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डिजिटल लत में वृद्धि और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ

Lokesh Pal February 02, 2026 02:00 12 0

संदर्भ

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने बढ़ती डिजिटल लत और स्क्रीन से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को एक प्रमुख उभरती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में चिह्नित किया है, जो विशेष रूप से बच्चों और किशोरों को प्रभावित कर रही है।

डिजिटल लत क्या है?

  • परिभाषा: आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, डिजिटल लत से आशय स्मार्टफोन, गेमिंग प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया जैसे डिजिटल उपकरणों के साथ अनियंत्रित एवं अत्यधिक जुड़ाव से है।
  • व्यवहारात्मक प्रकृति: इसे व्यवहारात्मक लत के रूप में मान्यता दी गई है, जिसमें नियंत्रण की कमी, मानसिक तनाव तथा कार्यात्मक क्षति देखी जाती है, न कि किसी पदार्थ पर निर्भरता।
  • WHO की मान्यता: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ऑनलाइन गेमिंग लत को ICD-11 में ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ के अंतर्गत एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति के रूप में मान्यता दी है। इसे गेमिंग पर नियंत्रण की कमी, अन्य गतिविधियों की तुलना में गेमिंग को प्राथमिकता देना, तथा नकारात्मक परिणामों के बावजूद खेलना जारी रखना के रूप में परिभाषित किया गया है।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ 

  • डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार: भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का योगदान वित्त वर्ष 2023 में राष्ट्रीय आय का 11.74% रहा और इसके वित्त वर्ष 2025 तक 13.42% तक पहुँचने का अनुमान है, जो बड़े पैमाने पर डिजिटल अपनाने को दर्शाता है।
  • कनेक्टिविटी में तीव्र वृद्धि: इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या वर्ष 2014 में 25.15 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2024 में 96.96 करोड़ हो गई है। यह वृद्धि देशव्यापी 5G सेवा का विस्तार और 2.18 लाख ग्राम पंचायतों तक भारतनेट कनेक्टिविटी के विस्तार से प्रेरित है।
  • लगभग सार्वभौमिक पहुँच: वर्ष 2025 में 85.5% भारतीय परिवारों के पास कम-से-कम एक स्मार्टफोन है, जो विभिन्न सामाजिक वर्गों में डिजिटल पहुँच की व्यापकता को दर्शाता है।
  • उच्च तीव्रता वाले उपयोग पैटर्न: वर्ष 2024 में 48% उपयोगकर्ताओं ने ऑनलाइन वीडियोज, 43% ने सोशल मीडिया का उपयोग किया, 40% ने ईमेल और ऑनलाइन संगीत का उपयोग किया तथा 26% ने डिजिटल भुगतान सेवाओं का प्रयोग किया।
  • बड़ा उपयोगकर्ता आधार: ये उपयोग हिस्सेदारी लगभग 40 करोड़ ओटीटी उपयोगकर्ताओं और करीब 35 करोड़ सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं में परिवर्तित होती है, जिससे डिजिटल जोखिमों का दायरा और तीव्र होता है।
  • युवा वर्ग का प्रभुत्व: 15–29 वर्ष आयु वर्ग में इंटरनेट और स्मार्टफोन का उपयोग लगभग सार्वभौमिक है, जिससे युवा वर्ग डिजिटल लत से जुड़ी चिंताओं के केंद्र में है।

डिजिटल सहभागिता के विस्तृत पैमाने, उच्च तीव्रता और युवा-केंद्रित स्वरूप ने डिजिटल लत को केवल एक व्यक्तिगत व्यवहारिक समस्या से आगे बढ़ाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा तथा मानव पूँजी से जुड़ी एक प्रणालीगत चुनौती में परिवर्तित कर दिया है।

