Q. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और प्रस्तावित नियामक सुधारों के माध्यम से उच्च शिक्षा में पहुँच, गुणवत्ता और समानता के मुद्दों को किस प्रकार संबोधित किया जा रहा है, इसका विश्लेषण कीजिए। ऐसे परिवेश में जहाँ निजी संस्थानों में अधिकांश नामांकन होते हैं, इस बात का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए कि क्या नियामक समेकन प्रभावी शासन और शिक्षार्थियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • पहुँच, गुणवत्ता और समता को संबोधित करना
  • NEP सुधारों से संबंधित चिंताएँ
  • शिक्षार्थियों के हितों की सुरक्षा और शासन 
  • निजी क्षेत्र के प्रभुत्व से जुड़ी चिंताएँ
  • इन चिंताओं को दूर करने के सुझाव 

उत्तर

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 एक परिवर्तनकारी रोडमैप के रूप में कार्य करती है, जो उच्च शिक्षा को ‘विनियमन-प्रधान’ शासन मॉडल से ‘सरल लेकिन कठोर’ शासन मॉडल की ओर ले जाती है। यह एक बहुविषयक, लचीले और वैश्वीकृत पारिस्थितिकी तंत्र की कल्पना करती है, जिसका उद्देश्य ज्ञान आधारित विकसित भारत @2047 के दृष्टिकोण को साकार करना है।

पहुँच, गुणवत्ता और समता को संबोधित करना

  • बहुविषयक शिक्षा प्रणाली: NEP ने ड्रॉपआउट को कम करने तथा आजीवन सीखने तक पहुँच को बेहतर बनाने के लिए 4-वर्षीय स्नातक कार्यक्रम पेश किए हैं, जिनमें कई प्रवेश/निकास बिंदु शामिल हैं।
    • उदाहरण: अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC) छात्रों को संस्थानों के बीच क्रेडिट्स को आसानी से संगृहीत और स्थानांतरित करने की अनुमति देता है।
  • नियामकीय समेकन: प्रस्तावित भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (HECI) का उद्देश्य भिन्न-भिन्न निकायों को एकरूपता प्रदान कर समान और उच्च-गुणवत्ता वाले शैक्षणिक मानक सुनिश्चित करना है।
    • उदाहरण के लिए: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, UGC और AICTE को एक एकल, कुशल नियामक में समेकित करने का प्रयास करता है।
  • समावेशन कोष: NEP ने समानता को संबोधित करने के लिए, लैंगिक समावेशन कोष (Gender Inclusion Funds) और विशेष शिक्षा क्षेत्र (Special Education Zones) की स्थापना का प्रावधान किया है, ताकि सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े समूहों का समर्थन किया जा सके।
    • उदाहरण: PM-USHA योजना के तहत आकांक्षी और सीमावर्ती जिलों में अवसंरचना और गुणवत्ता सुधार के लिए वित्तपोषण को प्राथमिकता दी जाती है।

NEP सुधारों से संबंधित चिंताएँ

  • संघवाद का कमजोर होना: HECI के माध्यम से केंद्रीकृत नियंत्रण, राज्यों की अपनी विश्वविद्यालयों को प्रबंधित करने में संवैधानिक भूमिका को कमजोर कर सकता है।
  • वित्तपोषण का हथियार के रूप में प्रयोग: अनुदान वितरण की शक्तियाँ शिक्षा मंत्रालय को हस्तांतरित करने से वित्तीय संसाधनों का राजनीतिक नियंत्रण के लिए उपयोग होने का खतरा उत्पन्न होता है।
  • ग्रामीण संस्थानों का हाशिए पर जाना: ‘सभी के लिए समान’ नियामकीय मानक लागू करने के कारण ऐसे ग्रामीण कॉलेजों को बंद करना पड़ सकता है, जिनमें शहरी स्तर की अवसंरचना नहीं है।
    • उदाहरण: एक संसदीय स्थायी समिति ने चेतावनी दी कि कड़े मानदंड दूरदराज के क्षेत्रों में अनजाने में निजीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं।

एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र में जहाँ निजी संस्थानों में अधिकांश नामांकन होते हैं, राज्य को संस्थागत स्वायत्तता और कठोर सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि निजी दक्षता शिक्षार्थियों के हितों से समझौता न करे।

