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विमुक्त जनजातियों द्वारा संवैधानिक मान्यता की माँग

Lokesh Pal February 06, 2026 03:27 7 0

संदर्भ

विमुक्त जनजातियों (DNTs), घुमंतू जनजातियों (NTs) और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों (SNTs) ने प्रस्तावित वर्ष 2027 की जातिगत जनगणना में संवैधानिक मान्यता और एक अलग जनगणना स्तंभ की माँग की है।

विमुक्त जनजातियों (DNTs), घुमंतू जनजातियों और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों की माँगें 

  • अलग जनगणना स्तंभ
    • मुख्य माँग: वर्ष 2027 की जातिगत जनगणना में विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों को एक अलग स्तंभ में विशिष्ट कोड के साथ शामिल करना।
    • तर्क: अलग गणना के बिना, इन समुदायों को आशंका है कि वे फिर से बड़े वर्गों में समाहित हो जाएँगे और उनकी पहचान समाप्त हो जाएगी।
    • जनगणना का महत्त्व: वर्ष 2027 की प्रक्रिया वर्ष 1931 के बाद भारत की पहली जातिगत जनगणना होगी, जिससे ऐतिहासिक त्रुटियों को सुधारने के लिए यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • संवैधानिक मान्यता
    • अलग अनुसूची: वे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समान एक अलग संवैधानिक अनुसूची के माध्यम से मान्यता की माँग कर रहे हैं, ताकि लक्षित सुरक्षा उपायों को संस्थागत बनाया जा सके।
    • उद्देश्य: उनके विशिष्ट ऐतिहासिक अन्याय, अत्यधिक हाशियाकरण और निरंतर सामाजिक उपेक्षा को मान्यता देना।

मुख्य मुद्दे और समुदाय की चिंताएँ

  • स्तरीकृत पिछड़ापन: इनके नेता आंतरिक असमानताओं पर जोर देते हैं और स्थायी तथा घुमंतू DNTs समूहों के बीच अंतर करने हेतु उप-वर्गीकरण की माँग करते हैं।
  • निरंतर उपेक्षा: विमुक्ति के बावजूद, कई समुदायों को अब भी “आदतन अपराधी” शीर्षक के अंतर्गत सामाजिक उपेक्षा और पुलिस निगरानी का सामना करना पड़ता है।
  • दस्तावेजों की कमी: राज्यों द्वारा DNTs प्रमाण-पत्र जारी न किए जाने से ‘सीड (SEED) योजना’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच सीमित हुई है।
  • आँकड़ों की कमी: विश्वसनीय जनसंख्या संबंधी आँकड़ों के अभाव ने नीति-निर्माण के प्रयासों को कमजोर किया है, जिससे औपचारिक जनगणना की माँग और मजबूत हुई है।

विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियाँ कौन हैं?

