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राज्यपाल का मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य होना

Lokesh Pal April 04, 2026 02:00 90 0

संदर्भ

हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद-161 की व्याख्या करते हुए कहा कि परिहार तथा दोषियों की समय-पूर्व रिहाई से संबंधित मामलों में राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से बाध्य होता है।

संबंधित तथ्य

  • यह निर्णय, न्यायिक दृष्टांतों में विरोधाभास तथा राज्यपाल की बढ़ती भूमिका पर चल रही बहसों के बीच दिया गया, जो भारत की संसदीय लोकतंत्र में निर्वाचित कार्यपालिका की प्रधानता को पुनः स्थापित करता है।

मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय के प्रमुख बिंदु

  • अनुच्छेद-161 कोई व्यक्तिगत विशेषाधिकार नहीं है: न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि अनुच्छेद-161 (क्षमादान, प्रविलंबन, विराम या परिहार की शक्ति) के प्रयोग में राज्यपाल के पास स्वतंत्र विवेकाधीन शक्तियाँ नहीं होती हैं।
    • इन शक्तियों का प्रयोग व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत रूप से निर्देशित होता है।
  • सहायता और सलाह की बाध्यकारी प्रकृति: यह दृढ़ता से दोहराया गया कि राज्यपाल, संसदीय प्रणाली के अनुरूप, मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है।
    • मंत्रिपरिषद की सलाह से पृथक होकर शक्ति का प्रयोग करना उत्तरदायी शासन के मूल सिद्धांत को कमजोर करेगा।
  • मंत्रिपरिषद की सलाह से विचलन संवैधानिक रूप से असंगत होगा: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सलाह से कोई भी विचलन संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है, क्योंकि यह लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर करेगा तथा संसदीय लोकतंत्र के मूल ढाँचे के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।
  • बाध्यकारी संवैधानिक दृष्टांतों की पुनः पुष्टि: निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा गया कि ऐसे पूर्व के कुछ निर्णय, जो इन मामलों में राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकार का संकेत देते थे, बाध्यकारी संवैधानिक दृष्टांतों की उपेक्षा में दिए गए हैं; इससे न्यायिक संगति और संवैधानिक सर्वोच्चता मजबूत होती है।
  • राज्यपाल एक औपचारिक प्रमुख, न कि समानांतर कार्यपालिका: न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि राज्यपाल एक संवैधानिक या औपचारिक प्रमुख” के रूप में कार्य करता है और वह वैकल्पिक या समानांतर कार्यपालिका के रूप में कार्य नहीं कर सकता।
    • वास्तविक कार्यपालिका शक्ति निर्वाचित सरकार में निहित होती है, जिससे जनता की लोकतांत्रिक इच्छा का पालन सुनिश्चित होता है।

अनुच्छेद-161 के बारे में

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद-161 राज्यपाल को उन अपराधों के संबंध में क्षमादान शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार देता है, जिन पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति लागू होती है। इनमें शामिल हैं:
    • क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार प्रदान करना।
    • दंड को निलंबित, परिहार या लघुकरण करना।
    • यह प्रावधान आपराधिक न्याय प्रणाली में एक संवैधानिक सुरक्षा उपाय के रूप में कार्य करता है, जो राज्य को न्यायिक त्रुटियों को सुधारने, असंगत दंड को संबोधित करने तथा मानवीय विचारों को समाहित करने में सक्षम बनाता है।
  • शक्ति की प्रकृति: यद्यपि यह शक्ति औपचारिक रूप से राज्यपाल में निहित है, इसका संवैधानिक स्वरूप स्पष्ट रूप से परिभाषित है:
    • कार्यपालिका स्वरूप, व्यक्तिगत नहीं: यह शक्ति राज्य की कार्यपालिका के कार्य के रूप में प्रयोग की जाती है, न कि राज्यपाल के व्यक्तिगत विशेषाधिकार के रूप में।
    • संवैधानिक सीमाओं के अधीन: इस शक्ति का प्रयोग पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है और यह न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन है, विशेषकर मनमानी, दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य या अप्रासंगिक विचारों के आधार पर।
    • मानवीय और सुधारात्मक उद्देश्य: इसका उद्देश्य कानून की कठोरता को करुणा से संतुलित करना है, न कि स्वतंत्र या विवेकाधीन अधिकार प्रदान करना।
    • अतः, अनुच्छेद-161 एक संतुलित संवैधानिक तंत्र को दर्शाता है, जो न्याय और क्षमादान के बीच संतुलन स्थापित करता है तथा उत्तरदायी शासन के ढाँचे के भीतर कार्य करता है।

