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भारत में निवारक स्वास्थ्य सेवा

Lokesh Pal January 09, 2025 02:23 618 0

संदर्भ

देश में जीवन प्रत्याशा में वृद्धि और समय से पूर्व बीमारी का बोझ बढ़ने के कारण भारत दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है, जिसके कारण प्रारंभिक जाँच पर ध्यान देने के साथ निवारक स्वास्थ्य सेवा की आवश्यकता है।

निवारक उपाय (Preventive Measures

निवारक उपायों से तात्पर्य, रोगों को प्रारंभिक चरण में ही प्रसारित होने से रोकने, जोखिम कारकों का प्रबंधन करने और समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए की जाने वाली सक्रिय कार्रवाइयों से है। इनमें शामिल हैं:

  • प्राथमिक रोकथाम: टीकाकरण, स्वच्छता और जीवनशैली में बदलाव के माध्यम से बीमारियों से बचना।
  • द्वितीयक रोकथाम: रोग की प्रगति को रोकने के लिए प्रारंभिक पहचान और शीघ्र उपचार।
  • तृतीय रोकथाम: जटिलताओं को न्यूनतम करने और जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक रोगों का प्रबंधन करना।

भारत में निवारक उपायों की आवश्यकता

  • वृद्ध आबादी की बढ़ती संख्या: बढ़ती जीवन प्रत्याशा के साथ, भारत की वृद्ध आबादी वर्ष 2050 तक 320 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है। इस समूह में गैर-संचारी रोगों, जैसे हृदय संबंधी रोग (Cardiovascular Diseases- CVD), मधुमेह और कैंसर का उच्च प्रसार देखा गया  है। 
  • बच्चों में कुपोषण: बचपन में स्टंटिंग चिंता का विषय बना हुआ है, पाँच वर्ष से कम आयु के 35.5% बच्चे स्टंटिंग से पीड़ित हैं (NFHS-5)। कुपोषण संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है और संक्रमण के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाता है। 
    • बच्चों को रोकथाम योग्य बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण और पोषण कार्यक्रम महत्त्वपूर्ण हैं।
  • महिलाओं में कमी: 15-49 वर्ष की आयु की 57% महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित हैं, जिसमें पोषण संबंधी कमियाँ एक महत्त्वपूर्ण कारण हैं। इसके अतिरिक्त, स्तन और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर में भी वृद्धि हो रही है, जिनका प्रायः देर से निदान होता है।
    • लक्षित स्वास्थ्य जाँच, पोषण अनुपूरण और कैंसर जाँच से इन चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान किया जा सकता है।
  • हृदय संबंधी रोगों (CVD) का प्रचलन: वर्ष 2016 में भारत में कुल मौतों में से 63% मौतें NCD के कारण हुईं, जिनमें से 27% CVD के कारण हुईं। 40-69 वर्ष आयु वर्ग में 45% मौतें CVD के कारण होती हैं। जोखिम कारकों में उच्च रक्तचाप, मोटापा और उच्च कोलेस्ट्रॉल शामिल हैं।
    • नियमित जाँच, जीवनशैली में परिवर्तन और जन जागरूकता अभियान जैसे निवारक उपाय महत्त्वपूर्ण हैं।
  • उच्च संचारी रोगों का बोझ: प्रगति के बावजूद, तपेदिक (TB) और मलेरिया जैसी बीमारियाँ स्थानिक बनी हुई हैं।
    • भारत में वर्ष 2022 में 1.6 मिलियन TB के मामले दर्ज किए गए, जिसमें ‘मल्टीड्रग-रेसिस्टेंट TB’ अतिरिक्त चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहा है। बेहतर निदान, टीकाकरण और स्वच्छता को बढ़ावा देना आवश्यक है।
  • गैर-संचारी रोगों (Non-Communicable Diseases- NCD) का बढ़ता जोखिम: NCD के लिए जोखिम कारकों का प्रचलन चिंताजनक रूप से अधिक है। चार में से एक वयस्क पुरुष उच्च रक्तचाप से ग्रस्त है। आठ में से एक मधुमेह से पीड़ित है।
    • प्रारंभिक निदान और जीवनशैली में हस्तक्षेप से बढ़ते NCD को कम किया जा सकता है।
  • भारत में बीमारी का आर्थिक बोझ: बढ़ते स्वास्थ्य सेवा खर्च और उत्पादकता में कमी से विशेषकर मध्यम और निम्न आय वाले परिवारों के लिए वित्तीय स्थिरता को खतरा है।
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमान, 2021-22 के अनुसार, कुल स्वास्थ्य व्यय (Total Health Expenditure-THE) के प्रतिशत के रूप में ‘आउट-ऑफ-पॉकेट’ व्यय (Out of Pocket Expenditure- OOPE) 39.4% है।

