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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का ‘लिबरेशन डे टैरिफ’ तथा भारत के लिए इसके निहितार्थ

Lokesh Pal April 02, 2025 05:15 12 0

संदर्भ: 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन के आर्थिक प्रभाव का मुकाबला करने और उद्योगों को अमेरिका में वापस लाने के लिए “लिबरेशन डे टैरिफ” का प्रस्ताव रखा है।

लिबरेशन डे टैरिफ

  • पृष्ठभूमि: हाल के वर्षों में, लागत लाभ और व्यापार नीतियों के कारण कई उद्योग अमेरिका से चीन और कनाडा की ओर स्थानांतरित हो गए हैं। 
  • उद्देश्य: डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किए गए नए टैरिफ विदेशी प्रतिस्पर्धा के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करके अमेरिकी विनिर्माण को पुनर्जीवित करने हेतु तैयार किए गए हैं।
  • संरक्षणवाद: यह संरक्षणवाद का एक प्रकार है। संरक्षणवाद एक आर्थिक नीति है, जिसका उद्देश्य आयात को प्रतिबंधित करना और टैरिफ, कोटा तथा सब्सिडी के माध्यम से घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना है।
  • वैश्विक प्रभाव: इन टैरिफों का वैश्विक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है, जिसका भारत सहित व्यापार गतिशीलता पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। 
    • टैरिफ का प्रभाव ऑटोमोबाइलइलेक्ट्रॉनिक्स और कृषि जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है, जहाँ भारत ने अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए हैं।

टैरिफ का प्रभाव

  • सीधे प्रभावित होने वाले देश: नए टैरिफ मुख्य रूप से  कनाडा,  चीन,  ब्राजील, मेक्सिको और अन्य प्रमुख व्यापार साझेदारों को प्रभावित करेंगे। 
    • ये राष्ट्र अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात पर बहुत अधिक निर्भर हैं और टैरिफ के कारण अमेरिकी बाजार में उनके माल की लागत में वृद्धि हो सकती है, जिससे व्यापार की मात्रा में कमी आ सकती है
  • गैर-व्यापारिक देशों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव: यहाँ तक ​​कि जो देश अमेरिका के साथ सीधे व्यापार नहीं करते हैं, उन्हें भी अप्रत्यक्ष परिणामों का सामना करना पड़ेगा। 
    • वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान आ सकता है, क्योंकि इन देशों में निर्माता अपने उत्पादों के लिए वैकल्पिक बाजार की तलाश कर रहे हैं, जिससे वैश्विक व्यापार प्रतिरूप में परिवर्तन आ सकता है।
  • निर्माता रणनीति: टैरिफ से प्रभावित अमेरिकी निर्माता, सामग्री प्राप्त करने या अपने सामान बेचने के लिए अमेरिका के बाहर वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर सकते हैं। इससे अमेरिका से माँग में कमी आ सकती है, खासकर उन उत्पादों के लिए जो परंपरागत रूप से इन टैरिफ प्रभावित देशों से प्राप्त किए जाते थे।
  • चीन पर अमेरिकी टैरिफ: अमेरिका ने चीनी वस्तुओं पर टैरिफ लगाया है, जिससे अमेरिका को किया जाने वाला निर्यात महंगा हो गया है। परिणामस्वरूप, चीन अपने अधिशेष उत्पादों को बेचने के लिए भारत, अफ्रीका और आसियान देशों जैसे वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर रहा है।
  • चीनी माल की डंपिंग का जोखिम: अमेरिका तक सीमित पहुँच के कारण, चीन कम कीमतों पर अन्य बाजारों में अतिरिक्त स्टील डंप कर सकता है। इससे अनुचित प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होती है, जिससे भारत जैसे देशों में घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुँचता है।
  • एंटी-डंपिंग ड्यूटी: इसका मुकाबला करने के लिए भारत ने चीनी स्टील आयात पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाई है। इसका उद्देश्य भारतीय स्टील निर्माताओं को सस्ते आयात से बचाना है, जो स्थानीय उत्पादन को नुकसान पहुँचा सकता है

भारत की कूटनीतिक प्रतिक्रिया

  • दृष्टिकोण: अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ के प्रति अपनी कूटनीतिक प्रतिक्रिया में  भारत ने टकराव की  बजाय वार्ता का विकल्प चुना।
    • तनाव बढ़ाने की बजाय, भारत ने कूटनीतिक माध्यमों से मुद्दे को सुलझाने के लिए वार्ता पर ध्यान केंद्रित किया।
  • सद्भावना संकेत: तनाव कम करने और बेहतर व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए भारत ने अमेरिका के प्रति सद्भावना संकेत के रूप में स्वैच्छिक टैरिफ कटौती की पेशकश की।
    • इस कदम का उद्देश्य निष्पक्ष व्यापार के प्रति भारत की प्रतिबद्धता तथा व्यापार संबंधी विवादों को सुलझाने में सहयोग करने की इच्छा को प्रदर्शित करना है।

