महाराष्ट्र का प्रथम नेट-जीरो ग्राम: बेलग्राम
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महाराष्ट्र का बेलग्राम राज्य का पहला नेट-जीरो ग्राम घोषित किया गया, जिसे मुंबई क्लाइमेट वीक के दौरान विशेष रूप से रेखांकित किया गया।
- बेलग्राम को वर्ष 2024 का राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
नेट-जीरो ग्राम के बारे में
‘नेट-जीरो’ ग्राम वह होता है, जो नवीकरणीय ऊर्जा, वनीकरण, सतत् आजीविका तथा सामुदायिक-आधारित जलवायु शासन के माध्यम से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और उसके समतुल्य अवशोषण/क्षतिपूर्ति के बीच संतुलन स्थापित करता है।
बेलग्राम को नेट-जीरो बनाने वाले कारक
- सामुदायिक-नेतृत्व आधारित वनीकरण: ग्राम पंचायत ने विवाह और त्योहारों के अवसर पर 90,000 से अधिक वृक्ष लगाए, जिससे कार्बन अवशोषण और सामुदायिक सहभागिता में वृद्धि हुई।
- स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण: परिवारों ने पारंपरिक धुएँ वाले चूल्हों से LPG की ओर स्थानांतरण किया, जिससे घरेलू वायु प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन में कमी आई।
- सौर ऊर्जा अपनाना: घरों, आंगनवाड़ियों और पंचायत कार्यालयों में सौर पैनल स्थापित किए गए, जिससे विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिला।
- अपशिष्ट प्रबंधन सुधार: घर-घर कचरा पृथक्करण और एकल-उपयोग प्लास्टिक के उन्मूलन से सतत् अपशिष्ट प्रथाओं को सुदृढ़ किया गया।
- जल एवं आजीविका स्थिरता: जलवायु-अनुकूल उपायों ने पारिस्थितिकी संतुलन, जैव विविधता संरक्षण और दीर्घकालिक ग्रामीण आजीविका को समर्थन प्रदान किया।
महत्त्व
- स्थानीय स्तर पर जलवायु शासन का मॉडल: बेलग्राम दर्शाता है कि पंचायती राज संस्थाएँ विकेंद्रीकृत और सहभागी जलवायु कार्रवाई का नेतृत्व कर सकती हैं।
- पुनरुत्पादनीय ग्रामीण स्थिरता ढाँचा: यह ग्राम स्थानीय स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा, वनीकरण और अपशिष्ट प्रबंधन के एकीकरण हेतु एक विस्तार योग्य मॉडल प्रस्तुत करता है।
- राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों में योगदान: बेलग्राम की उपलब्धि भारत की वर्ष 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करने की प्रतिबद्धता का समर्थन करती है, जिसकी घोषणा COP26 में पंचामृत की पाँच-सूत्रीय रणनीति के अंतर्गत की गई थी, और जो राष्ट्रीय जलवायु संकल्पों को जमीनी स्तर की मापनीय कार्रवाई में परिवर्तित करती है।
मुंबई क्लाइमेट वीक (MCW)
- मुंबई क्लाइमेट वीक भारत में अपनी तरह की पहली, नागरिक-नेतृत्व वाली जलवायु कार्रवाई पहल है, जिसका उद्देश्य विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के लिए जलवायु समाधान को तीव्र करना है।
- इसका उद्घाटन संस्करण 17–19 फरवरी, 2026 को जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में आयोजित किया गया।
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जिंक-आयन बैटरियाँ (Zinc-Ion Batteries)
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भारतीय शोधकर्ताओं ने एक नया कैथोड पदार्थ विकसित किया है, जो जिंक-आधारित बैटरियों को बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण के लिए एक व्यवहार्य विकल्प बना सकता है।
जिंक-आयन बैटरियाँ क्या हैं?
