प्रश्न की मुख्य माँग
- न्यायपालिका की विकसित होती भूमिका।
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उत्तर
संवैधानिक नैतिकता का तात्पर्य मात्र कानूनी प्रावधानों के पालन के बजाए न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से है। संविधान की ‘सारभूत मानवता’ में निहित, यह एक मानक दिशा-निर्देश के रूप में कार्य करता है, जो लोकप्रिय भावना पर व्यक्तिगत गरिमा को प्राथमिकता देकर लोकतंत्र को बहुसंख्यकवादी निरंकुशता में बदलने से रोकता है।
न्यायपालिका की विकसित होती भूमिका
- प्रति-बहुसंख्यकवाद जाँच: न्यायपालिका “सार्वजनिक नैतिकता” या बहुसंख्यकवादी आवेगों के विरुद्ध अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक नैतिकता का उपयोग करती है।
- उदाहरण के लिए: नवतेज सिंह जौहर (2018) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि ‘बहुसंख्यकवादी सरकार का नैतिक दृष्टिकोण’ एलजीबीटीक्यू समुदाय के संवैधानिक अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता है।
- परिवर्तनकारी संविधानवाद: न्यायालय संविधान की व्याख्या एक जीवित दस्तावेज के रूप में करता है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय को समाप्त करना और समतावादी सामाजिक व्यवस्था को बढ़ावा देना है।
- उदाहरण के लिए: सबरीमाला मामले (2018) में, न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद-25 के तहत ‘सार्वजनिक नैतिकता’ को लैंगिक समानता की व्यापक संवैधानिक नैतिकता के अनुरूप होना चाहिए।
- संस्थागत अखंडता की सुरक्षा: संवैधानिक नैतिकता का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि संवैधानिक पदाधिकारी अपनी शक्तियों का प्रयोग पारदर्शिता और संयम के साथ करें।
- उदाहरण के लिए: तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल (2025) में, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर लंबे समय तक सहमति रोकना असंवैधानिक है और “सहकारी संघवाद” की भावना का उल्लंघन है।
- व्यक्तिगत गरिमा की सुरक्षा: न्यायपालिका गरिमा को संविधान के मूल मूल्यों में से एक मानती है, जिसका अर्थ है कि राज्य को प्रत्येक व्यक्ति के साथ मानवीय व्यवहार करना चाहिए, यहाँ तक कि कैदियों के साथ भी।
- उदाहरण के लिए: सितंबर 2025 में पूर्व CJI बी.आर. गवई ने मानवीय गरिमा को एक “अविभाज्य संवैधानिक मूल्य” के रूप में वर्णित किया , जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भाईचारे को एक साथ बाँधता है।
- मौलिक अधिकारों का विस्तार: अनुच्छेद-21 में “मूल मानवता” को शामिल कर, न्यायालय ने सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं का मौलिक अधिकारों की श्रेणी तक विस्तार किया है।
- उदाहरण के लिए: सुकदेब साहा निर्णय (2025) में, सर्वोच्च न्यायालय ने मानसिक स्वास्थ्य को एक मूल अधिकार के रूप में मान्यता दी है और इसे वैधानिक लाभ से संवैधानिक अधिकार में स्थानांतरित कर दिया।
- विधि का शासन सुनिश्चित करना: यह सिद्धांत संस्था-निर्माण में एक “लेजर बीम (सुस्पष्ट और केंद्रित दृष्टिकोण)” के रूप में कार्य करता है, यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता का प्रयोग मनमाना या निरंकुश नहीं हो।
- मतदाताओं को सशक्त बनाना: न्यायपालिका चुनाव और शासन में पारदर्शिता सुनिश्चित करके लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए इस सिद्धांत का उपयोग करती है।
- उदाहरण के लिए: न्यायपालिका द्वारा नोटा विकल्प के सुदृढ़ीकरण को यह सुनिश्चित करने के तरीके के रूप में उद्धृत किया जाता है कि मतदाताओं के पास एक सार्थक विकल्प और असहमति व्यक्त करने की क्षमता है।
- कानून और न्याय को जोड़ना: संवैधानिक नैतिकता न्यायाधीशों को अनुच्छेद-142 के तहत “पूर्ण न्याय” प्रदान करने के लिए ” सख्त शाब्दिक कानून (Black-letter law)” से परे देखने की अनुमति देती है।
निष्कर्ष
संवैधानिक नैतिकता “न्यायिक सर्वोच्चता के लिए तलवार” के बजाए “संवैधानिक अन्याय के खिलाफ ढाल” का कार्य करती है। हाल ही में मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक प्रशासन में निष्पक्षता और संयम की गारंटी में इस सिद्धांत के महत्त्व को उजागर किया है, विशेष रूप से ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ जैसे कार्यों में। संवैधानिक सारभूत मानवता में अपनी व्याख्याओं को आधार बनाकर, न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि भारत एक सिद्धांतवादी लोकतंत्र बना रहे, जहाँ विधि की ‘जीवंत भावना’ शब्दों के अक्षरशः अर्थ से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।
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