डिजिटल लत के प्रमुख कारण 

  • आसान उपलब्धता: स्मार्टफोन, सस्ता डेटा और 24×7 इंटरनेट की उपलब्धता के कारण डिजिटल सहभागिता निरंतर और लगभग अपरिहार्य हो गई है, जिससे डिजिटल लत में वृद्धि हो रही है।
  • एल्गोरिदम-आधारित संबद्धता: ऑटो-प्ले फीचर्स, इनफिनिट स्क्रॉलिंग, शॉर्ट-वीडियो लूप और पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम का लाभ उठाकर लोगों को लगातार उपयोग करने के लिए बढ़ावा देते हैं।
  • सामाजिक मान्यता और तुलना: लाइक, शेयर, फॉलोअर संख्या और ऑनलाइन स्वीकृति बार-बार जाँचने की प्रवृत्ति और चिंता को जन्म देती है, विशेष रूप से किशोरों और युवा वयस्कों में।
  • कुछ छूट जाने का भय (FoMO): अपडेट, सामाजिक संपर्क या ट्रेंड छूट जाने की आशंका से उपयोगकर्ताओं में चिंता बढ़ती है, जिससे वे बार-बार डिजिटल प्लेटफॉर्म जाँचने लगते हैं।
  • शैक्षणिक और सामाजिक दबाव: शैक्षणिक प्रतिस्पर्द्धा का सामना कर रहे छात्र डिजिटल प्लेटफॉर्म को तनाव से निपटने के साधन के रूप में अपनाते हैं, जो अक्सर अनियंत्रित उपयोग में बदल जाता है।
  • रियल-मनी गेमिंग और ऑनलाइन जुआ: दाँव आधारित प्लेटफ़ॉर्म और कौशल-आधारित गेमिंग के मुद्रीकरण तक आसान पहुँच से लत, ऋण और मानसिक तनाव का जोखिम बढ़ता है।
  • महामारी-जनित व्यावहारिक परिवर्तन: COVID-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक संपर्क पर निर्भरता बढ़ी, जिससे अत्यधिक स्क्रीन-समय की आदतें सुदृढ़ हुईं और स्क्रीन-निर्भरता का सामान्यीकरण हुआ।

डिजिटल लत के प्रभाव

  • संज्ञानात्मक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
    • मनोवैज्ञानिक विकार: डिजिटल लत का गहरा संबंध चिंता, अवसाद, तनाव और आत्मसम्मान में कमी जैसे नकारात्मक लक्षणों से हैं, विशेष रूप से युवा वर्ग में।
    • नींद में व्यवधान: देर रात स्क्रीन के संपर्क में रहने से नींद की कमी तथा संज्ञानात्मक कार्यक्षमता में कमी आती है।
  • शैक्षणिक एवं उत्पादकता में हानि
    • शैक्षणिक गिरावट: अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से ध्यान अवधि, एकाग्रता और अध्ययन समय में कमी आती है, जिससे शैक्षणिक उपलब्धियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
    • कार्यस्थल पर अक्षमता: निरंतर डिजिटल विचलनों के कारण उत्पादकता, एकाग्रता और कार्य पूर्ण करने की क्षमता में कमी आती है, जिससे पेशेवर कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
  • सामाजिक पूँजी में ह्रास
    • ऑफलाइन संबंधों की कमजोरी: अनियंत्रित डिजिटल उपयोग सामना-सामना बातचीत, सामुदायिक भागीदारी और अंतरव्यक्तिगत कौशल को कमजोर करता है।
    • अलगाव विरोधाभास: उच्च कनेक्टिविटी के बावजूद, डिजिटल लत अक्सर अकेलापन और सामाजिक अलगाव का कारण बनती है।
  • आर्थिक और वित्तीय लागत
    • प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान: ऑनलाइन खरीदारी, गेमिंग पर खर्च और साइबर धोखाधड़ी सीधे मौद्रिक नुकसान डालते हैं।
    • दीर्घकालिक आय पर प्रभाव: कम रोजगार क्षमता, उत्पादकता और कौशल विकास से जीवनभर की आय की संभावना प्रभावित होती है।