- जिंक-आयन बैटरियाँ पुनर्भरणीय बैटरियाँ हैं, जिनमें जिंक धातु (Zn) एनोड के रूप में तथा Zn²⁺ आयन आवेश वाहक के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
- ये सामान्यतः जलीय (जल-आधारित) इलेक्ट्रोलाइट का उपयोग करती हैं, जिससे ये लीथियम-आयन बैटरियों की तुलना में अधिक सुरक्षित होती हैं।
- डिस्चार्ज के दौरान, जिंक ऑक्सीकरण होता है (Zn → Zn²⁺ + 2e⁻) और इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन करता है; चार्जिंग के दौरान, जिंक आयन पुनः एनोड पर एकत्रित हो जाते हैं।
- प्रमुख अवयव
- एनोड: धात्विक जिंक
- कैथोड: मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO₂), वैनाडियम ऑक्साइड, या प्रशियन ब्लू अनुरूप पदार्थ
- इलेक्ट्रोलाइट: जलीय जिंक लवण विलयन (जैसे ZnSO₄)
- प्रमुख लाभ
- अत्यधिक सुरक्षा: अज्वलनशील जलीय इलेक्ट्रोलाइट आग/विस्फोट के जोखिम को समाप्त करते हैं (लीथियम-आयन के कार्बनिक इलेक्ट्रोलाइट के विपरीत)।
- बहुत कम लागत: जिंक प्रचुर, सस्ता, गैर-विषैला तथा व्यापक रूप से पुनर्चक्रण योग्य है।
- पर्यावरण-अनुकूल: कम पर्यावरणीय प्रभाव, कोई दुर्लभ/महत्त्वपूर्ण धातुओं (जैसे कोबाल्ट/लीथियम) पर निर्भरता नहीं, तथा पुनर्चक्रण सरल।
- उच्च आयनिक चालकता: जलीय इलेक्ट्रोलाइट तीव्र आयन परिवहन और परिवेशीय निर्माण को सक्षम बनाते हैं।
- उपयुक्तता: स्थिर/ग्रिड-स्तरीय भंडारण, सौर/पवन ऊर्जा एकीकरण, तथा वे अनुप्रयोग जहाँ अत्यधिक ऊर्जा घनत्व की अपेक्षा सुरक्षा और लागत प्राथमिक हो।
- चुनौतियाँ
- जिंक एनोड संबंधी समस्याएँ: डेंड्राइट वृद्धि (शॉर्ट सर्किट का जोखिम), संक्षारण, पैसिवेशन, जिससे दक्षता और चक्र-जीवन में कमी आती है।
- कैथोड सीमाएँ: संरचनात्मक अस्थिरता, घुलनशीलता (जैसे MnO₂ या V-आधारित पदार्थों में), दुर्बल Zn²⁺ प्रसार/गतिकी, जिससे क्षमता संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- समग्र प्रदर्शन: लीथियम-आयन बैटरियों की तुलना में अल्प ऊर्जा घनत्व।
जिंक-आयन बैटरियों हेतु नया कैथोड पदार्थ
- खोजकर्ता: सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (CeNS), बंगलूरू-जो भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन एक स्वायत्त संस्थान है।
- कैथोड पदार्थ: “सल्फर आधारित 1T-चरण मोलिब्डेनम डाइसल्फाइड (1T-MoS₂)”।
- मुख्य विशेषताएँ: यह धात्विक 1T-चरण पदार्थ सल्फर रिक्तताओं (vacancies) को सम्मिलित करता है।
- संश्लेषण विधि: नियंत्रित हाइड्रोथर्मल प्रक्रिया द्वारा उच्च सतह क्षेत्रफल और उन्नत विद्युत चालकता वाले नैनोफ्लेक्स का निर्माण किया गया।
- दक्षता: जिंक-आयन बैटरी ने 500 निरंतर चार्ज-डिस्चार्ज चक्रों के बाद अपनी प्रारंभिक क्षमता का 97.91% बनाए रखा।
- उपकरण ने 99.7% कूलॉम्बिक दक्षता भी प्रदर्शित की, जो अत्यधिक प्रत्यावर्तनीय जिंक-आयन अंतःस्थापन को दर्शाता है।
- लाभ: ये गुण तीव्र विद्युत-रासायनिक अभिक्रियाओं, बेहतर जिंक-आयन प्रसार, तथा उच्च आवेश भंडारण क्षमता को सक्षम बनाते हैं।
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अल-फाशेर सूडान

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संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र तथ्य-जाँच मिशन ने सूडान में अल-फाशेर पर एक अर्द्धसैनिक समूह द्वारा घेराबंदी और कब्जे को “जनसंहार के लक्षणों से प्रेरित” के रूप में वर्णित किया है।
अल-फाशेर के बारे में
- स्थान: अल-फाशेर पश्चिमी सूडान का एक प्रमुख नगर है और दारफुर क्षेत्र में उत्तर दारफुर राज्य की राजधानी है।
