Q. अनिवार्य मतदान भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत है और इसमें कई गंभीर तार्किक बाधाएँ हैं। विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट के आलोक में, इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए वैकल्पिक उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • अनिवार्य मतदान: लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध तर्क एवं व्यावहारिक चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
  • बताइए कि क्यों अनिवार्य मतदान पूर्णतः लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं है।
  • मतदाता भागीदारी बढ़ाने के वैकल्पिक उपाय सुझाइए।

उत्तर

भारतीय चुनावों में कम मतदाता भागीदारी को लेकर बार-बार उठती चिंताओं के बीच अनिवार्य मतदान पर बहस पुनः उभर कर सामने आई है। भारत के विधि आयोग (255वीं रिपोर्ट) ने लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यावहारिकता के बीच संतुलन स्थापित करते हुए इस विषय का सूक्ष्म मूल्यांकन प्रस्तुत किया है।

अनिवार्य मतदान: लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध तर्क एवं व्यावहारिक चुनौतियाँ

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में मतदान से परहेज भी शामिल: मतदान के विकल्प में अनुच्छेद-19(1)(a) के अंतर्गत मतदान न करने का अधिकार भी शामिल है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में मतदान को एक वैधानिक अधिकार माना गया है, न कि अनिवार्य कर्तव्य।
  • न तो संवैधानिक, न ही नैतिक कर्तव्य: मतदान न तो मौलिक कर्तव्यों में शामिल है और न ही यह विधिक रूप से बाध्यकारी दायित्व है।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-326 सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार सुनिश्चित करता है, परंतु मतदान को अनिवार्य नहीं बनाता।
  • असंगत दंडात्मक परिणाम: जुर्माना या सेवाओं से वंचित करने जैसे- दंड, कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों को कमजोर करते हैं।
    • उदाहरण: ब्राजील जैसे देशों में जुर्माना लगाया जाता है, किंतु ऐसा दबाव भारत के संदर्भ में उपयुक्त नहीं माना जा सकता।
  • प्रशासनिक एवं लॉजिस्टिक कठिनाइयाँ: इतने बड़े मतदाता आधार में गैर-मतदाताओं का पता लगाना और उस पर कार्रवाई करना अव्यावहारिक है।
    • उदाहरण: भारत निर्वाचन आयोग 90 करोड़ से अधिक मतदाताओं का प्रबंधन करता है, जिससे प्रवर्तन अत्यंत कठिन हो जाता है।
  • सामाजिक-आर्थिक बहिष्करण का जोखिम: हाशिए पर स्थित समूहों (जैसे- प्रवासी श्रमिक, गरीब वर्ग) पर अनुचित दंड का खतरा बढ़ सकता है।
    • उदाहरण: प्रवासी श्रमिक अक्सर अपनी गतिशीलता के कारण मतदान से वंचित रह जाते हैं।

क्यों अनिवार्य मतदान पूर्णतः लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं है

  • सहभागी लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण: उच्च मतदाता भागीदारी निर्वाचित सरकारों की वैधता को मजबूत बनाती है।
    • उदाहरण: विधि आयोग के अनुसार, जिन देशों में अनिवार्य मतदान है, वहाँ लगभग 7% तक मतदान में वृद्धि देखी गई है।
  • अल्पसंख्यक-शासन के परिणामों पर प्रभाव: यह सुनिश्चित करता है कि उम्मीदवार बहुत कम मतों के आधार पर विजयी न हों।
    • उदाहरण: निर्वाचन आयोग के रुझानों के अनुसार, कम मतदान वाले क्षेत्रों में अक्सर प्रतिनिधि सीमित समर्थन के साथ चुने जाते हैं।
  • नागरिक उत्तरदायित्व को प्रोत्साहन: यह नागरिकों को शासन प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करता है।
    • उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में इसे एक नागरिक कर्तव्य के रूप में देखा जाता है।
  • मतदाता उदासीनता का निवारण: विशेषकर शहरी क्षेत्रों में लगातार मतदान न करने की प्रवृत्ति का समाधान करता है।
  • समावेशी प्रतिनिधित्व: व्यापक भागीदारी समाज के विविध वर्गों के हितों को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करती है।
    • उदाहरण: लैटिन अमेरिकी लोकतंत्रों में अधिक व्यापक चुनावी भागीदारी देखी जाती है।

मतदाता भागीदारी बढ़ाने के वैकल्पिक उपाय

  • मतदाता जागरूकता अभियान: लक्षित पहुँच के माध्यम से व्यवहार में परिवर्तन लाना।
    • उदाहरण: भारत निर्वाचन आयोग का SVEEP कार्यक्रम।
  • प्रवासी मतदाताओं के लिए सुविधा: गतिशील आबादी के लिए संरचनात्मक बाधाओं को कम करना।
    • उदाहरण: तकनीक आधारित रिमोट वोटिंग तंत्र का प्रस्ताव।
  • वैधानिक अवकाश का प्रभावी क्रियान्वयन: कार्य संबंधी बाधाओं को दूर करना।
    • उदाहरण: मतदान दिवस पर वेतन सहित अवकाश का सख्ती से पालन।
  • परिवहन एवं पहुँच में सुधार: मतदान केंद्रों तक भौतिक पहुँच को सुगम बनाना।
    • उदाहरण: चुनावों के दौरान विशेष ट्रेन/बस सेवाएँ।
  • डिजिटल एवं सोशल मीडिया का उपयोग: युवा एवं शहरी मतदाताओं को प्रभावी रूप से जोड़ना।
    • उदाहरण: मतदाता पंजीकरण अभियानों के लिए निर्वाचन आयोग के सोशल मीडिया अभियान।

निष्कर्ष

यद्यपि अनिवार्य मतदान मतदाता भागीदारी बढ़ा सकता है, किंतु यह व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं को प्रभावित करने का जोखिम उत्पन्न करता है और भारत में इसके क्रियान्वयन से जुड़ी गंभीर चुनौतियाँ भी हैं। लोकतांत्रिक सहभागिता को सुदृढ़ करने के लिए बाध्यता नहीं, बल्कि सुविधा, जागरूकता और नवाचार पर आधारित उपाय आवश्यक हैं, जो संवैधानिक मूल्यों एवं समावेशिता के अनुरूप हों।

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