Q. शिक्षा में प्रारंभिक विशेषज्ञता पर जोर देने से अक्सर बच्चे की सीखने की यात्रा में अन्वेषण और क्रमिक विकास के महत्व की अनदेखी हो जाती है। इस प्रवृत्ति के व्यक्तिगत विकास और समाज दोनों पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा कीजिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आलोक में, भारत की शिक्षा प्रणाली प्रारंभिक उच्च प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, समय के साथ विविध कौशलों को बढ़ावा देने वाले संतुलित दृष्टिकोण को कैसे प्रोत्साहित कर सकती है? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • प्रारंभिक विशेषज्ञता के निहितार्थ
  • NEP 2020: संतुलित दृष्टिकोण को बढ़ावा देना।

उत्तर

प्रारंभिक विशेषज्ञता पर प्रचलित जोर, जिसे अक्सर ‘टाइगर वुड्स मॉडल’ कहा जाता है, कम आयु से ही गहन और केंद्रित प्रशिक्षण को प्राथमिकता देता है। हालाँकि, यह दृष्टिकोण अन्वेषण के महत्त्व को नजरअंदाज करता है, जहाँ उत्कृष्टता, प्रारंभिक उच्च-प्रदर्शन दबाव के बजाय व्यापक अनुभवों और क्षमताओं के विकास के माध्यम से धीरे-धीरे विकसित होती है।

प्रारंभिक विशेषज्ञता के निहितार्थ

  • सीमित कौशल समूह: किसी एक क्षेत्र पर समय से पूर्व ध्यान केंद्रित करने से “संज्ञानात्मक अनुकूलन क्षमता” सीमित हो जाती है, जिससे व्यक्ति जटिल परिस्थितियों में विभिन्न क्षेत्रों में अपने ज्ञान का प्रभावी हस्तांतरण करने में असमर्थ हो जाता है।
    • उदाहरण: डेविड एपस्टीन की पुस्तक “रेंज” इस बात पर प्रकाश डालती है कि सामान्य ज्ञान रखने वाले अक्सर सफल होते हैं क्योंकि वे हस्तांतरणीय कौशल, अनुकूलन क्षमता और बेहतर निर्णय क्षमता विकसित करते हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य संकट: उच्च अंक प्राप्त करने की निरंतर प्रतिस्पर्द्धा “या तो सफल अथवा असफल” की स्थिति उत्पन्न करती है, जिससे किशोरों में दीर्घकालिक चिंता और भावनात्मक थकान उत्पन्न होती है।
  • नवाचार की कमी: रटने पर आधारित विशेषज्ञता को प्राथमिकता देने वाला समाज मौलिक विचारकों के बजाय “कुशल अनुकरणकर्ता” उत्पन्न करता है, जिससे 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए आवश्यक अंतःविषयक नवाचार अवरुद्ध हो जाता है।
  • थकान और ड्रॉपआउट: बचपन में ही कठोर चुनौतियों का सामना करने वाले बच्चे अक्सर आंतरिक प्रेरणा खो देते हैं, जिससे वयस्कता में उच्च ड्रॉपआउट दर या कॅरियर असंतोष उत्पन्न होता है।
  • बचपन का क्षरण: उच्च कक्षाओं का “अलिखित नियम” छात्रों को एक निरंतर प्रतिस्पर्द्धा में झोंक देता है, जिससे खेल-खेल में की गई खोज की जगह संरचित, तनावपूर्ण श्रम ले लेता है।
    • उदाहरण: 70% से अधिक भारतीय छात्र सामाजिक और माता-पिता के दबाव के कारण मध्यम से उच्च स्तर की चिंता का अनुभव करते हैं।

NEP 2020: संतुलित दृष्टिकोण को बढ़ावा देना

  • 5+3+3+4 पाठ्यचर्या संरचना: 3-6 आयु वर्ग को औपचारिक स्कूली शिक्षा के अंतर्गत लाकर, नई शिक्षा नीति प्रारंभिक वर्षों में औपचारिक अकादमिक शिक्षा के बजाय खेल-आधारित/गतिविधि-आधारित शिक्षा पर बल देती है।
    • उदाहरण: बुनियादी चरण (बाल वाटिका) में उच्च-प्रदर्शन परीक्षण के बजाय खेलों के माध्यम से संज्ञानात्मक विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
  • कठोर माध्यम विभाजन का अभाव: कला, विज्ञान और वाणिज्य के बीच की सीमाओं को तोड़कर, छात्रों को माध्यमिक विद्यालय में विविध रुचियों का पता लगाने की अनुमति मिलती है।
    • उदाहरण: एक छात्र अब फैशन स्टडीज के साथ भौतिकी का अध्ययन कर सकता है, जिससे जीवन में पहले ही “बहुविषयक” मानसिकता को बढ़ावा मिलता है।
  • 360-डिग्री समग्र प्रगति कार्ड (HPC): अंकों से परे जाकर, HPC संज्ञानात्मक, भावात्मक और मनोप्रेरक क्षेत्रों में विकास को ट्रैक करता है, जिसमें स्व-मूल्यांकन और सहपाठी मूल्यांकन शामिल हैं।
    • उदाहरण: PARAKH द्वारा विकसित HPC, शैक्षणिक योग्यताओं के साथ-साथ सहानुभूति और मददगार स्वभाव जैसे सामाजिक-भावनात्मक कौशलों को भी रिकॉर्ड करता है।
  • व्यावसायिक अनुभव (कक्षा 6): व्यावसायिक शिल्प और इंटर्नशिप को प्रारंभिक चरण में ही शामिल करने से यह सुनिश्चित होता है कि छात्र सैद्धांतिक रूप से रटने के बजाय अनुभवात्मक “व्यावहारिक” कार्य के माध्यम से सीखते हैं।
    • उदाहरण: मिट्टी के बर्तन बनाने या बढ़ईगिरी जैसे स्थानीय शिल्पों को शिक्षा में शामिल करने से बच्चों को “कुलीन” प्रदर्शन के दबाव के बिना विविध कौशलों का महत्त्व समझने में मदद मिलती है।
  • मूल्यांकन सुधार (कक्षा 3, 5, 8): बोर्ड परीक्षाओं को रटने के बजाय मूल अवधारणाओं का परीक्षण करने के लिए पुनर्रचित किया गया है, जिससे पारंपरिक स्कूली शिक्षा का “उच्च जोखिम” वाला स्वरूप कम हो गया है।
  • एकाधिक प्रवेश/निकास बिंदु: उच्च शिक्षा में, प्रमाण-पत्र या डिप्लोमा के साथ बाहर निकलने की सुविधा एक गैर-रेखीय कॅरियर पथ की अनुमति देती है, जिससे “पीछे छूट जाने का डर” कम हो जाता है।

निष्कर्ष

शिक्षा में वास्तविक प्रगति “प्रतिभाशाली बच्चों की खोज” से आगे बढ़कर “प्रत्येक बच्चे में छिपी क्षमता को निखारने” से ही संभव है। हमें महत्त्वाकांक्षा और धैर्य के बीच संतुलन बनाए रखना होगा और उत्कृष्टता के क्रमिक विकास पर जोर देना होगा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के समग्र ढाँचे का लाभ उठाकर भारत अपनी जनसांख्यिकीय लाभांश को एक रचनात्मक, सशक्त और भावनात्मक रूप से सुरक्षित कार्यबल में परिवर्तित कर सकता है।

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