शिक्षार्थियों के हितों की सुरक्षा  और शासन 

  • समान प्रकटीकरण मानक: समेकन यह सुनिश्चित करता है कि निजी हितधारक भी सार्वजनिक संस्थानों के समान ही कठोर वित्तीय और शैक्षणिक खुलासों के अधीन हों।
  • मान्यता-संबंधित स्वायत्तता: ‘विश्वास-आधारित’ प्रणाली की ओर बढ़ने से उच्च प्रदर्शन करने वाले निजी संस्थानों को अधिक स्वतंत्रता मिलती है, जबकि निगरानी आधारित प्रणाली ‘डिग्री मिल्स’ (Degree Mills) के रूप में कार्य करती है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) छात्र हितों की रक्षा के लिए द्विआधारी प्रत्यायन प्रणाली की ओर अग्रसर है।
  • मानकीकृत शुल्क संरचना: नियामक समेकन का उद्देश्य व्यावसायिक शिक्षा के अत्यधिक वाणिज्यीकरण को रोकने के लिए व्यापक “अधिकतम शुल्क सीमा” दिशा-निर्देश तैयार करना है।

निजी प्रभुत्व से संबंधित चिंताएँ

  • नियामक पर दबाव: बड़े निजी समूह मानकों को कमजोर करने या छोटे प्रतियोगियों को दबाने के लिए केंद्रीय नियामक पर अनुचित रूप से प्रभाव डाल सकते हैं।
    • उदाहरण: शिक्षाविदों ने चेतावनी दी है कि ‘सरल लेकिन कठोर’ नियमन का लाभ उठाकर अच्छी तरह से वित्त पोषित निजी विश्वविद्यालय सामाजिक आरक्षण मानदंडों को दरकिनार कर सकते हैं।
  • डिजिटल विभाजन के जोखिम: निजी नेतृत्व वाली डिजिटल शिक्षा (जैसे- ODL) पर निर्भर रहने से कम आय वाले परिवारों के उन छात्रों को बाहर रखा जा सकता है जिनके पास हाई-स्पीड कनेक्टिविटी की कमी है।
    • उदाहरण: रिपोर्टों से पता चलता है कि राष्ट्रीय डिजिटल विश्वविद्यालय होने के बावजूद, पहुँच अभी भी शहरी एवं संपन्न जनसंख्या तक ही है।
  • अपर्याप्त शिकायत निवारण: केंद्रीकृत निकायों में अक्सर स्थानीय स्तर पर उपस्थिति नहीं होती, जो शक्तिशाली निजी प्रबंधन के खिलाफ व्यक्तिगत छात्र विवादों को सुलझाने के लिए आवश्यक है।

इन चिंताओं को दूर करने के सुझाव

  • राज्य प्रतिनिधित्व को संस्थागत बनाना: यह सुनिश्चित करना कि HECI में क्षेत्रीय विविधता और संघीयता का सम्मान करने के लिए राज्य उच्च शिक्षा परिषदों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व शामिल हो।
  • स्वतंत्र वित्तपोषण निकाय: अनुदान वितरण का कार्य सीधे मंत्रालय के तहत न होकर अर्द्ध-स्वायत्त एजेंसी को सौंपा जाना चाहिए।
  • स्थानीय लोकपाल प्रणाली: संस्थागत कदाचार के खिलाफ शिक्षार्थियों को सुलभ शिकायत निवारण प्रदान करने के लिए राज्य स्तरीय स्वतंत्र लोकपालों की स्थापना की जाए।

निष्कर्ष

विकसित भारत के लिए, उच्च-गुणवत्ता वाली शिक्षा के लिए राज्य और संस्थानों (सार्वजनिक और निजी) के बीच गहरा विश्वास आवश्यक है, साथ ही उत्कृष्टता के प्रति अडिग प्रतिबद्धता भी। ‘संदेह की संस्कृति’ से ‘जवाबदेह स्वायत्तता’ की ओर बढ़कर, भारत वर्ष 2047 तक एक ऐसा लचीला पारिस्थितिकी तंत्र बना सकता है जो शिक्षार्थियों की रक्षा करते हुए वैश्विक मानकों के नवाचार को बढ़ावा दे।

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