संवैधानिक और मानव पूँजी आयाम

  • जीवन का अधिकार और मानसिक स्वास्थ्य (अनुच्छेद-21): मानसिक स्वास्थ्य एक सम्मानजनक जीवन के लिए अनिवार्य है; व्यापक डिजिटल लत एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती प्रस्तुत करती है।
  • बाल अधिकार दृष्टिकोण: संवैधानिक नैतिकता और संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन के तहत, राज्य की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को शोषणकारी और व्यसनकारी डिजिटल वातावरण से सुरक्षित रखे।
  • शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद-21A): ध्यान में कमी, अधिगम की हानि और स्क्रीन पर निर्भरता शैक्षणिक परिणामों और संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करती है।
  • जनसांख्यिकीय लाभ पर खतरा: अनियंत्रित डिजिटल लत भारत के जनसांख्यिक लाभ को कम कर सकती है, जिससे यह कम उत्पादकता और श्रम बल भागीदारी के माध्यम से जनसांख्यिक बोझ में बदल सकता है।

भारत-विशिष्ट नीति और शासन संबंधी चुनौतियाँ

  • डेटा की कमी: भारत में डिजिटल लत का प्रचलन और गंभीरता पर राष्ट्रीय स्तर का व्यापक डेटा नहीं है, जिससे लक्षित नीति निर्माण सीमित रह जाता है।
  • युवा जनसांख्यिकीय दबाव: भारत की बड़ी युवा आबादी डिजिटल लत के प्रभाव के पैमाने और जटिलता को बढ़ाती है।
  • शहरी-ग्रामीण पहुँच का अंतर: ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल पहुँच तेजी से बढ़ी है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना और जागरूकता इसका समर्थन नहीं कर पा रही है।
  • नियामक पिछड़ापन: तकनीकी नवाचार और प्लेटफॉर्म मुद्रीकरण मॉडल व्यावहारिक स्वास्थ्य नियमों की तुलना में तेजी से विकसित हो रहे हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य कलंक: सामाजिक कलंक प्रारंभिक सहायता और काउंसलिंग लेने में बाधा डालता है, विशेष रूप से किशोरों में।

वैश्विक पहल 

  • WHO की मान्यता: WHO के ICD-11 में औपचारिक रूप से गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के रूप में मान्यता दी गई है।
  • ऑस्ट्रेलिया: 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया खातों पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लागू किया।
  • चीन: सख्त गेमिंग सीमाएँ लागू कीं, जिसमें सप्ताहांत और छुट्टियों में दिन में केवल एक घंटे ऑनलाइन गेमिंग की अनुमति दी गई, साथ ही रियल-नेम ऑथेंटिकेशन का उपयोग किया गया।
  • दक्षिण कोरिया: ‘सिंडरेला लॉ’ लागू की, जो नाबालिगों के लिए रात में गेमिंग को सीमित करती थी, बाद में इसे अभिभावक नियंत्रण तंत्र द्वारा बदल दिया गया।
  • सिंगापुर: मीडिया साक्षरता परिषद के माध्यम से सामुदायिक दृष्टिकोण अपनाया, साइबर वेलनेस और जिम्मेदार डिजिटल नागरिकता को बढ़ावा दिया।
  • यूनाइटेड किंगडम: डिजिटल रेजिलिएंस फ्रेमवर्क विकसित किया, जिसमें शिक्षा और तकनीक डिजाइन में डिजिटल कल्याण  को एकीकृत किया गया।
  • विद्यालय स्तर पर प्रतिबंध: फ्राँस, स्पेन, फिनलैंड, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के कुछ हिस्सों में स्कूलों में स्मार्टफोन उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • काउंसलिंग अवसंरचना: सियोल महानगर सरकार के ‘I Will Centres’ युवा वर्ग के लिए लत निवारण और पुनर्प्राप्ति काउंसलिंग प्रदान करते हैं।