मंत्रिमंडल की संवैधानिक स्थिति

  • मंत्रिमंडल भारत की संसदीय प्रणाली के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका में निर्णय-निर्माण की केंद्रीय इकाई बनाता है।
  • यद्यपि संविधान के अनुच्छेद-164 में व्यापक रूप से मंत्रिपरिषद का उल्लेख है, मंत्रिमंडल उसका आंतरिक और सबसे शक्तिशाली भाग है, जो वास्तविक कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करता है।
  • यह राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री के नेतृत्व में कार्य करता है।
  • यह सरकार के प्रमुख नीति-निर्माण अंग के रूप में कार्य करता है।
  • यह राज्यपाल में निहित औपचारिक शक्तियों का प्रयोग करता है, जिससे संवैधानिक अधिकार को व्यावहारिक शासन में परिवर्तित किया जाता है।
    • इस प्रकार, मंत्रिमंडल कार्यपालिका शक्ति का संचालन केंद्र होता है।

संरचना और गठन

  • मंत्रिमंडल व्यापक मंत्रिपरिषद के भीतर वरिष्ठ मंत्रियों का एक चयनित समूह होता है।
    • कैबिनेट मंत्री → प्रमुख विभागों का दायित्व सँभालते हैं और महत्त्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेते हैं।
    • स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री → कभी-कभी विचार-विमर्श में शामिल होते हैं।
    • यह संरचना कनिष्ठ मंत्रियों और प्रशासनिक तंत्र द्वारा समर्थित होती है।
  • यह संरचना सुनिश्चित करती है:
    • निर्णय-निर्माण में दक्षता
    • शासन में गोपनीयता और समन्वय
    • महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में केंद्रित नेतृत्व।

मंत्रिमंडल के कार्य और शक्तियाँ

  • नीति निर्माण: मंत्रिमंडल निम्न के लिए उत्तरदायी होता है:
    • सार्वजनिक नीतियों और विकास रणनीतियों का निर्माण करना।
    • विधायी और प्रशासनिक एजेंडा निर्धारित करना।
    • उभरती सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का उत्तर देना।
  • कार्यपालिका अधिकार: यद्यपि कार्यपालिका शक्ति संवैधानिक रूप से राज्यपाल में निहित होती है, मंत्रिमंडल:
    • राज्य विधानमंडल में विधेयकों का प्रारूप तैयार करता है और उन्हें प्रस्तुत करता है।
    • सदन के आह्वान, स्थगन और विघटन के संबंध में सलाह देता है।
    • सरकारी विधेयकों के पारित होने को सुनिश्चित करता है।
  • विधायी भूमिका: मंत्रिमंडल विधायी प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाता है:
    • राज्य का बजट तैयार करता है और प्रस्तुत करता है।
    • कराधान नीतियाँ और सार्वजनिक व्यय की प्राथमिकताएँ निर्धारित करता है।
    • राजकोषीय प्रबंधन और संसाधनों के आवंटन को सुनिश्चित करता है।
  • वित्तीय नियंत्रण: मंत्रिमंडल राज्य के वित्त पर प्राथमिक नियंत्रण रखता है:
    • राज्य का बजट तैयार करता है और प्रस्तुत करता है।
    • कराधान नीतियाँ और सार्वजनिक व्यय की प्राथमिकताएँ निर्धारित करता है।
    • राजकोषीय प्रबंधन और संसाधनों के आवंटन को सुनिश्चित करता है।
  • क्षमा और संवैधानिक कार्य: अनुच्छेद-161 जैसे मामलों में (क्षमादान शक्तियाँ):
    • मंत्रिमंडल क्षमादान याचिकाओं की जाँच करता है।
    • यह राज्यपाल को बाध्यकारी सलाह प्रदान करता है।
    • यह सुनिश्चित करता है कि ऐसे निर्णय, कानूनी तर्क और मानवीय विचारों को प्रतिबिंबित करें।
      • यह इस बात को सुदृढ़ करता है कि राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियाँ भी वास्तविक रूप से मंत्रिमंडल द्वारा ही प्रयोग की जाती हैं।