‘आउट-ऑफ-पॉकेट’ व्यय (OOPE)

  • ‘आउट-ऑफ-पॉकेट’ व्यय (OOPE) का तात्पर्य स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने के लिए परिवारों द्वारा किए गए प्रत्यक्ष भुगतान से है।
  • इसमें सार्वजनिक या निजी बीमा या सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के अंतर्गत आने वाले लोग शामिल नहीं हैं।

    • केंद्रीय बजट 2024 में स्वास्थ्य सेवा के लिए 87,657 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो 13% की वृद्धि है, लेकिन भारत की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के लिए अपर्याप्त है।
    • WHO का अनुमान है कि भारत में NCD की लागत वर्ष 2030 तक 280 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगी, जो प्रति परिवार 2 लाख रुपये के बराबर है।

स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को व्यापक निवारक रणनीतियों को लागू करना होगा

  • नियमित स्वास्थ्य जाँच: मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर और अन्य स्थितियों के लिए समय-समय पर जाँच के माध्यम से प्रारंभिक पहचान महत्त्वपूर्ण है।
    • उच्च जोखिम वाले समूहों, जैसे महिलाओं [मैमोग्राम [Mammograms], पैप स्मीयर [Pap Smears)] और बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए अनुकूलित स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल, परिणामों को बेहतर बना सकते हैं।
  • भूखमरी से निपटाना: मध्याह्न भोजन योजना और एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) जैसे पोषण कार्यक्रमों को मजबूत करके कुपोषण से निपटा जा सकता है। 
    • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में फोर्टिफाइड अनाज और खाद्य तेल जैसे पोषक तत्त्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करने से आहार सेवन में और सुधार हो सकता है।
  • चिकित्सा हस्तक्षेप: हेपेटाइटिस, सर्वाइकल कैंसर और इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारियों के लिए टीकाकरण कार्यक्रमों को बढ़ाना।
    • नियमित रूप से कृमि मुक्ति को बढ़ावा देना, विशेष रूप से उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में बच्चों के लिए।
  • सभी के लिए स्वास्थ्य सुविधाएँ (Healthcare Facilities for All): सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा पहुँच सुनिश्चित करने के लिए आयुष्मान भारत पहल का विस्तार करना। दूरदराज के क्षेत्रों में पहुँच में सुधार के लिए टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म स्थापित करना।
  • जन जागरूकता अभियान: स्वस्थ जीवन शैली, स्वच्छता और निवारक देखभाल के महत्त्व पर जानकारी का प्रसार करना।
    • जमीनी स्तर पर जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को शामिल करना।

भारत में स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए सरकारी पहल

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के माध्यम से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज: केंद्र सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में वंचित और हाशिए पर पड़े समूहों पर ध्यान केंद्रित करते हुए सुलभ और सस्ती स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में राज्यों का समर्थन करती है।
    • प्रयासों में स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे को मजबूत करना, पर्याप्त मानव संसाधन सुनिश्चित करना और स्वास्थ्य देखभाल की पहुँच और गुणवत्ता में सुधार करना शामिल है।
  • मिशन-मोड हेल्थकेयर परियोजनाएँ
    • प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (PM-ABHIM): प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों में क्षमताएँ विकसित करता है।
      • मौजूदा राष्ट्रीय संस्थानों को मजबूत बनाता है और उभरती बीमारियों से निपटने के लिए नए संस्थान स्थापित करता है।
      • यह 64,180 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली एक केंद्र प्रायोजित योजना है।
    • आयुष्मान आरोग्य मंदिर (AAM): सभी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए निवारक, प्रोत्साहन, उपचारात्मक, उपशामक और पुनर्वास सेवाओं सहित निःशुल्क और निकट व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना।
      • उप-स्वास्थ्य केंद्रों (Sub-Health Centres- SHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (Primary Health Centres-PHC) को परिवर्तित करके 1,75,418 AAM संचालित किए गए।
    • आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY): 55 करोड़ लाभार्थियों (12.37 करोड़ परिवार) को द्वितीयक और तृतीयक देखभाल के लिए प्रति परिवार वार्षिक रूप से 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य कवर प्रदान करता है।
      • हाल ही में इसे 70 वर्ष या उससे अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों के लिए, चाहे उनकी आय कुछ भी हो, शामिल किया गया है।
  • जेब से होने वाले खर्च में कमी
    • राष्ट्रीय निःशुल्क औषधि सेवा पहल (National Free Drugs Service Initiative): सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करती है।
    • निःशुल्क निदान सेवाएँ: सार्वजनिक सुविधाओं पर रोगियों को आवश्यक निदान सेवाएँ प्रदान करती है।
    • प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (PMBJP): राज्य सरकारों के सहयोग से किफायती कीमतों पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाइयाँ प्रदान करती है।
    • अमृत फार्मेसीज (AMRIT Pharmacies): किफायती दवाइयाँ और प्रत्यारोपण संबंधी सुविधा उपलब्ध कराने के लिए चुनिंदा अस्पतालों में स्थापित की गई हैं।