भारत में पहल

  • शैक्षणिक दिशा-निर्देश: CBSE ने स्कूलों और स्कूल बसों में सुरक्षित इंटरनेट उपयोग पर दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
  • डिजिटल शिक्षा ढाँचा: शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत प्रज्ञातः फ्रेमवर्क (Pragyatah Framework) डिजिटल शिक्षा में स्क्रीन-टाइम पर विचार को शामिल करता है।
  • बाल संरक्षण मानदंड: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने स्क्रीन-टाइम सीमाएँ और ऑनलाइन सुरक्षा दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं।
  • टेली-मानस: वर्ष 2022 में लॉन्च, यह 24×7 टोल-फ्री मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन (14416) प्रदान करता है और अब तक 32 लाख से अधिक कॉल्स का निदान किया जा चुका है; वर्ष 2024 में इसका ऐप भी लॉन्च किया गया।
  • SHUT क्लिनिक, NIMHANS: अत्यधिक तकनीकी उपयोग के लिए विशेष उपचार प्रदान करता है और अभिभावक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करता है।
  • ऑनलाइन गेमिंग (नियमन) अधिनियम, 2025: दाँव आधारित ऑनलाइन मनी गेम्स पर प्रतिबंध, विज्ञापन का नियमन और अनुमति प्राप्त कौशल-आधारित गेम्स के लिए लाइसेंसिंग कर लत और वित्तीय हानि को कम करता है।
  • डिजिटल डिटॉक्स पहल: कर्नाटक का ‘डिजिटल डेटाॅक्स सेंटर–बियाॅण्ड स्क्रीन्स’ गंभीर डिजिटल लत से जूझ रहे व्यक्तियों का समर्थन करता है।

आगे की राह 

  • साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण: दूसरा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) डिजिटल लत के प्रचलन और प्रभावों पर विश्वसनीय डेटा जुटाने के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।
  • परिणाम-आधारित संकेतक: नीतियों को स्क्रीन-टाइम पैटर्न, नींद की गुणवत्ता, चिंता के स्तर, शैक्षणिक प्रदर्शन, उत्पादकता और साइबर सुरक्षा जोखिम पर निगरानी रखनी चाहिए।
  • विद्यालय-केंद्रित हस्तक्षेप: स्कूलों में डिजिटल वेलनेस पाठ्यक्रम लागू करना चाहिए, जिसमें स्क्रीन-टाइम साक्षरता, साइबर सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता शामिल हो।
    • स्कूलों में स्क्रीन के अधिक उपयोग से होने वाली निष्क्रिय जीवनशैली को रोकने के लिए फिजिकल एक्टिविटी अनिवार्य करनी चाहिए।
  • ऑफलाइन सहभागिता स्थल: सरकारें शहरी झुग्गी-झोपड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में ऑफलाइन युवा हब स्थापित करें ताकि स्वस्थ सामाजिक संपर्क को बढ़ावा मिल सके।
  • परिवार क्षमता निर्माण: माता-पिता को लत के लक्षण पहचानने, डिवाइस-फ्री घंटे लागू करने और पेरेंटल कंट्रोल टूल्स का प्रभावी उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
  • प्लेटफॉर्म जिम्मेदारी: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को आयु सत्यापन, आयु-उपयुक्त डिफॉल्ट सेटिंग्स, और ऑटो-प्ले, जुआ सामग्री और लक्षित विज्ञापन पर प्रतिबंध लागू करना चाहिए।
  • नैतिक तकनीक डिजाइन: “समय का सदुपयोग” सिद्धांत, जटिल डिजाइन, और एल्गोरिदमिक पारदर्शिता को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी-सुरक्षा उपाय: ISP-स्तरीय कंटेंट फिल्टरिंग, विभेदित डेटा योजनाएँ तथा बच्चों के लिए शिक्षा-केवल टैबलेट जैसे सरल उपकरण, हानिकारक डिजिटल सामग्री के संपर्क को कम कर सकते हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य पहुँच का विस्तार: टेली-मानस को डिजिटल लत के लिए विशेषज्ञ काउंसलरों के साथ विस्तारित किया जाना चाहिए और स्कूलों व कॉलेजों में प्रारंभिक हस्तक्षेप के लिए एकीकृत किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष 

डिजिटल लत का समाधान एक संतुलित दृष्टिकोण की माँग करता है, जिसमें जागरूकता, नियमन, नैतिक तकनीक डिजाइन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, सामुदायिक सहभागिता और जिम्मेदार व्यक्तिगत व्यवहार शामिल हों, ताकि भारत की मानव पूँजी और सामाजिक कल्याण सुरक्षित रह सके।

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