  • सबसे कमजोर समुदाय
    • जिन्हें “विमुक्त जातियाँ” भी कहा जाता है, ये समूह भारत की सबसे अधिक हाशिए पर स्थित और वंचित आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • औपनिवेशिक काल: विमुक्त जनजातियाँ वे समुदाय थे, जिन्हें वर्ष 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम से शुरू होकर ब्रिटिश कानूनों के तहत “जन्मजात अपराधी” घोषित किया गया था।
    • उन्हें निरंतर निगरानी, कठोर नियंत्रण और स्थायी सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ा।
  • स्वतंत्रता के बाद: इन औपनिवेशिक कानूनों को वर्ष 1952 में निरस्त कर दिया गया और सूचीबद्ध समुदायों को आधिकारिक रूप से “विमुक्त” किया गया।
    • समय के साथ, अधिकांश DNTs को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया गया, जबकि कई समुदाय अब भी अवर्गीकृत रहे।
  • घुमंतू जनजातियाँ: घुमंतू जनजातियाँ वे समूह हैं, जो पारंपरिक रूप से बिना स्थायी निवास के एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं और नमक के व्यापार, ज्योतिष, लोक कला तथा पशुपालन जैसे कार्यों से जीवनयापन करते हैं।
    • उदाहरण: गुर्जर, गाड़िया लोहार।
  • अर्द्ध-घुमंतू जनजातियाँ: अर्द्ध-घुमंतू जनजातियाँ वे समुदाय हैं, जो वर्ष के कुछ समय तक घूमते रहते हैं और विशेष अवधि, प्रायः वर्षा ऋतु में, स्थायी आवास में लौट आते हैं, जबकि शेष समय आजीविका की तलाश में प्रवास करते हैं।
    • उदाहरण: धनगर, लांबाडा।
  • सामान्य विशेषताएँ
    • भूमि स्वामित्व की कमी: ऐतिहासिक रूप से इन समुदायों के पास निजी भूमि या घर का स्वामित्व अल्प समय के लिए या बिल्कुल भी नहीं रहा है।
    • पहचान दस्तावेजों का अभाव तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण योजनाओं तक कम पहुँच।
    • अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग वर्गीकरण से बाहर रहने के कारण कई समुदाय लक्षित लाभों से वंचित रहे।
  • जनसंख्या: वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 10.74 करोड़ लोग DNTs, NTs और SNTs समुदायों से संबंधित हैं।
  • संविधान कार्यप्रणाली समीक्षा राष्ट्रीय आयोग (2002) के निष्कर्ष: आयोग ने पाया कि DNTs को गलत रूप से अपराध-प्रवृत्ति वाला माना गया और उन्हें नियमित रूप से अधिकारियों तथा समाज द्वारा शोषण का सामना करना पड़ा।
  • मान्यता: विभिन्न समितियों की रिपोर्टें: स्वतंत्रता के बाद कई समितियों ने इनके मुद्दों को उजागर किया, जिनमें शामिल हैं:
    • आपराधिक जनजाति जाँच समिति (1947),
    • अनंतशयनम अय्यंगार समिति (1949) — जिसने आपराधिक जनजाति अधिनियम को निरस्त करने की सिफारिश की,
    • काका कालेलकर आयोग (1953),
    • मंडल आयोग (1980)।
  • रेनके आयोग (2008): इस आयोग ने बताया कि अधिकांश DNTs/NTs/SNTs समुदायों के पास बुनियादी पहचान दस्तावेज, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और आजीविका सहायता का अभाव है।
  • इदाते आयोग: इदाते आयोग की स्थापना वर्ष 2014 में भिकू रामजी इदाते की अध्यक्षता में की गई। इसका उद्देश्य विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों की व्यापक राज्यव्यापी सूची तैयार करना था।
    • आयोग को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से बाहर रह गए समुदायों की पहचान कर उनके लिए उपयुक्त कल्याणकारी उपाय सुझाने का कार्य सौंपा गया।
    • इसने देशभर में 1200 से अधिक DNTs समुदायों की पहचान की।
    • लगभग 267 समुदायों को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग में वर्गीकृत नहीं पाया गया।

विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए विकासात्मक प्रयास

  • डॉ. अंबेडकर पूर्व-मैट्रिक और उत्तर-मैट्रिक छात्रवृत्ति: यह केंद्रीय प्रायोजित योजना वर्ष 2014–15 में शुरू की गई थी। यह उन DNTs छात्रों को सहायता देती है, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल नहीं हैं।
  • नानाजी देशमुख छात्रावास योजना: वर्ष 2014–15 में शुरू की गई यह योजना DNTs बालक-बालिकाओं को छात्रावास सुविधा प्रदान करती है, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल नहीं हैं।
  • DNTs के आर्थिक सशक्तिकरण की योजना
    • यह पहल प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निःशुल्क कोचिंग, स्वास्थ्य बीमा, आवास सहायता और आजीविका समर्थन प्रदान करती है।
    • वर्ष 2021–22 से पाँच वर्षों में ₹200 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
    • इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी DNTs विकास एवं कल्याण बोर्ड की है।

विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू समुदायों के लिए विकास एवं कल्याण बोर्ड

  • कानूनी स्थिति: यह सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत एक संस्था है।
  • स्थापना: इसका गठन 21 फरवरी, 2019 को किया गया। भिकू रामजी इदाते इसके अध्यक्ष थे।
  •  मुख्यालय: नई दिल्ली।
  • नोडल मंत्रालय: सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय।
  • संरचना
    • अध्यक्ष: भारत सरकार द्वारा नियुक्त।
    • सदस्य सचिव / मुख्य कार्यकारी अधिकारी: भारत सरकार में संयुक्त सचिव के स्तर का अधिकारी।
    • 3 पदेन सदस्य और 5 नामित सदस्य: भारत सरकार द्वारा नामित।

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