- गृहयुद्ध: अल-फाशेर सूडान के गृहयुद्ध (अप्रैल 2023 से) का केंद्र रहा है, जिसमें सूडानी सशस्त्र बल (SAF) और अर्द्धसैनिक रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) के बीच संघर्ष जारी है।
- जनसंहार: वर्ष 2024-25 में RSF ने शहर पर 18 महीने की घेराबंदी लगा दी, जिससे लगभग 2,60,000 नागरिक फँसे होने की आशंका है।
- घेराबंदी में खाद्य, जल, चिकित्सा आपूर्ति और मानवीय सहायता को अवरुद्ध किया गया, जिससे भूख, रोगों के प्रसार, अकाल और व्यापक पीड़ा उत्पन्न हुई।
- संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, जनसंहार विशेष रूप से गैर-अरबी जातीय समूहों जैसे जाघावा और फुर समुदायों को लक्षित करता था।
- रणनीतिक महत्त्व: शहर का स्थान RSF को महत्त्वपूर्ण आपूर्ति मार्गों तक पूर्ण पहुँच प्रदान करता है।
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वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम फेज-2
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हाल ही में केंद्र सरकार ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम फेज-2 का विस्तार करते हुए इसे भारत की पश्चिमी और पूर्वी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से संलग्न 1,954 गाँवों तक पहुँचाया है।
वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम फेज-2 (VVP-II) के बारे में
- VVP-II एक केंद्रीय क्षेत्रीय योजना है, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्थलीय सीमाओं के साथ रणनीतिक गाँवों का समग्र विकास करना है, उन क्षेत्रों को छोड़कर जो उत्तरी सीमा चरण के अंतर्गत आते हैं।
- लक्षित गाँव: यह योजना पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और म्याँमार सीमा से संलग्न 15 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों के 1,954 गाँवों को कवर करती है।
- वित्तीय आवंटन और अवधि: वर्ष 2025 में ₹6,839 करोड़ की मंजूरी के साथ यह कार्यक्रम वित्तीय वर्ष 2028–29 तक लागू किया जाएगा, जिसमें प्रत्येक गाँव के लिए ₹3 करोड़ का प्रस्तावित आवंटन है।
- उद्देश्य: यह योजना अवसंरचना को सुदृढ़ करने, कल्याण योजनाओं की पहुँच को व्यापक बनाने, आजीविका के अवसर बढ़ाने, राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करने तथा सीमा पार अपराध और प्रवासन के प्रति सुभेद्यता को कम करने का प्रयास करती है।
वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम (VVP-I) के बारे में
- VVP-I वर्ष 2023 में एक केंद्रीय प्रायोजित योजना के रूप में लॉन्च किया गया था, जिसका उद्देश्य चीन से संलग्न उत्तरी सीमा के गाँवों का विकास करना है।
- कार्यान्वयन मंत्रालय: गृह मंत्रालय (MHA)।
- वित्तीय आवंटन: ₹4,800 करोड़ (जिसमें से ₹2,500 करोड़ सड़क निर्माण के लिए)।
- अवधि: वित्तीय वर्ष 2022-23 से वर्ष 2025-26 तक।
- लक्षित गाँव: प्रथम चरण में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ स्थित ब्लॉकों के चयनित गाँवों पर विशेष ध्यान दिया गया।
- यह योजना अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड और लद्दाख में 46 ब्लॉकों के 662 सीमावर्ती गाँवों में लागू की गई थी।
- मुख्य उद्देश्य: इस कार्यक्रम का लक्ष्य सभी मौसम में सड़कों की कनेक्टिविटी, दूरसंचार और टेलीविजन की पहुँच, विभिन्न योजनाओं के समन्वय के माध्यम से विद्युत आपूर्ति तथा सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों में सुधार सुनिश्चित करना है।
महत्त्व
