Q. विभिन्न समितियों द्वारा सुझाए गए चुनावी सुधारों की आवश्यकता का, विशेष रूप से ‘एक राष्ट्र - एक चुनाव’ के सिद्धांत के संदर्भ में परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • निर्वाचन सुधारों की आवश्यकता का परीक्षण कीजिए।
  • “एक राष्ट्र, एक चुनाव” के लाभों का उल्लेख कीजिए।
  • “एक राष्ट्र, एक चुनाव” की चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।

उत्तर

भारत में बार-बार होने वाले चुनाव शासन और सार्वजनिक संसाधनों पर दबाव डालते हैं, जिसके चलते निर्वाचन आयोग और विधि आयोग जैसे संस्थानों ने “एक राष्ट्र, एक चुनाव” जैसे सुधारों की सिफारिश की है।

मुख्य भाग

निर्वाचन सुधारों की आवश्यकता

  • उच्च लागत: बार-बार चुनाव कराने से विकास कार्यों में बाधा उत्पन्न होती है।
    • उदाहरण: वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों पर लगभग ₹60,000 करोड़ का व्यय हुआ।
  • शासन में व्यवधान: आचार संहिता के बार-बार लागू होने से निर्णय-निर्माण प्रभावित होता है और कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी होती है।
    • उदाहरण: राज्य चुनावों के दौरान अवसंरचना और कल्याण परियोजनाएँ अक्सर रोक दी जाती हैं।
  • नीतिगत लोकलुभावनता: सरकारें दीर्घकालिक सुधारों के बजाय अल्पकालिक चुनावी लाभ हेतु लोकलुभावन घोषणाओं को प्राथमिकता देती हैं।
    • उदाहरण: चुनावों से पहले कृषि ऋण माफी और मुफ्त योजनाएँ।
  • प्रशासनिक दबाव: अधिकारियों, शिक्षकों और सुरक्षा बलों की बार-बार तैनाती से नियमित प्रशासन और सेवा वितरण प्रभावित होता है।
  • मतदाता थकान: बार-बार चुनाव होने से मतदाताओं की रुचि और भागीदारी कम हो सकती है, विशेषकर छोटे राज्यों या स्थानीय चुनावों में।
    • उदाहरण: कुछ राज्य चुनावों में राष्ट्रीय चुनावों की तुलना में कम मतदान देखा गया।

“एक राष्ट्र, एक चुनाव” के लाभ

  • लागत दक्षता: एक साथ चुनाव कराने से लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा और चुनावी खर्च में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।
  • नीतिगत निरंतरता: आचार संहिता के कम हस्तक्षेप के कारण नीतियों का सुचारु क्रियान्वयन संभव होगा।
    • उदाहरण: अवसंरचना विकास जैसी योजनाओं का निरंतर संचालन।
  • शासन पर ध्यान: नेताओं को निरंतर चुनावी माहौल में रहने के बजाय शासन पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा।
    • उदाहरण: नीतिगत योजना और संस्थागत सुधारों के लिए अधिक समय।
  • अधिक मतदान: संयुक्त चुनावों से मतदाता भागीदारी बढ़ सकती है, जैसा कि राष्ट्रीय चुनावों में देखा जाता है।
  • प्रशासनिक सुगमता: चुनावी कर्मियों और सुरक्षा बलों की एक बार तैनाती से प्रशासनिक तंत्र पर बार-बार पड़ने वाला दबाव कम होगा।

“एक राष्ट्र, एक चुनाव” की चुनौतियाँ

  • संघीय चिंताएँ: चुनावों का समकालिकरण राज्यों की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि उनके राजनीतिक चक्र अलग-अलग होते हैं।
  • संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता: इस व्यवस्था को लागू करने के लिए कार्यकाल और विघटन से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों में व्यापक संशोधन आवश्यक होंगे।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-83, 85, 172 और 174 में परिवर्तन की आवश्यकता।
  • पूर्वकालिक विघटन की समस्या: यदि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले गिर जाती है, तो समकालिक चुनाव बनाए रखना कठिन हो जाता है।
    • उदाहरण: त्रिशंकु विधानसभा या अविश्वास प्रस्ताव के कारण समय-सीमा बाधित होती है।
  • क्षेत्रीय मुद्दों की उपेक्षा: राष्ट्रीय स्तर का चुनाव प्रचार स्थानीय और राज्य-विशिष्ट मुद्दों को पीछे छोड़ सकता है।
  • प्रबंधन संबंधी जटिलता: पूरे देश में एक साथ चुनाव कराना अत्यधिक संसाधन और समन्वय की माँग करता है।
    • उदाहरण: इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों, कर्मियों और सुरक्षा व्यवस्था की बड़े पैमाने पर आवश्यकता।

निष्कर्ष

“एक राष्ट्र, एक चुनाव” प्रशासनिक दक्षता और स्थिरता प्रदान कर सकता है, किंतु इसकी सफलता संघीय मूल्यों के साथ संतुलन पर निर्भर करती है। निर्वाचन सुधारों को इस प्रकार सावधानीपूर्वक तैयार किया जाना चाहिए कि लोकतांत्रिक विविधता संरक्षित रहे और साथ ही शासन की प्रभावशीलता में वृद्धि हो।

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