भारत में निवारक स्वास्थ्य सेवा की चुनौतियाँ

  • प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढाँचे में कमी: आयुष्मान भारत जैसी सरकारी पहलों के बावजूद, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) को, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्टाफ की कमी, चिकित्सा उपकरणों की कमी और अपर्याप्त सुविधाओं जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
    • ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी, 2022-23 के अनुसार, 8% प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं हैं तथा 39% में प्रयोगशाला तकनीशियनों का अभाव है, जिससे सेवा वितरण में बाधा आ रही है।
  • निवारक स्वास्थ्य उपायों के बारे में जागरूकता की कमी: जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा निवारक स्वास्थ्य देखभाल के महत्त्व, जैसे कि नियमित जाँच, टीकाकरण और स्वच्छता प्रथाओं के बारे में अनभिज्ञ है।
    • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) द्वारा वर्ष 2023 में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 45% महिलाएँ गर्भाशय-ग्रीवा कैंसर की जाँच के बारे में जागरूक थीं, जो व्यापक शिक्षा अभियान की आवश्यकता को दर्शाता है।
  • निदान और टीकाकरण के प्रति संकोच: सांस्कृतिक उपेक्षा और निदान का डर लोगों को मधुमेह, कैंसर और हृदय संबंधी बीमारियों जैसी स्थितियों के लिए जाँच करवाने से रोकता है।
    • टीकाकरण अभियान के बावजूद, टीकाकरण के प्रति संकोच बना हुआ है, NFHS-5 के अनुसार, 2022 में पाँच वर्ष से कम आयु के 6% बच्चों का अभी भी पूर्ण टीकाकरण नहीं हुआ है।
  • प्राथमिक स्तर पर लापरवाही या उचित कार्यान्वयन का अभाव: मध्याह्न भोजन योजना और एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) जैसी नीतियों का क्रियान्वयन प्रायः अनियमित होता है, जिससे कुपोषण को दूर करने और स्वास्थ्य शिक्षा को बढ़ावा देने में उनकी प्रभावशीलता प्रभावित होती है।
    • नीति आयोग (2022) की रिपोर्ट ने कई राज्यों में फंड के उपयोग में अनियमितताओं और खाद्य गुणवत्ता में अंतर को उजागर किया।
  • निगरानी और मूल्यांकन का अभाव: स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रमों की अपर्याप्त निगरानी से जमीनी स्तर पर अक्षमता और सीमित जवाबदेही होती है।
    • नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की वर्ष 2021 की एक रिपोर्ट ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत निगरानी और डेटा संग्रह में खामियों की ओर इशारा किया, जिससे सेवा वितरण परिणाम प्रभावित हुए।
  • उच्च आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय (OOPE): उच्च OOPE नियमित स्वास्थ्य जाँच और निवारक हस्तक्षेपों को हतोत्साहित करता है, विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच।
  • निवारक देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य पर अपर्याप्त ध्यान: चिंता, अवसाद और तनाव से संबंधित विकारों के बढ़ते प्रचलन के बावजूद, निवारक रणनीतियों में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को काफी हद तक नजरअंदाज किया जाता है।
    • राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) में पाया गया कि 10.6% वयस्क मानसिक स्वास्थ्य विकारों से पीड़ित हैं, जिनके पास प्रारंभिक हस्तक्षेप तक बहुत कम पहुँच है।
  • जीवनशैली की आदतों में बदलाव का प्रतिरोध: कई व्यक्ति स्वस्थ जीवनशैली अपनाने में अनिच्छुक रहते हैं, जैसे शारीरिक गतिविधि में वृद्धि और अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना।
    • वैश्विक पोषण रिपोर्ट (2022) में कहा गया है कि भारत की 25% वयस्क आबादी मोटापे या अधिक वजन वाली है, जो जीवनशैली विकल्पों से जुड़ी एक बढ़ती चिंता है।
  • हाशिए पर पड़े समुदायों में आहार संबंधी अंतर: जनजातीय और हाशिए पर पड़े समूह प्रायः अधिक कैलोरी वाले, लेकिन कम पोषक तत्त्वों वाले आहार पर निर्भर रहते हैं, जिसके कारण उनमें कुपोषण और प्रछन्न भूख दोनों की समस्या उत्पन्न होती है।
    • खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने वर्ष 2022 ने बताया कि भारत की 74% ग्रामीण आबादी स्वस्थ आहार का खर्च नहीं उठा सकती, जिससे कुपोषण की समस्या और बढ़ जाती है।
  • स्वास्थ्य सेवा पहुँच में शहरी-ग्रामीण विभाजन: शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच है, जिससे ग्रामीण आबादी वंचित रह जाती है।
    • नीति आयोग (2021) के अनुसार, 60% ग्रामीण परिवारों को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने के लिए 5 किमी. से अधिक की यात्रा करनी पड़ती है, जिसके परिणामस्वरूप निदान और उपचार में देरी होती है।

