संदर्भ
केंद्र सरकार ने संसद को सूचित किया है कि भारत की लगभग आधी सहकारी संस्थाएँ निष्क्रिय, घाटे में या परिसमापन की स्थिति में हैं।
भारत में सहकारिताओं की स्थिति
- समग्र संकट: लगभग 47% सहकारी संस्थाएँ निष्क्रिय, घाटे में या परिसमापन के अधीन हैं, जो व्यापक संस्थागत संकट को दर्शाता है।
- लाभप्रदता स्तर: केवल लगभग 41% (8.48 लाख में से 3.49 लाख) सहकारी संस्थाएँ लाभ में हैं, जो वित्तीय स्थिरता की कमजोरी को दर्शाता है।
- निष्क्रिय इकाइयाँ: लगभग 1.41 लाख सहकारी संस्थाएँ गैर-कार्यात्मक हैं, जो शासन और संरचनात्मक विफलताओं को इंगित करता है।
- परिसमापन की स्थिति: लगभग 47,688 संस्थाएँ परिसमापन के अधीन हैं, जो गंभीर वित्तीय और कानूनी संकट को दर्शाता है।
- क्षेत्रीय असमानता: पश्चिमी और दक्षिणी राज्य अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते हैं, जबकि उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों में विफलता दर अधिक है।
- आँकड़ा एवं पारदर्शिता संबंधी समस्याएँ: लगभग 99,000 संस्थाओं के लाभ/हानि संबंधी आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जो निगरानी और जवाबदेही की कमजोरी को दर्शाता है।
सहकारिताओं में क्षेत्रवार समस्याएँ
- डेयरी सहकारिताएँ: दूध की कीमतों में गिरावट और लागत में वृद्धि के कारण बड़ी संख्या में संस्थाएँ निष्क्रिय या परिसमापन की स्थिति में हैं।
- जलवायु आघात और वैश्विक व्यवधानों ने खरीद लागत बढ़ाई है, जिससे लाभप्रदता प्रभावित हुई है।
- आवास सहकारिताएँ: सहकारी बैंकों से जुड़े घोटालों और जमाकर्ताओं के विश्वास में कमी के कारण वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं।
- बकाया भुगतान न होना, निधियों का दुरुपयोग और पुनर्विकास में देरी जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं।
- ऋण एवं बचत सहकारी संस्थाएँ: कमजोर विनियामक निगरानी के कारण खराब ऋण प्रथाएँ और वित्तीय अस्थिरता देखी जाती है।
- उच्च जोखिम वाले ऋण और घोटालों ने विश्वास को कम किया है, जिससे चूक (डिफॉल्ट) में वृद्धि हुई है।
- श्रम सहकारिताएँ: इनकी उपस्थिति सीमित है, परंतु कुप्रबंधन, कराधान संबंधी समस्याएँ और दिवालियापन के जोखिम से प्रभावित हैं।
- नीतिगत और संविदात्मक समस्याएँ उनकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता और स्थिरता को कम करती हैं।
- महिला कल्याण सहकारिताएँ: सामान्यतः स्थिर हैं, किंतु वित्त तक सीमित पहुँच और योजनाओं के कम उपयोग से बाधित हैं।
- सामाजिक बाधाएँ और संस्थागत समर्थन की कमी, विशेषकर कमजोर राज्यों में, इनके विकास में अवरोध उत्पन्न करती हैं।
कमज़ोर प्रदर्शन के प्रमुख कारण
- सहकारी संस्थाओं में वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार।
- विशेषकर लघु ऋण सहकारी समितियों में कमजोर विनियामक निगरानी।
- मूल्य उतार-चढ़ाव और जलवायु घटनाओं जैसे बाहरी आर्थिक झटके।
- सदस्यों की कम भागीदारी और शासन संबंधी समस्याएँ।
- विशेषकर महिलाओं और लघु सहकारिताओं के लिए ऋण, बाजार और प्रौद्योगिकी तक सीमित पहुँच।
सरकारी पहल एवं नीतिगत प्रतिक्रिया
- राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025: सहकारी क्षेत्र को पुनर्जीवित करने और देशभर में 50 करोड़ लोगों तक इसकी पहुँच बढ़ाने का लक्ष्य।
- समावेशी विकास: महिलाओं, दलितों और आदिवासियों की भागीदारी को प्राथमिकता देकर सहकारिताओं को अधिक समानतापूर्ण और जमीनी स्तर पर सशक्त बनाना।
- नए क्षेत्रों में विस्तार: सरकार टैक्सी सेवाओं (भारत टैक्सी), बीमा और हरित ऊर्जा जैसे उभरते क्षेत्रों में सहकारिताओं को प्रोत्साहित कर रही है।