Q. भारत का जल संकट पूर्ण कमी के कारण नहीं, बल्कि खंडित शासन व्यवस्था के कारण है। मौजूदा जल प्रबंधन प्रथाओं के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। सतत और जलवायु-अनुकूल जल शासन ढाँचे के लिए उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • खंडित शासन को मुख्य समस्या के रूप में समझाइए।
  • जल के पूर्ण अभाव की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
  • सतत् एवं जलवायु-सहिष्णु शासन के उपाय सुझाइए।

उत्तर

भारत में बढ़ता हुआ जल संकट केवल भौतिक कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह प्रणालीगत शासन विफलताओं को भी दर्शाता है। प्रचुर नदी तंत्र होने के बावजूद, खंडित संस्थागत व्यवस्थाएँ और बढ़ती माँग ने जल संकट को और गंभीर बना दिया है। अतः एक समेकित तथा जलवायु-सहिष्णु जल शासन ढाँचे की आवश्यकता अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई है।

खंडित शासन एक मुख्य समस्या के रूप में

  • संस्थागत विखंडन: जल प्रबंधन में अनेक मंत्रालयों और एजेंसियों की भागीदारी होती है, लेकिन उनके मध्य समन्वय का अभाव है।
    • उदाहरण: जल शक्ति मंत्रालय और राज्य सिंचाई विभागों के बीच भूमिकाओं का अतिव्यापी (ओवरलैप) होना।
  • अंतर-राज्यीय असमन्वय: नदियाँ कई राज्यों से होकर गुजरती हैं, लेकिन उनके प्रबंधन में सहकारी तंत्र का अभाव है।
    • उदाहरण: कावेरी जल विवाद समन्वय की कमी को दर्शाता है।
  • ऊपरी और निचले क्षेत्रों की उपेक्षा: एक क्षेत्र में किए गए कार्यों का प्रभाव अन्य क्षेत्रों पर पड़ता है, परंतु इसके लिए उत्तरदायित्व तय नहीं होता।
    • उदाहरण: बाँध निर्माण के कारण निचले क्षेत्रों में जल प्रवाह प्रभावित होना।
  • क्षेत्रीय अलगाव: कृषि, उद्योग और शहरी जल प्रबंधन को अलग-अलग तरीके से संचालित किया जाता है।
    • उदाहरण: कृषि में भूजल का अत्यधिक दोहन, जबकि शहरी क्षेत्रों में जल संकट।
  • कमजोर पारिस्थितिकी एकीकरण: नीतियाँ भूजल, नदियों और पारिस्थितिकी तंत्र के आपसी संबंधों की अनदेखी करती हैं।
    • उदाहरण: भूजल दोहन के कारण नदियों के आधार प्रवाह पर प्रभाव पड़ना।

पूर्ण अभाव की भूमिका

  • बढ़ती मांग: जनसंख्या वृद्धि और शहरीकरण सीमित जल संसाधनों पर दबाव बढ़ाते हैं।
    • उदाहरण: नीति आयोग का समग्र जल सूचकांक माँग और आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर को दर्शाता है।
  • भूजल का क्षय: अत्यधिक भूजल दोहन जल स्तर को कम करता है और दीर्घकालिक उपलब्धता को घटाता है।
    • उदाहरण: केंद्रीय भूजल बोर्ड ने कई “अतिदोहित” क्षेत्रों की पहचान की है।
  • जलवायु परिवर्तनशीलता: अनियमित मानसून और चरम घटनाएँ जल उपलब्धता को प्रभावित करती हैं।
    • उदाहरण: कई राज्यों में बार-बार सूखा और बाढ़ चक्र आपूर्ति की स्थिरता को बाधित करते हैं।
  • जल प्रदूषण: संदूषण के कारण उपयोग योग्य मीठे जल की मात्रा कम हो जाती है।
    • उदाहरण: गंगा नदी का प्रदूषण पेयजल उपयोग को सीमित करता है।
  • क्षेत्रीय असंतुलन: जल संसाधनों का असमान भौगोलिक वितरण स्थानीय स्तर पर जल संकट उत्पन्न करता है।
    • उदाहरण: राजस्थान में जल संकट, जबकि पूर्वोत्तर भारत में जल की प्रचुरता।

सतत एवं जलवायु-सहिष्णु शासन के लिए उपाय

  • समेकित जल प्रबंधन: राष्ट्रीय जल नीतियों के अनुसार, विभिन्न क्षेत्रों और राज्यों में बेसिन-स्तरीय योजना को अपनाया जाए।
  • संस्थागत समन्वय को सुदृढ़ करना: विभिन्न मंत्रालयों का एकीकरण तथा केंद्र-राज्य सहयोग को बेहतर बनाया जाए।
    • उदाहरण: जल शक्ति मंत्रालय की एकीकृत जल शासन में भूमिका।
  • माँग-पक्ष प्रबंधन को बढ़ावा देना: कृषि और शहरी क्षेत्रों में जल उपयोग की दक्षता बढ़ाई जाए।
    • उदाहरण: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई को प्रोत्साहन।
  • सामुदायिक भागीदारी को बढ़ाना: जल शासन में स्थानीय निकायों, विशेषकर महिलाओं, की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
    • उदाहरण: जल जीवन मिशन समुदाय-आधारित जल प्रबंधन को बढ़ावा देता है।
  • जलवायु सहनशीलता का निर्माण: जल भंडारण, पुनः उपयोग और अनुकूलन प्रणालियों में निवेश किया जाए।
    • उदाहरण: वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना और अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण की पहल।

निष्कर्ष

भारत का जल संकट केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि उतना ही शासन संबंधी विफलता का भी परिणाम है। खंडित व्यवस्था और जल अभाव दोनों को साथ-साथ संबोधित करते हुए, समेकित, समावेशी और जलवायु-संवेदनशील नीतियों को अपनाना भविष्य में सतत् और समान जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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