टैरिफ़ को लेकर ट्रम्प का उद्देश्य

  • घरेलू उद्योग और रोज़गार को पुनर्जीवित करना: ट्रम्प के लिबरेशन डे टैरिफ के पीछे प्राथमिक उद्देश्य अमेरिकी घरेलू उद्योग को पुनर्जीवित करना और विनिर्माण रोजगारों को वापस लाना है, जो आउटसोर्सिंग तथा विदेशी बाजारों से प्रतिस्पर्धा के कारण खो गए थे। 
    • टैरिफ का उद्देश्य आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ाकर तथा घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करके अमेरिकी निर्मित उत्पादों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है।
  • दृष्टिकोण की आलोचना: ट्रम्प के दृष्टिकोण को वैश्विक व्यापार संबंधों के लिए विनाशकारी माना गया है, क्योंकि टैरिफ एक व्यापार युद्ध में बदल सकते हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित कर सकता है एवं घरेलू और वैश्विक दोनों अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुँचा सकता है। 
    • आलोचकों का तर्क है, कि ऐसे उपायों से घरेलू कार्यबल को लाभ पहुँचने की बजाय उपभोक्ताओं को हानि हो सकती है तथा अमेरिका में दैनिक प्रयोग की वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है।
  • दूसरों के लिए अवसर: आलोचना के बावजूद, ये टैरिफ भारत सहित अन्य देशों के लिए आपूर्ति शृंखला व्यवधानों का लाभ उठाकर अमेरिकी निर्माताओं से बाजार हिस्सेदारी छीनने का अवसर प्रस्तुत करते हैं। 
    • टैरिफ युद्ध के बीच, सस्ते विनिर्माण विकल्पों और विश्वसनीय व्यापार साझेदारों की तलाश करने वाली अमेरिकी कंपनियों के लिए ये देश संभावित रूप से वैकल्पिक स्रोत बन सकते हैं।

भारत की विनिर्माण वास्तविकता

  • विभिन्न योजनाएँ: भारत ने अपने विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई पहल शुरू की हैं, जिनमें राष्ट्रीय विनिर्माण नीति (NMP)मेक इन इंडिया, उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन स्कीम  और आत्मनिर्भर भारत शामिल हैं। 
    • इन योजनाओं का उद्देश्य आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देकर, विदेशी निवेश को आकर्षित और रोज़गार के अवसर उत्पन्न करके भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाना है।
  • सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र की भागीदारी: इन महत्त्वाकांक्षी नीतियों के बावजूद, भारत के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा 13-14% पर अपेक्षाकृत कम बना हुआ है, जो दर्शाता है कि इस क्षेत्र ने अभी तक वांछित वृद्धि हासिल नहीं की है। भारत को अभी भी उत्पादन बढ़ाने और औद्योगिक उत्पादन को पर्याप्त आर्थिक परिवर्तन के लिए आवश्यक स्तरों तक बढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
  • वैश्विक वस्तु निर्यात: भारत का वस्तु निर्यात वैश्विक निर्यात का 2% से भी कम है, जो अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में इसकी सीमित उपस्थिति को दर्शाता है।
    • यह आँकड़ा चीन जैसे अन्य विनिर्माण दिग्गजों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में भारत के संघर्ष तथा प्रमुख विनिर्माण क्षेत्रों में पर्याप्त वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के अभाव को दर्शाता है।

भारत विनिर्माण में क्यों पिछड़ गया?

  • उपभोग-आधारित विकास: भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः निर्यात-आधारित विकास की बजाय घरेलू उपभोग से प्रेरित रही है, जिसने वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की इसकी क्षमता को सीमित कर दिया है। 
    • अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारत की उपस्थिति बढ़ाने की बजाय आंतरिक माँग पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
    • उदाहरण के लिए: चीन की आर्थिक रणनीति विकास के मुख्य चालक के रूप में निर्यात पर बहुत अधिक निर्भर करती है। माल निर्यात चीन के सकल घरेलू उत्पाद में 18% का योगदान देता है, जो वैश्विक बाजारों पर इसकी निर्भरता को दर्शाता है।
  • वैश्विक महत्त्वाकांक्षा का अभाव: कई भारतीय व्यापारिक घरानों ने अन्य देशों के अपने समकक्षों के विपरीत,  वैश्विक विस्तार या वैश्विक विनिर्माण क्षमता के विकास को प्राथमिकता नहीं दी है।
    • वैश्विक महत्त्वाकांक्षा की कमी ने वैश्विक विनिर्माण में बड़ी हिस्सेदारी प्राप्त करने की उनकी क्षमता को सीमित कर दिया है।
  • तकनीक अपनाने में कमी: भारत का विनिर्माण क्षेत्र उन्नत प्रौद्योगिकी  और स्वचालन को अपनाने में धीमा रहा है। मुख्य रूप से घरेलू बाजारों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसके कारण अकुशलताएँ बढ़ी हैं और अधिक प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं में देखी गई गति से नवाचार करने में विफलता हुई है। 
    • प्रौद्योगिकी उन्नयन के अभाव ने भारत की वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता में बाधा उत्पन्न की है।

