संदर्भ
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (IJR) ने कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट, 2026 (Consumer Justice Report 2026) जारी की, जिसमें भारत की उपभोक्ता शिकायत निवारण प्रणाली की प्रमुख कमजोरियों को उजागर किया गया।
कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट, 2026 के प्रमुख बिंदु
- लंबित मामलों में वृद्धि
- वर्ष 2020 से 2024 के बीच लंबित मामलों में 21% की वृद्धि हुई।
- मामलों की संख्या लगभग 88,000 से बढ़कर 5.15 लाख से अधिक हो गई।
- एक-तिहाई से अधिक मामले तीन वर्षों से अधिक समय तक लंबित रहे।
- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत निर्धारित 3–5 माह में निपटान की समय-सीमा का भी उल्लंघन भी सम्मिलित है।
- गंभीर रिक्ति संकट
- लगभग आधे राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग और एक-तिहाई जिला आयोग बिना अध्यक्ष के कार्य कर रहे थे।
- स्वीकृत सदस्य पदों में लगभग 40% पद रिक्त रहे।
- पारदर्शिता की कमी
- कई राज्य आयोगों ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत डेटा साझा नहीं किया।
- जिला आयोगों ने तुलनात्मक रूप से बेहतर पारदर्शिता दिखाई।
- क्षेत्रीय असमानताएँ
- केरल, झारखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में 70–80% मामले तीन वर्षों से अधिक समय तक लंबित रहे।
- आंध्र प्रदेश ने बड़े राज्यों में मामलों के निपटान में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।
- तेलंगाना का प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा।
- महाराष्ट्र में मामलों का पंजीकरण अधिक रहा, लेकिन निपटान अपेक्षाकृत कम हुआ।
- लैंगिक प्रतिनिधित्व
- महिलाओं का प्रतिनिधित्व वर्ष 2021 के 35% से घटकर वर्ष 2025 में 29% रह गया।
- वर्ष 2024 में केवल दिल्ली और सिक्किम ने महिला अध्यक्षों की नियुक्ति की।
सिफारिशें
- सरकार को समयबद्ध नियुक्तियों के माध्यम से रिक्त पदों को भरना चाहिए।
- प्राधिकरणों को स्टाफ और अवसंरचना में सुधार करना चाहिए।
- आयोगों को डेटा साझा करने में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
- प्रणाली को मध्यस्थता और वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा देना चाहिए।
कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट 2026
रिपोर्ट के बारे में
- कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट 2026, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट द्वारा जारी एक अपनी तरह का पहला अध्ययन है, जिसका उद्देश्य भारत में उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों के प्रदर्शन और क्षमता का मूल्यांकन करना है।
उद्देश्य
यह रिपोर्ट निम्नलिखित उद्देश्यों को पूरा करने का प्रयास करती है—
- जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता न्यायालयों के कार्य संचालन का आकलन करना।
- मामलों के लंबित रहने, अवसंरचना, मानव संसाधन तथा दक्षता की स्थिति का विश्लेषण करना।
- उपभोक्ताओं को समयबद्ध न्याय प्रदान करने में मौजूद कमियों की पहचान करना।
डेटा स्रोत एवं कार्यप्रणाली
इस रिपोर्ट में वर्ष 2020–2024 के बीच एकत्रित डेटा का उपयोग किया गया है, जिसे निम्न स्रोतों से प्राप्त किया गया है:—
- उपभोक्ता आयोगों की आधिकारिक वेबसाइटें।
- सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के अंतर्गत प्राप्त उत्तर।
- संसदीय प्रश्न और उनके उत्तर।
- सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी डेटा।
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