Q. भारत जनसांख्यिकीय लाभांश से जनसांख्यिकीय चुनौती की ओर बढ़ रहा है। उभरते जनसांख्यिकीय रुझानों और आर्थिक विकास पर उनके प्रभावों पर चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • उभरते जनसांख्यिकीय रुझानों की चर्चा कीजिए।
  • आर्थिक विकास पर जनसांख्यिकीय रुझानों के प्रभावों की चर्चा कीजिए।

उत्तर

जनसंख्या वृद्धि की धीमी गति, घटती प्रजनन दर और बढ़ती वृद्धावस्था के साथ भारत का जनसांख्यिकीय संक्रमण एक महत्त्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर रहा है। जहाँ पूर्व के दशकों में जनसांख्यिकीय लाभांश का अनुमान था, वहीं उभरते रुझान अब संरचनात्मक परिवर्तनों का संकेत दे रहे हैं, जो नए आर्थिक अवसर और चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं।

उभरते जनसांख्यिकीय रुझान

  • जनसंख्या वृद्धि में मंदी: जनसंख्या वृद्धि दर घटकर लगभग 0.5% प्रतिवर्ष रह गई है, जो स्थिरीकरण चरण की ओर संकेत करती है।
    • उदाहरण: पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अनुसार, जनसंख्या वर्ष 2021 में 1.35 अरब से बढ़कर 2051 तक 1.59 अरब होने का अनुमान है।
  • प्रजनन दर में गिरावट: घटती जन्म दर के कारण बाल जनसंख्या और भविष्य में कार्यबल की आपूर्ति पर प्रभाव पड़ रहा है।
    • उदाहरण: 0–4 वर्ष आयु वर्ग में मध्य शताब्दी तक तेज गिरावट का अनुमान है।
  • स्कूली आयु की जनसंख्या में कमी: नामांकन में कमी के कारण सरकारी स्कूलों की संख्या घट रही है।
    • उदाहरण: यूडाइस प्लस (UDISE+) के अनुसार, सरकारी स्कूलों की संख्या वर्ष 2014-15 में 11.07 लाख से घटकर वर्ष 2023-24 में 10.18 लाख रह गई।
  • कार्यशील आयु जनसंख्या का शिखर और गिरावट: कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या वर्ष 2041 के आस-पास अपने शिखर पर पहुँचेगी और उसके बाद गिरावट शुरू होगी।
    • उदाहरण: वर्ष 2041 में कार्यबल लगभग 1,009 मिलियन तक पहुँचने के बाद वर्ष 2051 तक घटने लगेगा।
  • तेजी से वृद्ध होती जनसंख्या: वृद्ध जनसंख्या का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है, जिससे निर्भरता अनुपात में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आएगा।
    • उदाहरण: 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों का प्रतिशत वर्ष 2021 में 9.6% से बढ़कर 2051 में 20.5% होने का अनुमान है।

आर्थिक वृद्धि पर प्रभाव

  • जनसांख्यिकीय लाभांश की सीमित होती अवधि: कार्यबल वृद्धि में कमी के कारण वर्ष 2041 के बाद आर्थिक विस्तार की गति धीमी हो सकती है, जिससे विकास की गति पर प्रभाव पड़ेगा।
    • उदाहरण: जापान की वृद्ध होती जनसंख्या के कारण दीर्घकालिक आर्थिक ठहराव देखने को मिला, जो घटते कार्यबल के जोखिम को दर्शाता है।
  • राजकोषीय बोझ में वृद्धि: पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर सरकारी व्यय बढ़ेगा।
    • उदाहरण: भारत में राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) पर खर्च, वृद्ध लाभार्थियों की संख्या बढ़ने के साथ बढ़ रहा है।
  • शिक्षा और कौशल की बदलती माँग: अब ध्यान केवल विस्तार से हटकर गुणवत्ता और कौशल विकास पर केंद्रित करना होगा।
    • उदाहरण: स्किल इंडिया मिशन रोजगार योग्यता बढ़ाने पर ध्यान दे रहा है, क्योंकि विद्यालयी नामांकन स्थिर हो रहे हैं।
  • स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती माँग: वृद्धजन देखभाल और दीर्घकालिक रोग प्रबंधन पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होगी, जिससे स्वास्थ्य प्रणाली के पुनर्गठन की जरूरत पड़ेगी।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (NPHCE) प्राथमिक और जिला स्तर पर वृद्धजन सेवाओं को सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखता है।
  • सिल्वर अर्थव्यवस्था के अवसर: वृद्ध जनसंख्या के बढ़ने से नई बाजार संभावनाएँ और सेवाओं का विकास होगा, विशेषकर वृद्धजन देखभाल और सहायक प्रौद्योगिकियों में।
    • उदाहरण: सीनियरकेयर एजिंग ग्रोथ इंजन (SAGE) पहल, वृद्धजन सेवाओं से जुड़े नवाचारों और स्टार्ट-अप्स को प्रोत्साहित कर रही है।

निष्कर्ष

भारत का जनसांख्यिकीय संक्रमण एक दूरदर्शी रणनीति की माँग करता है, जिसमें शेष जनसांख्यिकीय लाभांश का अधिकतम उपयोग, मानव पूँजी को सुदृढ़ करना, महिला कार्यबल भागीदारी को बढ़ाना तथा एक मजबूत सिल्वर अर्थव्यवस्था का निर्माण शामिल हो। इस प्रकार, वृद्धावस्था को बोझ के रूप में नहीं, बल्कि सतत् और लचीली आर्थिक वृद्धि के एक महत्त्वपूर्ण चालक के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है।

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