Q. दुर्लभ पृथ्वी तत्व जलवायु लक्ष्यों, औद्योगिक नीति और वैश्विक राजनीति के बीच एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव पर स्थित हैं। ये परस्पर जुड़े कारक भारत के लिए घरेलू दुर्लभ पृथ्वी तत्व आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने में चुनौतियाँ और अवसर दोनों कैसे प्रस्तुत करते हैं? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत के लिए अवसर
  • भारत के लिए चुनौतियाँ

उत्तर

दुर्लभ मृदा तत्त्व आधुनिक उद्योग के “मूल पोषक” हैं—ऐसे बिंदु पर, जहाँ कार्बन तटस्थता की वैश्विक दौड़ औद्योगिक नीति के संरक्षणवाद तथा “संसाधन-हथियारकरण” से उत्पन्न अस्थिरता से आमने-सामने होती है। भारत के संदर्भ में ये तत्त्व मात्र संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्तियाँ हैं, जो हरित संक्रमण और संप्रभु औद्योगिक सुरक्षा के बीच के अंतर को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

भारत के लिए अवसर

  • भू-वैज्ञानिक भंडार की क्षमता: भारत के पास लगभग 6.9 मिलियन टन दुर्लभ पृथ्वी भंडार हैं, जिससे वह वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर है और आत्मनिर्भरता के लिए एक सुदृढ़ आधार उपलब्ध होता है।
    • उदाहरण: अमेरिकी भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (2024) के अनुसार, वर्तमान उत्पादन स्तरों की तुलना में भारत के भंडार एक बड़े अप्रयुक्त अवसर का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • जलवायु लक्ष्यों के साथ समन्वय: दुर्लभ मृदा तत्त्वों की शृंखला का विकास सीधे भारत के “पंचामृत” लक्ष्यों को गति देता है, विशेष रूप से वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने के उद्देश्य को।
    • उदाहरण: उच्च प्रदर्शन स्थायी चुंबक भारत की पवन ऊर्जा क्षमता को 140 गीगावाट तक विस्तारित करने की योजना के लिए अनिवार्य हैं।
  • औद्योगिक नीति का समर्थन: राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (वर्ष 2025) घरेलू खनन और प्रसंस्करण को प्रोत्साहित करने हेतु ₹16,300 करोड़ के बजट का प्रावधान  करता है।
    • उदाहरण: यह मिशन वर्ष 2030 तक 1,000 पेटेंट का लक्ष्य रखता है, जिससे खनिज निष्कर्षण में स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।
  • वैश्विक रणनीतिक साझेदारियाँ: भू-राजनीतिक परिवर्तनों से भारत को खनिज सुरक्षा साझेदारी और चतुर्भुज जैसे मंचों के माध्यम से प्रौद्योगिकी प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
    • उदाहरण: एकल-स्रोत निर्भरता से हटकर आपूर्ति शृंखला के विविधीकरण हेतु भारत का संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ सक्रिय सहयोग।
  • डाउनस्ट्रीम विनिर्माण को प्रोत्साहन: दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबकों के लिए ₹7,280 करोड़ की समर्पित योजना ऑक्साइड से तैयार चुंबकों तक एक पूर्ण मूल्य शृंखला स्थापित करने का लक्ष्य रखती है।
  • अपरंपरागत संसाधन पुनर्प्राप्ति: फ्लाई ऐश और एल्युमिनियम संयंत्रों से निकलने वाले “रेड मड” जैसे औद्योगिक उप-उत्पादों से दुर्लभ पृथ्वी तत्त्वों के निष्कर्षण की तकनीकी संभावनाएँ उपलब्ध हैं।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: खनन और खनिज विकास अधिनियम में हालिया संशोधनों से निजी कंपनियों को महत्त्वपूर्ण खनिजों की नीलामी और खनन की अनुमति मिली है, जिससे लंबे समय से चला आ रहा सार्वजनिक क्षेत्र का एकाधिकार समाप्त हुआ है।

भारत के लिए चुनौतियाँ

  • एकाधिकारवादी बाजार दबाव: वैश्विक प्रसंस्करण पर 90 प्रतिशत से अधिक नियंत्रण के कारण चीन कीमतों में परिवर्तन कर सकता है, जिससे भारत की नई परियोजनाएँ आर्थिक रूप से अव्यवहार्य हो जाती हैं।
    • उदाहरण: तैयार चुंबकों पर चीन के निर्यात प्रतिबंध (अप्रैल 2025) भारतीय इलेक्ट्रिकल व्हीकल  निर्माताओं के लिए तात्कालिक आपूर्ति जोखिम उत्पन्न करते हैं।
  • पर्यावरणीय शासन संबंधी बाधाएँ: दुर्लभ पृथ्वी तत्त्वों का निष्कर्षण अत्यधिक प्रदूषणकारी है; मोनाजाइट से संभावित रेडियोधर्मी प्रदूषण के भय से स्थानीय विरोध परियोजनाओं को रोक देता है।
    • उदाहरण: तमिलनाडु में भारतीय दुर्लभ पृथ्वी लिमिटेड की विस्तार योजनाओं को तटीय समुदायों के स्वास्थ्य संबंधी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
  • नियामक जटिलता: थोरियम युक्त दुर्लभ पृथ्वी तत्त्वों को “परमाणु खनिज” के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिससे वे परमाणु ऊर्जा अधिनियम (वर्ष 1962) और बहु-एजेंसी अनुमोदनों के अधीन हो जाते हैं।
  • पूँजी गहनता के जोखिम: पूर्ण पैमाने पर चुंबक विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने में भारी प्रारंभिक निवेश की आवश्यकता होती है, जिसकी परिपक्वता अवधि 5–8 वर्ष तक हो सकती है।
  • आयात पर निर्भरता: पर्याप्त भंडार होने के बावजूद भारत वर्तमान में वैश्विक उत्पादन का 1 प्रतिशत से भी कम उत्पादन करता है और दुर्लभ मृदा आधारित घटकों के लिए लगभग 80 प्रतिशत चीन पर निर्भर है।
  • अन्वेषण से निष्कर्षण में विलंब: प्रारंभिक अन्वेषण चरण की खोज को सक्रिय खदान में बदलने में वर्षों का नियामक और भू-वैज्ञानिक सत्यापन समय लगता है।

निष्कर्ष

इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को प्रयोगशाला से बाजार तक की दूरी कम करनी होगी, इसके लिए सामग्री प्रतिस्थापन अनुसंधान एवं विकास में निवेश और पर्यावरणीय स्वीकृतियों को सरल बनाना आवश्यक है। रणनीतिक भंडारण और अंतरराष्ट्रीय “मित्र-आधारित आपूर्ति” के संतुलन के माध्यम से भारत अपनी भू-वैज्ञानिक क्षमता को एक सुदृढ़, हरित औद्योगिक आधार में परिवर्तित कर सकता है, जो कार्बन-मुक्त होती दुनिया में उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को सुनिश्चित करेगा।

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