राज्यपाल और निर्वाचित कार्यपालिका के बारे में

  • नाममात्र प्रमुख बनाम वास्तविक कार्यपालिका: संवैधानिक योजना एक स्पष्ट भेद स्थापित करती है:
    • राज्यपाल राज्य का नाममात्र या संवैधानिक प्रमुख है।
    • मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यकारी प्राधिकरण है।
    • यद्यपि अनुच्छेद-161 के अंतर्गत शक्तियाँ औपचारिक रूप से राज्यपाल के नाम पर प्रयोग की जाती हैं, उनका वास्तविक प्रयोग मंत्रिपरिषद के पास निहित होता है, जो संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुरूप है।

  • क्षमादान निर्णयों में मंत्रिमंडल की प्रधानता: अनुच्छेद-161 के संदर्भ में:
    • मंत्रिपरिषद क्षमादान याचिकाओं का मूल्यांकन करता है, जिसमें विधिक, प्रशासनिक और मानवीय कारकों पर विचार किया जाता है।
    • यह क्षमादान प्रदान करने, अस्वीकार करने, या संशोधित करने के संबंध में सलाह तैयार करता है।
    • राज्यपाल संवैधानिक रूप से इस सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य है।
      • यह सुनिश्चित करता है कि क्षमादान शक्तियों का प्रयोग लोकतांत्रिक रूप से उत्तरदायी प्रक्रिया के माध्यम से हो, न कि व्यक्तिगत विवेक के आधार पर।

  • परामर्श और सहायता का सिद्धांत: अनुच्छेद-163 के अंतर्गत, राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना आवश्यक है। यह सिद्धांत अनुच्छेद-161 पर पूर्णतः लागू होता है, जिसका अर्थ है कि:-
    • राज्यपाल क्षमादान शक्ति का प्रयोग एक स्वतंत्र व्यक्तिगत विशेषाधिकार के रूप में नहीं करता।
    • विवेकाधीन प्राधिकरण अत्यंत सीमित और अपवादात्मक है।
    • मंत्रिपरिषद की सलाह बाध्यकारी है, जो लोकतांत्रिक वैधता को बनाए रखती है।
      • यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि कार्यपालिकीय शक्ति, जिसमें क्षमादान क्षेत्राधिकार भी शामिल है, निर्वाचित सरकार की इच्छा के अनुरूप बनी रहे।
  • लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक नैतिकता: मंत्रिपरिषद अपनी शक्ति निर्वाचित विधानसभा से प्राप्त करती है, जिससे वह सामूहिक रूप से जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। यह सुनिश्चित करता है:
    • क्षमादान शक्तियों के प्रयोग में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व
    • जनहित और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूपता
    • मनमाने या राजनीतिक रूप से प्रेरित निर्णयों की रोकथाम।
      • इसके विपरीत, राज्यपाल, एक अनिर्वाचित प्राधिकरण होने के कारण, स्वतंत्र निर्णय-निर्धारण शक्ति से संपन्न नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे निम्नलिखित कमजोर होंगे:
        • प्रतिनिधिकारी लोकतंत्र
        • उत्तरदायी शासन का सिद्धांत
        • संस्थानों के मध्य संवैधानिक संतुलन।

