT (नागरिक समाज पहल): 111 मामले
    • 2018-22 के बीच हिरासत में हुई मौतों के मामले में शून्य दोषसिद्धि दर्ज की गई, जिससे जवाबदेही को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हो गई हैं।
  • पुलिस समर्थन: 79% पुलिस कर्मी मानवाधिकारों में प्रशिक्षण का समर्थन करते हैं। 71% यातना निवारण उपायों की वकालत करते हैं। 79% साक्ष्य-आधारित पूछताछ तकनीकों का समर्थन करते हैं, जिससे बल प्रयोग पर निर्भरता कम हो सकती है। 

हिरासत में यातना से जुड़े मुद्दे

  • न्यायिक खामियाँ: मजिस्ट्रेट गिरफ़्तार व्यक्तियों से शायद ही कभी बातचीत करते हैं, जिससे कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती है। एक वकील ने मजिस्ट्रेटों को “मूक दर्शक” बताया, जो गिरफ़्तारियों या संभावित यातना के बारे में पूछताछ नहीं करते
  • चिकित्सा संबंधी कमियाँ: बंदियों की चिकित्सा जाँच प्रायः बिना फोरेंसिक विशेषज्ञता वाले चिकित्सकों द्वारा की जाती है, जिससे गलत आकलन होता है। नेत्र विशेषज्ञों और एनेस्थिसियोलॉजिस्ट द्वारा ये जाँच किए जाने के मामले सामने आए हैं।
  • संस्थागत विफलताएँ: पुलिस यातना के मुख्य अपराधी हैं। हिरासत में हिंसा के मामलों में मजिस्ट्रेट निष्क्रिय रहकर योगदान देते हैं। चिकित्सक चोटों का सही से आकलन करने में विफल रहते हैं, जिससे यातना के साक्ष्य सीमित हो जाते हैं।
  • NHRC की आलोचना: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की आलोचना इस बात के लिए की गई है, कि वह यातना को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं करता है और यातना के पीड़ितों के प्रति “पक्षपाती रवैया” प्रदर्शित करता है। 
  • यातना के प्रमुख कारण: औपनिवेशिक युग की संस्कृति , जो न्याय पर नियंत्रण को प्राथमिकता देती है। जवाबदेही का अभाव, पुलिस को दंड से मुक्त रखना, त्वरित परिणाम के लिए राजनीतिक और वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव आदि । 
    • अपर्याप्त पुलिस प्रशिक्षण के कारण हिंसक तरीकों पर निर्भरता बढ़ रही है। धीमी विधिक  प्रक्रियाओं, लंबित मामलों के कारण न्यायेतर तरीकों के प्रति जनता का समर्थन भी बढ़ रहा है

वैश्विक आँकड़ें

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: ग्वांतानामो बे की अमानवीय पूछताछ पद्धतियाँ।
  • इराक: अबू ग़रीब जेल में बंदियों के साथ क्रूर व्यवहार।
  • रूस, चीन और पाकिस्तान: राज्य प्रायोजित यातना का व्यापक उपयोग।

आगे की राह

  • अस्वीकार्यता: न्यायाधीश और वकील इस बात पर सहमत हैं, कि पुलिस के समक्ष दिए गए बयान अदालत में अस्वीकार्य होने चाहिए। हालाँकि, कुछ समितियों ने इस संबंध में व्यापक सुधार सुझाए हैं:
    • मलिमथ समिति (2003): प्रस्तावित किया गया, कि पुलिस अधीक्षक (एसपी) या उच्चतर अधिकारी के समक्ष किया गया इकबालिया बयान सुरक्षा उपायों के साथ स्वीकार्य किया जाए।
    • भारतीय विधि आयोग (69वीं रिपोर्ट, 1977): वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के समक्ष स्वीकारोक्ति की अनुमति देने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम में धारा 26A जोड़ने का सुझाव दिया गया।
  • विधि का अधिनियमन: भारत को एक समर्पित यातना-विरोधी कानून बनाना चाहिए।
  • अनुसमर्थन: यातना को समाप्त करने के लिए कानूनी रूप से प्रतिबद्ध होने हेतु यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCAT) का अनुसमर्थन करना।
  • पुलिस की स्वतंत्रता: सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार, राजनीतिक दबाव से पुलिस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना।
  • मानवाधिकारों को सुदृढ़ करना: मानव अधिकार प्रशिक्षण और फोरेंसिक चिकित्सा मूल्यांकन को मज़बूत बनाना।

निष्कर्ष

किसी भी परिस्थिति में यातना को उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए। सुधार और विधिक सुरक्षा उपायों को लागू करने से पुलिस को एक मानवीय, पेशेवर समूह में बदलने में मदद मिलेगी। विधि के शासन और मानवाधिकारों को बनाए रखने से अंततः कानून प्रवर्तन में जनता का भरोसा मज़बूत होगा

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

कॉमन कॉज-सीएसडीएस रिपोर्ट के निष्कर्षों के आलोक में, यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCAT) को अनुमोदित करने के महत्त्व पर चर्चा कीजिए। क्या आपको लगता है, कि समर्पित यातना-विरोधी कानून की अनुपस्थिति में हिरासत में यातना को रोकने के लिए वर्तमान विधिक प्रावधान पर्याप्त हैं?

(15 अंक, 250 शब्द)

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