Q. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में सीमा पार भुगतानों में पारदर्शिता और दक्षता में सुधार के लिए भारत की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) को ब्रिक्स देशों की मुद्राओं से जोड़ने का प्रस्ताव दिया है। भारत की वित्तीय प्रणाली, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और मौद्रिक संप्रभुता के लिए इस ढाँचे के संभावित लाभों और चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • इस ढाँचे के संभावित लाभ
  • इस ढाँचे की संभावित चुनौतियाँ
  • चुनौतियों को कम करने के उपाय

उत्तर

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में भारत द्वारा आयोजित होने वाले वर्ष 2026 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के एजेंडे में केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं (CBDC) को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव रखा है। 2025 रियो घोषणापत्र पर आधारित इस प्रस्ताव का उद्देश्य डिजिटल रुपये और अन्य ब्रिक्स डिजिटल मुद्राओं के लिए एक तकनीकी और निपटान स्तर का जुड़ाव स्थापित करना है ताकि सीमा पार भुगतान को सुगम बनाया जा सके।

इस ढाँचे के संभावित लाभ

वित्तीय प्रणाली के लिए

  • मध्यस्थता लागत में कमी: पारंपरिक “करेस्पॉन्डेंट बैंकिंग” मॉडल को दरकिनार कर, CBDC लिंकिंग, सीमा पार लेन-देन की लागत को लगभग 50% तक कम कर सकती है।
    • उदाहरण: पारंपरिक सीमा पार भुगतान में वर्तमान में 3–6% शुल्क लगता है, जिसे डायरेक्ट पीयर-टू-पीयर डिजिटल निपटान के माध्यम से कम किया जा सकता है।
  • वास्तविक समय में निपटान: यह “T+2” निपटान की देरी को समाप्त करता है, जिससे केंद्रीय बैंकों के बीच लगभग तात्कालिक लेन-देन संभव हो पाता है।
    • उदाहरण: mBridge पायलट परियोजना, जिसमें चीन और संयुक्त अरब अमीरात शामिल थे, ने लेन-देन के समय में 80% की कमी दर्शाई है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए

  • व्यापारिक दक्षता में वृद्धि: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) स्थानीय डिजिटल मुद्राओं में सीधे इनवॉइस का निपटान कर सकते हैं, जिससे मध्यवर्ती मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर की जटिलताओं से बचा जा सकता है।
    • उदाहरण: ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार प्रति वर्ष $500 बिलियन से अधिक है, जिसमें से अधिकांश को मुद्रा रूपांतरण की जटिलताओं में कमी से लाभ हो सकता है।
  • प्रतिबंधों के विरुद्ध लचीलापन: प्रत्यक्ष डिजिटल मार्ग ऐसे व्यापारिक साझेदारों के साथ व्यापार को जारी रखने की अनुमति देते हैं, जो SWIFT नेटवर्क से प्रतिबंधित हो सकते हैं।
    • उदाहरण: डॉलर-केंद्रित ढाँचे के बाहर रूस और ईरान को भुगतान करना संभव हो जाता है।

मौद्रिक संप्रभुता के लिए

  • रणनीतिक स्वायत्तता: अंतरराष्ट्रीय भंडारण और निपटान के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को घटाना, भारत की अर्थव्यवस्था को अमेरिकी मौद्रिक नीति के प्रभावों से सुरक्षित करता है।
  • पारदर्शिता में सुधार: ब्लॉकचेन आधारित अभिलेख एक “डिजिटल फिंगरप्रिंट” प्रदान करते हैं, जो केंद्रीय बैंकों को मनी लॉण्ड्रिंग और कर चोरी पर नजर रखने में सहायता करता है।
    • उदाहरण: ई-रुपया की प्रोग्रामेबिलिटी (Programmability) लक्षित व्यापार वित्तपोषण और स्वचालित अनुपालन जाँच को सक्षम बनाती है।