न्यायिक उदाहरण

  • शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): यह महत्त्वपूर्ण निर्णय स्थापित करता है कि राज्यपाल संवैधानिक या नाममात्र प्रमुख है और सभी कार्यकारी शक्तियाँ मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर ही प्रयोग की जानी चाहिए।
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल की व्यक्तिगत विवेकाधीन शक्ति अत्यंत सीमित है और केवल दुर्लभ एवं अपवादात्मक परिस्थितियों तक ही सीमित है।
    • इसने दृढ़तापूर्वक स्थापित किया कि वास्तविक कार्यकारी प्राधिकरण निर्वाचित सरकार के पास है, न कि राज्यपाल के पास।
  • मारु राम बनाम भारत संघ (1980): इस मामले ने विशेष रूप से संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत क्षमादान शक्तियों के स्वरूप का परीक्षण किया।
    • न्यायालय के अनुसार, ऐसी शक्तियाँ राज्यपाल के व्यक्तिगत विशेषाधिकार नहीं हैं।
    • इनका प्रयोग मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर ही होना चाहिए।
    • इस निर्णय ने सुनिश्चित किया कि क्षमादान क्षेत्राधिकार लोकतांत्रिक रूप से उत्तरदायी और संस्थागत रूप से मार्गदर्शित रहे।
  • ए.जी. पेरारिवलन बनाम तमिलनाडु राज्य (2022): यह हाल का और महत्त्वपूर्ण निर्णय संवैधानिक स्थिति को और मजबूत करता है।
    • न्यायालय ने राज्य मंत्रिमंडल की प्रधानता को परिहार निर्णयों में पुनः पुष्टि की।इसने रेखांकित किया कि राज्यपाल द्वारा अनावश्यक विलंब या निष्क्रियता संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।
    • न्यायालय ने यह भी बल दिया कि राज्यपाल मंत्रिमंडल की सिफारिशों को अनिश्चित काल तक रोक नहीं सकता।
    • यह निर्णय कार्यकारी शक्तियों के समयबद्ध और संवैधानिक रूप से संगत प्रयोग की आवश्यकता को सुदृढ़ करता है।
  • मध्य प्रदेश विशेष पुलिस स्थापना बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2004): इस मामले में न्यायालय ने सांविधिक शक्तियों और संवैधानिक शक्तियों के मध्य भेद स्पष्ट किया।
    • निर्णय अभियोजन के लिए सांविधिक अनुमति से संबंधित था।
    • यह पाया गया कि यह अनुच्छेद-161 के अंतर्गत क्षमादान शक्तियों पर लागू नहीं होता, जो एक अलग संवैधानिक ढाँचे में कार्यरत हैं।
    • इस भेद ने सुनिश्चित किया कि सांविधिक विवेक से संबंधित उदाहरण गलत तरीके से संवैधानिक कार्यों पर लागू न हों।
  • सामूहिक न्यायिक स्थिति: इन निर्णयों से उभरती स्थिर न्यायिक स्थिति स्पष्ट है:
    • राज्यपाल स्वतंत्र कार्यकारी प्राधिकरण के रूप में कार्य नहीं कर सकता।
    • कार्यकारी शक्तियाँ, जिनमें अनुच्छेद-161 के अंतर्गत शक्तियाँ भी शामिल हैं, मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर ही प्रयोग की जानी चाहिए।
    • विवेकाधीन शक्तियाँ अत्यंत सीमित, अपवादात्मक और संकुचित हैं।
    • सहायता और सलाह का सिद्धांत बाध्यकारी है और संवैधानिक शासन के लिए केंद्रीय महत्त्व रखता है।