संबंधित समस्याएँ

  • भूमि अधिग्रहण और ऊर्जा लागत: भारत में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया जटिल और अधिक समय लेने वाली है, जिसमें भूमि की लागत बहुत अधिक है। इसके अतिरिक्त ऊर्जा लागत भी काफी अधिक है, जिससे भारतीय निर्माताओं की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होती है।
  • विलंबित स्वीकृति और कर विवाद: परियोजनाओं के लिए स्वीकृति मिलने में नौकरशाही प्रक्रियाओं की देरी और लंबे समय तक चलने वाले कर विवाद व्यवसायों के लिए अनिश्चित वातावरण निर्मित करते हैं। ये प्रशासनिक अड़चनें निवेशकों के विश्वास को कम करती हैं और औद्योगिक विकास की गति को धीमा कर देती हैं।
  • बड़े खिलाड़ियों के प्रति नियामक पूर्वाग्रह: एक नियामक पूर्वाग्रह मौजूद है, जो प्रायः बड़े निगमों का पक्ष लेता है, जिससे छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों (एसएमई) के लिए सफल होना  कठिन हो जाता है।
    • इस असमान व्यवहार के कारण बाजार शक्ति का संकेन्द्रण होता है, जिससे विनिर्माण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और नवाचार में कमी आती है।
  • क्षेत्रीय फोकस का अभाव: विनिर्माण क्षेत्र में चीन की सफलता का श्रेय व्यापक रूप से इलेक्ट्रॉनिक्ससौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) जैसे उच्च विकास वाले उद्योगों में केंद्रित निवेश को दिया जाता है। 
    • इसके विपरीत, भारत फार्मा और ऑटोमोबाइल जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में व्यापक रूप से स्थिर रहा है, जहाँ कभी इसकी बेहतर क्षमता थी। नवाचार, निवेश और बुनियादी ढाँचे की कमी ने इन उद्योगों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता में बाधा उत्पन्न की है।
  • स्पष्ट क्षेत्रीय रोडमैप का अभाव: भारत के विनिर्माण क्षेत्र में एक सुपरिभाषित क्षेत्रीय रोडमैप का अभाव है, जो केंद्रित विकास का मार्गदर्शन कर सके और निरंतर वृद्धि सुनिश्चित कर सके।

आगे की राह

  • भूमि, रसद और कर प्रणाली को सुलभ बनाना: भारत में विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं को आसान बनानेरसद को सुव्यवस्थित करने और कराधान प्रणालियों को सरल बनाने की अत्यधिक आवश्यकता है।
  • संघ-राज्य सहयोग: समन्वित विकास के लिए संघ और राज्य सरकारों के बीच प्रभावी सहयोग महत्त्वपूर्ण है। 
  • क्षेत्र-विशिष्ट वैश्विक नेतृत्व पर ध्यान केंद्रित करना: भारत को उन उद्योगों पर ध्यान केंद्रित करके  क्षेत्र-विशिष्ट नेतृत्व का लक्ष्य रखना चाहिए, जहाँ वह वैश्विक स्तर पर नेतृत्व कर सकता है।
    • इलेक्ट्रॉनिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों पर बल दिया जाना चाहिए, जहाँ भारत लक्षित निवेश और रणनीतिक नीतियों के साथ वैश्विक नेता बनने की क्षमता रखता है।

निष्कर्ष

वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में परिवर्तन के कारण भारत के समक्ष एक रणनीतिक अवसर है, जिससे नए राष्ट्रों के लिए जगह बन रही है। भारतीय विनिर्माण के लिए वैश्विक मंच पर स्वयं को स्थापित करने के लिए यह उचित समय  है। इस अवसर को भुनाने के लिए साहसिक सुधारों, निवेश और प्रतिस्पर्धी निर्यात रणनीति की आवश्यकता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

हाल ही में अमेरिका द्वारा ‘लिबरेशन डे टैरिफ’ लागू किए जाने के मद्देनजर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं द्वारा एकतरफा टैरिफ उपायों के वैश्विक आर्थिक निहितार्थों की जाँच कीजिए। इस संदर्भ में, विश्लेषण कीजिए कि भारत किस प्रकार संबंधित जोखिमों को कम कर सकता है और वैश्विक व्यापार पुनर्संरेखण में उभरते अवसरों का रणनीतिक रूप से लाभ उठा सकता है।

(15 अंक, 250 शब्द)

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