भारत में सहकारिताओं की स्थिति

31 Mar 2026

संदर्भ

केंद्र सरकार ने संसद को सूचित किया है कि भारत की लगभग आधी सहकारी संस्थाएँ निष्क्रिय, घाटे में या परिसमापन की स्थिति में हैं।

भारत में सहकारिताओं की स्थिति

  • समग्र संकट: लगभग 47% सहकारी संस्थाएँ निष्क्रिय, घाटे में या परिसमापन के अधीन हैं, जो व्यापक संस्थागत संकट को दर्शाता है।
  • लाभप्रदता स्तर: केवल लगभग 41% (8.48 लाख में से 3.49 लाख) सहकारी संस्थाएँ लाभ में हैं, जो वित्तीय स्थिरता की कमजोरी को दर्शाता है।
  • निष्क्रिय इकाइयाँ: लगभग 1.41 लाख सहकारी संस्थाएँ गैर-कार्यात्मक हैं, जो शासन और संरचनात्मक विफलताओं को इंगित करता है।
  • परिसमापन की स्थिति: लगभग 47,688 संस्थाएँ परिसमापन के अधीन हैं, जो गंभीर वित्तीय और कानूनी संकट को दर्शाता है।
  • क्षेत्रीय असमानता: पश्चिमी और दक्षिणी राज्य अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते हैं, जबकि उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों में विफलता दर अधिक है।
  • आँकड़ा एवं पारदर्शिता संबंधी समस्याएँ: लगभग 99,000 संस्थाओं के लाभ/हानि संबंधी आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जो निगरानी और जवाबदेही की कमजोरी को दर्शाता है।

सहकारिताओं में क्षेत्रवार समस्याएँ

  • डेयरी सहकारिताएँ: दूध की कीमतों में गिरावट और लागत में वृद्धि के कारण बड़ी संख्या में संस्थाएँ निष्क्रिय या परिसमापन की स्थिति में हैं।
    • जलवायु आघात और वैश्विक व्यवधानों ने खरीद लागत बढ़ाई है, जिससे लाभप्रदता प्रभावित हुई है।
  • आवास सहकारिताएँ: सहकारी बैंकों से जुड़े घोटालों और जमाकर्ताओं के विश्वास में कमी के कारण वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं।
    • बकाया भुगतान न होना, निधियों का दुरुपयोग और पुनर्विकास में देरी जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं।
  • ऋण एवं बचत सहकारी संस्थाएँ: कमजोर विनियामक निगरानी के कारण खराब ऋण प्रथाएँ और वित्तीय अस्थिरता देखी जाती है।
    • उच्च जोखिम वाले ऋण और घोटालों ने विश्वास को कम किया है, जिससे चूक (डिफॉल्ट) में वृद्धि हुई है।
  • श्रम सहकारिताएँ: इनकी उपस्थिति सीमित है, परंतु कुप्रबंधन, कराधान संबंधी समस्याएँ और दिवालियापन के जोखिम से प्रभावित हैं।
    • नीतिगत और संविदात्मक समस्याएँ उनकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता और स्थिरता को कम करती हैं।
  • महिला कल्याण सहकारिताएँ: सामान्यतः स्थिर हैं, किंतु वित्त तक सीमित पहुँच और योजनाओं के कम उपयोग से बाधित हैं।
    • सामाजिक बाधाएँ और संस्थागत समर्थन की कमी, विशेषकर कमजोर राज्यों में, इनके विकास में अवरोध उत्पन्न करती हैं।

कमज़ोर प्रदर्शन के प्रमुख कारण

  • सहकारी संस्थाओं में वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार।
  • विशेषकर लघु ऋण सहकारी समितियों में कमजोर विनियामक निगरानी।
  • मूल्य उतार-चढ़ाव और जलवायु घटनाओं जैसे बाहरी आर्थिक झटके।
  • सदस्यों की कम भागीदारी और शासन संबंधी समस्याएँ।
  • विशेषकर महिलाओं और लघु सहकारिताओं के लिए ऋण, बाजार और प्रौद्योगिकी तक सीमित पहुँच।

सरकारी पहल एवं नीतिगत प्रतिक्रिया

  • राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025: सहकारी क्षेत्र को पुनर्जीवित करने और देशभर में 50 करोड़ लोगों तक इसकी पहुँच बढ़ाने का लक्ष्य।
  • समावेशी विकास: महिलाओं, दलितों और आदिवासियों की भागीदारी को प्राथमिकता देकर सहकारिताओं को अधिक समानतापूर्ण और जमीनी स्तर पर सशक्त बनाना।
  • नए क्षेत्रों में विस्तार: सरकार टैक्सी सेवाओं (भारत टैक्सी), बीमा और हरित ऊर्जा जैसे उभरते क्षेत्रों में सहकारिताओं को प्रोत्साहित कर रही है।

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