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संकटग्रस्त जल: ग्रेट निकोबार परियोजना पर

Lokesh Pal February 19, 2026 05:00 3 0

संदर्भ:

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना (GNIP) एक बार फिर चर्चा में है, क्योंकि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (कोलकाता पीठ) ने प्रस्तावित ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा अवसंरचना परियोजना के लिए दी गई पर्यावरणीय स्वीकृतियों को बरकरार रखा है। अधिकरण ने कहा कि वैधानिक सुरक्षा उपायों और प्रभाव आकलनों को पर्याप्त रूप से संबोधित किया गया है।

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना (GNIP) के बारे में

  • अवलोकन: ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना (GNIP) एक मेगा-अवसंरचना परियोजना है, जिसका उद्देश्य ग्रेट निकोबार द्वीप को एक प्रमुख वैश्विक समुद्री एवं सामरिक केंद्र में परिवर्तित करना है।
  • परियोजना के मुख्य घटक:
    • अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): एक ऐसा टर्मिनल, जहाँ बड़े जहाज़ अपना माल छोटे जहाज़ों में स्थानांतरित करेंगे, ताकि क्षेत्रीय वितरण किया जा सके।
    • अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा: एक द्वि-उपयोगी सुविधा, जिसका उद्देश्य नागरिक तथा सैन्य—दोनों प्रकार के उपयोग के लिए किया जाना है।
    • बड़ा टाउनशिप: बंदरगाह-आधारित औद्योगिक गतिविधियों, हवाई अड्डे के संचालन तथा संभावित कार्यबल और जनसंख्या वृद्धि को समर्थन देने हेतु एक नियोजित शहरी बस्ती की स्थापना।
    • विद्युत संयंत्र: सतत ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए 450 मेगावोल्ट-एम्पीयर (MVA) क्षमता वाला गैस और सौर ऊर्जा आधारित विद्युत संयंत्र की स्थापना।

परियोजना का सामरिक एवं आर्थिक महत्व

  • मलक्का जलडमरूमध्य की निगरानी: ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है, जो एक महत्वपूर्ण वैश्विक व्यापार मार्ग है और वर्त्तमान में यहाँ चीनी जहाजों का वर्चस्व है।
  • रणनीतिक “आंखें”: यह परियोजना भारत को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर निरंतर उपस्थिति और निगरानी बनाए रखने में सक्षम बनाएगी, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा सुदृढ़ होगी।
  • आर्थिक विकास: व्यापार, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और रोजगार में वृद्धि।

परियोजना से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताएँ

  • व्यापक स्तर पर वनों की कटाई: लगभग 9 लाख पेड़ों की कटाई का अनुमान है, जिससे लगभग 130 वर्ग किलोमीटर अछूते वन क्षेत्र का सफाया हो सकता है।
  • वन्यजीवों के लिए खतरा: यह द्वीप विश्व की सबसे बड़ी समुद्री कछुआ प्रजाति, लेदरबैक कछुए, का घोंसला बनाने का प्रमुख स्थल है। बंदरगाह निर्माण से इनके आवास को खतरा है।
  • प्रवाल भित्तियों का विनाश: बंदरगाह के लिए ड्रेजिंग से प्रवाल भित्तियाँ नष्ट हो सकती हैं, जिन्हें अक्सर “समुद्र का वर्षावन” कहा जाता है।
  • नौरू चेतावनी: 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश फॉस्फेट आयुक्तों द्वारा बनाबा और नौरू में उर्वरक के लिए की गई स्ट्रिप माइनिंग ने बनाबा को 1945 तक पारिस्थितिक रूप से बर्बाद और निर्जन बना दिया।
    • स्थानीय बनाबा समुदाय को जबरन राबी द्वीप (लगभग 2,000 किमी दूर) स्थानांतरित किया गया, और द्वीप अब भी चूना-पत्थर की नुकीली संरचनाओं से क्षतिग्रस्त है, जबकि विस्थापित समुदाय अब भी पुनर्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मानवीय और जनजातीय प्रभाव

  • प्रभावित आदिवासी समुदाय: परियोजना क्षेत्र में शोमपेन (विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह – PVTG) और निकोबारी समुदाय निवास करते हैं। इससे सांस्कृतिक अस्तित्व, आवासीय व्यवधान और आजीविका असुरक्षा को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
  • वैधानिक सहमति की आवश्यकता: वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत, वन भूमि के उपयोग में परिवर्तन के लिए स्थानीय ग्राम पंचायत से पूर्व स्वीकृति आवश्यक है, जिससे समुदाय की सहमति कानूनी पूर्वशर्त बन जाती है।
  • जबरदस्ती के आरोप: रिपोर्टों में कहा गया है कि जनजातीय परिषद के सदस्यों पर कथित रूप से समर्पण प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला गया।
  • सूचित सहमति की दुविधा: शोम्पेन समुदाय अपेक्षाकृत अलग-थलग रहते हैं और उनके बीच कोई सामान्य प्रशासनिक भाषा नहीं है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति वास्तव में संभव थी।

स्वीकृति प्रक्रिया पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण

  • पारदर्शिता की कमी: आलोचकों का कहना है कि मूल्यांकन प्रक्रिया मुख्य रूप से सरकार द्वारा प्रदान किए गए आंकड़ों पर आधारित थी, जिसमें स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा सीमित थी और “रणनीतिक उपयोगिता” के आधार पर सार्वजनिक प्रकाशन प्रतिबंधित था।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की भूमिका: आलोचकों के अनुसार, NGT पर्यावरणीय प्रहरी के रूप में कार्य करने के बजाय कार्यपालिका की स्थिति को प्रभावी ढंग से समर्थन देता प्रतीत होता है, बिना किसी ठोस स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन के।

निष्कर्ष

परियोजना का वास्तविक प्रभाव समय के साथ ही स्पष्ट होगा, लेकिन पारदर्शी और स्वतंत्र मूल्यांकन की कमी आज विश्वास और उत्तरदायी/जवाबदेह शासन को कमजोर करती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों पर चर्चा करें। भारत को जैव विविधता संरक्षण और रणनीतिक अवसंरचना विकास के बीच संतुलन कैसे स्थापित करना चाहिए?

 (10 अंक, 150 शब्द)

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