इस ढाँचे की संभावित चुनौतियाँ

वित्तीय प्रणाली के लिए

  • साइबर सुरक्षा जोखिम: एक केंद्रीकृत या अर्द्ध-केंद्रीकृत अंतर्संबद्ध प्रणाली बड़े पैमाने पर साइबर हमलों के लिए एक “एकल विफलता बिंदु” बन सकती है।
  • बैंकिंग मध्यस्थता का ह्रास: यदि खुदरा या थोक उपयोगकर्ता “सुरक्षित” CBDC वॉलेट्स में जमा स्थानांतरित करते हैं, तो वाणिज्यिक बैंकों को तरलता संकट और ऋण सृजन में गिरावट का सामना करना पड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए

  • व्यापार असंतुलन: जिन देशों का व्यापार अधिशेष अधिक है, वे किसी अन्य देश की डिजिटल मुद्रा में विशाल राशि जमा कर सकते हैं, जिसका घरेलू उपयोग सीमित होता है।
    • उदाहरण: “रुपया-रूबल” के अनुभव से पता चला कि रूस ने अतिरिक्त रुपये जमा कर लिए थे, जिनका वह उपयोग नहीं कर सका, जिसके कारण उसे भारतीय बॉण्ड्स में पुनर्निवेश करना पड़ा।
  • भू-राजनीतिक प्रतिशोध: डॉलर आधारित प्रणाली से हटने की कोशिश संयुक्त राज्य अमेरिका से शुल्क-आधारित प्रतिशोध या राजनयिक तनाव को जन्म दे सकती है।
    • उदाहरण: हाल ही में अमेरिका द्वारा जारी राजनीतिक चेतावनियों में, सक्रिय रूप से डॉलर-विरोधी प्रयास कर रहे देशों पर 100% टैरिफ लगाने की चेतावनी दी गई है।

मौद्रिक संप्रभुता के लिए

  • पूँजी नियंत्रण में व्यवधान: तीव्र सीमापार डिजिटल प्रवाह, RBI की पूँजी खाता प्रतिबंधों को प्रबंधित करने की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं।
  • तकनीकी प्रभुत्व: एक साझा मंच पर निर्भरता से कोई तकनीकी रूप से श्रेष्ठ भागीदार (जैसे कि चीन) मानक और शासन नियम निर्धारित कर सकता है।
    • उदाहरण: mBridge जैसी बहु-CBDC परियोजनाओं में चीन के डिजिटल युआन के प्रभुत्व को लेकर चिंताएँ मौजूद हैं।

चुनौतियों को कम करने के उपाय

  • द्विपक्षीय विदेशी मुद्रा स्वैप: व्यापार विषमताओं को प्रबंधित करने के लिए फॉरेक्स स्वैप व्यवस्था का उपयोग करके शुद्ध लेनदेन स्थितियों का आवधिक (साप्ताहिक/मासिक) निपटान लागू करना।
  • स्तरीय अंतरसंचालनीयता: एकल साझा मंच के बजाय, सामान्य API मानकों का उपयोग किया जाए ताकि प्रत्येक देश अपनी प्रौद्योगिकीय स्वायत्तता बनाए रख सके।
  • संतुलित कूटनीति: इस पहल को एक वैचारिक “एंटी-डॉलर” समूह के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण के लिए एक “तकनीकी दक्षता” परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
  • सैंडबॉक्स परीक्षण: सभी ब्रिक्स सदस्य देशों में पूर्ण कार्यान्वयन से पूर्व पर्यटन या ऊर्जा जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के लिए सीमित उपयोग वाले पायलट प्रोजेक्ट्स शुरू किए जाएँ।

निष्कर्ष

RBI का प्रस्ताव “संतुलित व्यावहारिकता” का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो वित्तीय दक्षता की खोज और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करता है। हालाँकि इसका उद्देश्य डॉलर की भूमिका को त्वरित रूप से समाप्त करना नहीं है, लेकिन यह खंडित वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्त्वपूर्ण अतिरिक्त अवसंरचना का निर्माण करता है। तकनीकी और भूराजनीतिक बाधाओं को दूर करने के लिए मार्गदर्शक नेतृत्व और सावधानी बरतते हुए, भारत अधिक लचीली और बहुध्रुवीय वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की ओर संक्रमण का नेतृत्व कर सकता है।

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