- सीमा सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना: विकास से प्रवासन में कमी आती है और निवासियों को सीमा प्रबंधन में भागीदार बनाकर अवैध सीमा पार गतिविधियों को रोकने में मदद मिलती है।
- समावेशी विकास को बढ़ावा देना: यह कार्यक्रम यह सुनिश्चित करता है कि दूरस्थ सीमावर्ती क्षेत्र राष्ट्रीय विकास में शामिल हों और अवसंरचना तथा आजीविका के अवसरों से लाभान्वित हों सके।
- राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना: सीमावर्ती समुदायों और सुरक्षा बलों के बीच विश्वास स्थापित करके, VVP सामाजिक समरसता और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करता है।
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डिएगो गार्सिया

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हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विशेष रूप से ईरान के खिलाफ संभावित अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बीच यूनाइटेड किंगडम द्वारा मॉरीशस को डिएगो गार्सिया द्वीप लीज पर देने के विरुद्ध चेतावनी दी ।
- वर्ष 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की परामर्शात्मक राय में इसे मॉरीशस से अलग कर अवैध करार दिया गया था, और वर्ष 2025 के यूके–मॉरीशस संधि के तहत संप्रभुता का हस्तांतरण प्रस्तावित है, जिसमें इसे लीज के तहत बनाए रखने का प्रावधान है।
डिएगो गार्सिया के बारे में
- अवस्थिति और भू-आकृति: डिएगो गार्सिया मध्य भारतीय महासागर में स्थित एक प्रवाल एटॉल है, जो भारत के दक्षिण में लगभग 1,800 किलोमीटर दूरी पर स्थित है और चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा द्वीप है।
- भू-आकृति और पारिस्थितिकी: यह एक नालाकृति वाला एटोल है जो 19 किलोमीटर लंबी लैगून को घेरे हुए है। इसमें समतल स्थल, प्रवाल भित्तियाँ, समृद्ध समुद्री जैव विविधता और भूमध्य रेखा के निकटता के कारण उष्णकटिबंधीय समुद्री जलवायु शामिल है।
- प्रशासनिक स्थिति: यह ब्रिटिश भारतीय महासागर क्षेत्र का हिस्सा है और यूनाइटेड किंगडम द्वारा प्रशासित है। यहाँ नागरिकों की पहुँच सीमित है और इसे सीधे यूके द्वारा नियुक्त आयुक्त के माध्यम से शासित किया जाता है।
- वर्तमान में यहाँ लगभग 2,500 अमेरिकी और ब्रिटिश सैन्य कर्मी रहते हैं। चागोस के निवासियों के विस्थापन के बाद कोई स्थायी नागरिक आबादी नहीं है।
- ऐतिहासिक विकास: वर्ष 1965 में मॉरीशस से अलग किया गया और ब्रिटिश भारतीय महासागर क्षेत्र (BIOT) का गठन किया गया। वर्ष 1968–1973 के बीच चागोस के निवासियों को विस्थापित किया गया ताकि अमेरिकी सैन्य आधार की स्थापना की जा सके।
- सैन्य अवसंरचना: यहाँ नौसैनिक सहायता सुविधा डिएगो गार्सिया स्थित है, जिसमें 3.7 किलोमीटर लंबा रनवे, गहरे जल का बंदरगाह, लॉजिस्टिक केंद्र, उपग्रह ट्रैकिंग और पूर्व-स्थापित सैन्य उपकरण शामिल हैं।
- रणनीतिक महत्त्व: यह मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया को जोड़ने वाले प्रमुख समुद्री मार्गों के निकट स्थित है। इससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में तेजी से बल प्रक्षेपण, निगरानी और ईंधन भरने के संचालन को सक्षम बनाया जा सकता है।
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IEA स्टेट ऑफ एनर्जी इनोवेशन, 2026
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हाल ही में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने स्टेट ऑफ एनर्जी इनोवेशन, 2026 रिपोर्ट जारी की, जिसमें भू-राजनीति-संचालित स्वच्छ ऊर्जा प्रतिस्पर्द्धा पर प्रकाश डाला गया है ।
