प्रश्न की मुख्य माँग
- राष्ट्रवादी भावना में योगदान
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उत्तर
“वंदे मातरम्,” जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंदमठ (वर्ष 1882) में रचना की, केवल एक कविता नहीं रही—यह एक राष्ट्रीय आह्वान बन गई। इसने भारत को एक पूजनीय मातृभूमि के रूप में आध्यात्मिक रूप से पुनर्परिभाषित किया और सांस्कृतिक भावनाओं को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक आंदोलन में रूपांतरित कर दिया।
राष्ट्रवाद की भावना में योगदान
- राष्ट्रभक्ति का आध्यात्मिक रूपांतरण: इस गीत ने भारत को दिव्य माता के रूप में प्रतिरूपित किया, जिससे देशभक्ति केवल राजनीति नहीं बल्कि भक्ति का रूप बन गई।
- उदाहरण: स्वदेशी आंदोलन (वर्ष 1905–1908) के दौरान यह गीत विशाल जनसभाओं में गाया गया, जिससे राजनीतिक विरोध एक धार्मिक आंदोलन जैसा बन गया।
- जन-आंदोलन का साधन: इसकी सरल और लयात्मक भाषा ने इसे अशिक्षित जनसमूहों तक भी सुलभ बना दिया।
- उदाहरण: मैडम भीकाजी कामा ने पेरिस से “बंदे मातरम्” नामक पत्रिका प्रारंभ की, जिससे विश्वभर में राष्ट्रीय संदेश का प्रसार हुआ।
- एकता का प्रतीक: यह गीत प्रारंभिक चरणों में हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए समान राष्ट्रीय नारा बन गया।
- उदाहरण: रबींद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन (कलकत्ता) में इसे गाकर संस्कृति और राजनीति के बीच सेतु स्थापित किया।
- राजनीतिक संघर्ष का युद्धनाद: “वंदे मातरम्” वाक्यांश जन जुलूसों और प्रदर्शनों का प्रमुख नारा बन गया, जिसने क्षेत्रीय नारों को प्रतिस्थापित कर दिया।
- सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक: यह गीत भारतीय सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन गया, जिसने ब्रिटिश सांस्कृतिक प्रभुत्व को चुनौती दी।
- उदाहरण: अबनींद्रनाथ टैगोर की चित्रकला “भारत माता” ने इस गीत की भावनात्मक आत्मा को दृश्य रूप में प्रस्तुत किया।
- बलिदान का प्रतीक: स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल, लाठीचार्ज या फाँसी के समय “वंदे मातरम्” का उद्घोष किया, जिससे यह शहादत का प्रतीक बन गया।
- उदाहरण: खुदीराम बोस (वर्ष 1908) ने फाँसी से पूर्व ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाए।
- भावी नेतृत्व को प्रेरणा: इस गीत ने आने वाले नेताओं, कवियों और विचारकों को गहराई से प्रभावित किया, जिन्होंने इसे जन जागरण की शक्ति के रूप में स्वीकारा।
निष्कर्ष
“वंदे मातरम्” केवल एक राष्ट्रीय गीत नहीं था, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का वैचारिक आधार था। इसने सांस्कृतिक गौरव को राजनीतिक आकांक्षा से जोड़ा, नागरिकता को पवित्र कर्तव्य में परिवर्तित किया और एक ऐसी सशक्त सामूहिक पहचान दी, जिसने भारत की स्वतंत्रता की अग्नि को प्रज्वलित किया।
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