भारत में निवारक स्वास्थ्य सेवा के लिए आगे की राह

  • प्रौद्योगिकी के माध्यम से प्रारंभिक जाँच सुविधाओं को मजबूत करना: लागत प्रभावी, बड़े पैमाने पर जाँच के लिए AI-सक्षम इमेजिंग को एकीकृत करके और लक्षित, जोखिम-संचालित हस्तक्षेपों को लागू करने के लिए डेटा का लाभ उठाकर आयुष्मान स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों में क्षमताओं का विस्तार करना।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से जाँच सुविधाओं को सब्सिडी देना: निजी स्वास्थ्य प्रदाताओं और बीमाकर्ताओं को 40-60 वर्ष की आयु के व्यक्तियों के लिए सब्सिडी वाले जाँच पैकेज की पेशकश करने के लिए प्रोत्साहित करना। लागतों की भरपाई करने और निवारक पहलों का समर्थन करने के लिए स्वास्थ्य सेवा उपकर या तंबाकू और चीनी उत्पादों पर प्रस्तावित उच्च GST स्लैब से धन का उपयोग करना।
  • निवारक स्वास्थ्य जाँच के लिए कर प्रोत्साहन बढ़ाना: स्वास्थ्य सेवा मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए आयकर अधिनियम की धारा 80D के तहत कर कटौती सीमा को ₹5,000 से बढ़ाकर ₹15,000 करना, जिससे व्यक्तियों को नियमित व्यापक स्वास्थ्य जाँच से गुजरने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
  • जन जागरूकता और सुलभता को बढ़ावा देना: नियमित जाँच और निवारक उपायों के महत्त्व को उजागर करने के लिए व्यापक अभियान शुरू करना, जिससे निवारक स्वास्थ्य सेवा सभी आय समूहों के लिए अधिक सुलभ और सस्ती हो सके।
  • सब्सिडी वाली निवारक सेवाएँ: सिंगापुर की CHAS (सामुदायिक स्वास्थ्य सहायता योजना) के समान किफायती स्वास्थ्य जाँच और जाँच शुरू करना, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि निवारक देखभाल आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सुलभ हो।
  • निवारक देखभाल के लिए बीमा का विस्तार करना: स्वास्थ्य बीमा कवरेज में निवारक सेवाओं को शामिल करना, जैसा कि जर्मनी में देखा गया है, जहाँ अनिवार्य जाँच सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा का एक हिस्सा है।

निष्कर्ष

भारत में निवारक स्वास्थ्य सेवा को प्राथमिकता देना बीमारियों के बढ़ते बोझ और उससे जुड़ी आर्थिक लागतों को कम करने के लिए महत्त्वपूर्ण है। निवारक देखभाल केवल एक चिकित्सा आवश्यकता नहीं है, बल्कि मानव पूँजी और राष्ट्रीय प्रगति में एक सामाजिक निवेश है।