स्टेट ऑफ एनर्जी इनोवेशन 2026 के बारे में
- यह रिपोर्ट वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान, तकनीकी कार्यान्वयन, वित्तपोषण और नीति ढाँचे के रुझानों का मूल्यांकन करती है, जो ऊर्जा संक्रमण को आकार दे रहे हैं।
वर्ष 2026 रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- भू-राजनीतिक प्रेरणा: वर्ष 2025 में कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं द्वारा शुरू की गई नीतियाँ तकनीकी नेतृत्व और आपूर्ति शृंखला सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं (जैसे अमेरिका की जेनेसिस मिशन, यूरोपीय संघ का प्रतिस्पर्धात्मकता कोष)।
- सक्रिय पारिस्थितिकी तंत्र: वर्ष 2025 में 320 से अधिक नए ऊर्जा स्टार्ट-अप्स ने प्रारंभिक दौर का वित्तपोषण प्राप्त किया और ऊर्जा-संबंधित पेटेंट में वृद्धि जारी है, जो वैश्विक पेटेंट का 1/10 हिस्सा बनाते हैं।
- बैटरी वर्चस्व: ऊर्जा भंडारण (बैटरियाँ) ऊर्जा पेटेंट का 40% हैं, जो अब तक अभूतपूर्व है।
- कमजोर कार्यान्वयन: नवाचार के बावजूद, नई तकनीकों के प्रोटोटाइप और वाणिज्यिक स्तर पर कार्यान्वयन के बीच वित्तपोषण का अंतर बना हुआ है।
- वित्तपोषण में गिरावट: सार्वजनिक ऊर्जा अनुसंधान और विकास व्यय वर्ष 2025 में लगभग 2% घटकर 55 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया और जोखिम पूँजी निवेश लगातार तीसरे वर्ष घटा।
रिपोर्ट के अनुसार तकनीकी आधारित क्षेत्र (2025–2026) (2025–2026)
- न्यूक्लियर फ्यूजन: वर्ष 2025 में जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, चीन, फ्राँस और अमेरिका में प्रमुख उपलब्धि प्राप्त की गई।
- पेरोव्सकाइट सौर: 33% दक्षता प्राप्त की, जिससे फोटोग्राफिक वोल्टेज बाजार को बढ़ाने की संभावना।
- ग्रिड तकनीक: ग्रिड-सुदृढ़ तकनीकों (जैसे ठोस-स्थिति ट्रांसफार्मर, दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण) की आवश्यकता पर जोर।
- उभरते क्षेत्र: कार्बन डाइऑक्साइड हटाना, महत्त्वपूर्ण खनिज, अगली पीढ़ी भू-तापीय ऊर्जा, और कम-उत्सर्जन औद्योगिक उत्पादन।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के बारे में
- प्रकार: IEA एक स्वायत्त अंतर-सरकारी संगठन है, जिसे विश्व स्तर पर विश्वसनीय, किफायती और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया है।
- सदस्य: इसमें 32 सदस्य देश शामिल हैं, जिनमें अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, फ्राँस, जापान और कनाडा शामिल हैं, साथ ही 13 संबद्ध देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल है।
- भूमिका और कार्य: IEA वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और संक्रमण के लिए नीति सिफारिशें प्रदान करती है, डेटा का विश्लेषण करती है, तकनीकी रोडमैप तैयार करती है और आपातकालीन प्रतिक्रिया का समन्वय सुनिश्चित करती है।
भारत और IEA
- संबद्ध देश का दर्जा: भारत एक संबद्ध देश है और IEA के साथ ऊर्जा डेटा, नीति संवाद और संक्रमण उपायों पर निकट सहयोग करता है।
- ऊर्जा संक्रमण लक्ष्य: भारत वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखता है, जबकि ऊर्जा सुरक्षा और विकास प्राथमिकताओं का संतुलन बनाए रखता है।
- रणनीतिक फोकस क्षेत्र: रिपोर्ट भारत को सार्वजनिक अनुसंधान और विकास को मजबूत करने, महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखला सुरक्षित करने और ग्रिड और स्वच्छ तकनीक के कार्यान्वयन को तीव्र करने की सिफारिश करती है।
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