Q. वित्त आयोग के विकेंद्रीकरण और संसदीय परिसीमन में जनसंख्या आकार को प्रमुख मानदंड के रूप में उपयोग करने के निहितार्थों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। जनसांख्यिकीय समानता को राजकोषीय निष्पक्षता और सहकारी संघवाद के सिद्धांतों के साथ संतुलित करने के लिए संभावित समाधान सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • जनसंख्या को प्रमुख मानदंड के रूप में मानने के सकारात्मक प्रभाव
    • वित्त आयोग का स्थानांतरण 
    • संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन
  • नकारात्मक प्रभाव: ‘प्रगति पर दंड’
    • वित्त आयोग का हस्तांतरण
    • संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन
  • संतुलित संघवाद के लिए सुझाए गए समाधान

उत्तर

वित्त आयोग (अनुच्छेद 280) द्वारा प्रदान किया गया क्षैतिज विकेंद्रीकरण और संसदीय परिसीमन (अनुच्छेद 82) भारत की संघीय संरचना के दो प्रमुख स्तंभ हैं। यद्यपि जनसंख्या किसी राज्य की ‘आवश्यकता’ और लोकतांत्रिक ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ के मूल्य का सबसे वस्तुनिष्ठ मापक है, फिर भी इसका प्रभुत्व एक विरोधाभास उत्पन्न करता है, जहाँ जनसंख्या स्थिरीकरण जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों में सफल होने पर राज्यों को दंडित किया जाता है।

प्रमुख मानदंड के रूप में जनसंख्या के सकारात्मक निहितार्थ

वित्त आयोग का हस्तांतरण

  • व्यय आवश्यकताओं का मापन: जनसंख्या प्रत्यक्ष सेवा प्रदान करने की आवश्यकताओं (शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना) का अनुमान लगाने का माध्यम बनती है, जिसे किसी राज्य को पूरा करना होता है।
    • उदाहरण: 15वें वित्त आयोग ने जनसंख्या (वर्ष 2011 जनगणना) को राज्य की वित्तीय ‘लागत अक्षमता’ का एक मूलभूत संकेतक मानते हुए 15% भारांक दिया।
  • क्षैतिज समानता सुनिश्चित करना: यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक, चाहे वह किसी भी राज्य में रहता हो, केंद्रीय कर पूल का लगभग समान हिस्सा प्राप्त करे।

संसदीय परिसीमन

  • लोकतांत्रिक प्रतिनिधि समानता: जनसंख्या आधारित परिसीमन ‘एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखता है, यह सुनिश्चित करता है कि सांसद लगभग समान आकार के निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करें।
  • जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का प्रतिबिंब: समय-समय पर समायोजन यह सुनिश्चित करता है कि तीव्र शहरीकरण या प्रवासन वाले क्षेत्रों को राष्ट्रीय नीति निर्माण में कम प्रतिनिधित्व न मिले।

नकारात्मक प्रभाव: “प्रगति पर दंड”

वित्त आयोग का हस्तांतरण

  • सामाजिक सफलता को हतोत्साहित करना: ऐसे राज्य जिन्होंने कम कुल प्रजनन दर (TFR) हासिल करने के लिए स्वास्थ्य और साक्षरता में भारी निवेश किया है, उन्हें विभाज्य कोष में अपने हिस्से में कमी का सामना करना पड़ता है।
    • उदाहरण: तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों में वर्ष 1971 से 2011 में हुए जनगणना परिवर्तनों के बाद कर कोष में उनकी हिस्सेदारी में काफी कमी देखी गई।
  • राजकोषीय अन्याय संबंधी चिंताएँ: विकसित राज्य यह तर्क देते हैं कि वे जीएसटी और प्रत्यक्ष करों में सबसे अधिक योगदान देते हैं, लेकिन बदले में उन्हें घटता हुआ प्रतिफल मिलता है, जिससे उच्च-गुणवत्ता वाली अवसंरचना को बनाए रखने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है।

संसदीय परिसीमन

  • क्षेत्रीय राजनीतिक असंतुलन: जनसंख्या आधारित परिसीमन ‘एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बरकरार रखता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सांसद मतदाताओं के लगभग समान वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • सहकारी संघवाद का क्षरण: समय-समय पर किए जाने वाले समायोजन से यह सुनिश्चित होता है कि तीव्र शहरीकरण या प्रवासन का सामना कर रहे क्षेत्रों को राष्ट्रीय नीति निर्माण में कम प्रतिनिधित्व न मिले।
    • उदाहरण: तमिलनाडु विधानसभा ने वर्ष 2026 की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का विरोध करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और इसे ‘लोकतंत्र के लिए खतरा’ बताया।

संतुलित संघ के लिए सुझाए गए समाधान

  • जनसांख्यिकीय प्रदर्शन को शामिल करना: 15वें वित्त आयोग के मॉडल का अनुसरण करते हुए उन राज्यों को पर्याप्त महत्त्व देना, जिन्होंने अपनी प्रजनन दर को कम किया है।
    • उदाहरण: “जनसांख्यिकीय प्रदर्शन” के लिए 12.5% का भार उन राज्यों को पुरस्कृत करने में मदद करता है, जिन्होंने 2.1 से कम कुल प्रजनन दर (TFR) का लक्ष्य हासिल किया है।
  • अंतर-राज्य पुनर्वितरण पर रोक: वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर राज्य-वार अनुपात को बनाए रखते हुए लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाएँ।
    • उदाहरण: समर्थक लोकसभा की सदस्य संख्या 866 तक बढ़ाने का सुझाव देते हैं, ताकि सभी राज्यों को लाभ मिले और उत्तरी राज्यों का सापेक्ष लाभ सीमित रहे।
  • राज्यसभा को सशक्त बनाना: उच्च सदन को ऐसा निकाय बनाना, जिसमें सभी राज्यों का समान प्रतिनिधित्व हो (अमेरिका के सीनेट के समान), ताकि लोकसभा में जनसंख्या आधारित प्रभुत्व के खिलाफ संघीय हितों की रक्षा हो सके।
  • स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना: सेवा वितरण सुनिश्चित करने के लिए पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को अधिक वित्तीय अधिकार सीधे सौंपे जाएँ, ताकि यह राज्य स्तर के राजनीतिक प्रतिनिधित्व विवादों का शिकार न बने।
  • समावेशी परिसीमन मानदंड: सीटों के आवंटन का निर्धारण करने के लिए जनसंख्या के साथ-साथ भौगोलिक क्षेत्र और आर्थिक योगदान को शामिल करके परिसीमन की पुनर्कल्पना करना।

निष्कर्ष

वर्ष 2026 को लेकर चल रही बहस भारत की ‘मानवता’ और संवैधानिक नैतिकता की परीक्षा है। ‘विविधता में एकता’ को बनाए रखने के लिए, भारत को एक व्यापक संघीय समझौता विकसित करना होगा, जिसमें जनसांख्यिकीय संतुलन को प्रदर्शन-आधारित वित्तीय प्रोत्साहन के साथ स्थापित किया जा सके। केवल यह सुनिश्चित करके कि ‘प्रगति दंड न बने’, भारत एक विकसित भारत में परिवर्तित हो सकता है जो लोकतांत्रिक रूप से प्रतिनिधि और वित्तीय रूप से निष्पक्ष दोनों हो।

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