निर्णय का महत्त्व

  • संसदीय लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण: यह निर्णय निर्णायक रूप से संसदीय लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत की पुनः पुष्टि करता है कि वास्तविक कार्यकारी प्राधिकरण निर्वाचित मंत्रिपरिषद में निहित होता है, जबकि राज्यपाल एक संवैधानिक या नाममात्र प्रमुख के रूप में कार्य करता है।
    • यह स्पष्ट करते हुए कि अनुच्छेद-161 के अंतर्गत शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही किया जाना चाहिए, यह उस संवैधानिक संरचना को संरक्षित करता है, जिसमें शासन जनता की इच्छा के अनुरूप संचालित होता है, जो उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है।
  • लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का सुदृढ़ीकरण: यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपराधिक न्याय पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालने वाले निर्णय, जैसे क्षमा (Pardon), ऐसे निकाय द्वारा लिए जाएँ, जो विधायिका के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी हो और अंततः मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हो।
    • यह लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की शृंखला को सुदृढ़ करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि कार्यकारी क्रियाएँ पारदर्शी, जवाबदेह और सार्वजनिक परीक्षण के अधीन रहें, न कि किसी अनिर्वाचित संवैधानिक पद के भीतर संरक्षित रहें।
  • शक्तियों के मनमाने प्रयोग पर सीमा: राज्यपाल के विवेक के दायरे को सीमित करते हुए, यह निर्णय संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग में मनमाने, एकतरफा या राजनीतिक रूप से प्रेरित निर्णयों की संभावना को रोकता है।
    • यह उस सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि संवैधानिक प्राधिकरणों को निर्धारित सीमाओं के भीतर कार्य करना चाहिए, जिससे विधि का शासन, निष्पक्षता और संवैधानिक नैतिकता बनाए रखी जाती है।
  • संघीय संतुलन का संरक्षण: यह निर्णय राज्य सरकारों की स्वायत्तता की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो उनके कार्यकारी क्षेत्राधिकार में आते हैं, जैसे आपराधिक न्याय और परिहार (Remission) नीतियाँ।
    • राज्य मंत्रिमंडल की प्रधानता की पुष्टि करके, यह संघीय संरचना को सुदृढ़ करता है और यह सुनिश्चित करता है कि राज्य अपने संवैधानिक कार्यों पर सार्थक नियंत्रण बनाए रखें, अनिर्वाचित प्राधिकरणों द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप से मुक्त रहते हुए।
  • संवैधानिक संगति और विधिक निश्चितता सुनिश्चित करना: स्थापित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायशास्त्र के साथ अपनी व्याख्या को संरेखित करके, यह निर्णय संवैधानिक व्याख्या में सैद्धांतिक स्पष्टता और एकरूपता में योगदान देता है।
    • यह विरोधाभासी न्यायिक दृष्टिकोणों की संभावना को कम करता है, विधि के अनुप्रयोग में पूर्वानुमेयता को बढ़ाता है और संवैधानिक शासन की समग्र संगति को सुदृढ़ करता है।

संबंधित चुनौतियाँ

  • विवेकाधीन शक्तियों में निरंतर अस्पष्टता: न्यायिक स्पष्टीकरण के बावजूद, संविधान उन परिस्थितियों की एक संपूर्ण और स्पष्ट रूप से सीमांकित सूची प्रदान नहीं करता, जिनमें राज्यपाल स्व: विवेक का प्रयोग कर सकता है। यह सटीकता का अभाव प्रायः निम्नलिखित की ओर ले जाता है:
    • संवैधानिक प्राधिकरणों द्वारा भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ।
    • न्यायिक असंगतियाँ और आवर्ती वाद-विवाद।
    • विवेकाधीन शक्ति के व्यक्तिपरक प्रयोग की संभावना।
  • राज्यपाल–राज्य सरकार के बीच बढ़ते टकराव: हाल के वर्षों में, राज्यपालों और निर्वाचित राज्य सरकारों के बीच संस्थागत तनाव में वृद्धि देखी गई है, जो निम्नलिखित रूपों में प्रकट होती है:
    • राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित विधेयकों पर स्वीकृति देने में विलंब।
    • मंत्रिमंडल की सिफारिशों, जिसमें क्षमा (Pardon), लघुकरण (Commutation), परिहार (Remission), विराम (Respite), प्रविलंबन (Reprieve) शामिल हैं, पर दीर्घकालिक निष्क्रियता नहीं है।
    • सार्वजनिक असहमतियाँ, जो संस्थागत गरिमा और संवैधानिक सामंजस्य को कमजोर करती हैं।
    • ऐसे विकास राज्य कार्यपालिका के सुचारु संचालन पर चिंताएँ उत्पन्न करते हैं।
  • राज्यपाल के पद की राजनीतिक निष्पक्षता के संबंध में चिंताएँ: चूँकि राज्यपालों की नियुक्ति संघ कार्यपालिका द्वारा की जाती है, इसलिए निम्नलिखित के संबंध में अक्सर चिंताएँ उठाई जाती हैं:
    • राजनीतिक संरेखण या पक्षपात की धारणा।
    • संवैधानिक सिद्धांतों के बजाय केंद्रीय राजनीतिक विचारों से प्रभावित कार्यों की संभावना।
    • यह धारणा इस पद की निष्पक्षता और निरपेक्षता में सार्वजनिक विश्वास को कमजोर करने का जोखिम उत्पन्न करती है।
  • सहकारी संघवाद के लिए निहितार्थ: राज्यपालों द्वारा ऐसे कार्य, जिन्हें निर्वाचित राज्य सरकारों की सलाह के विपरीत माना जाता है, निम्नलिखित कर सकते हैं:
    • सहकारी संघवाद की भावना को कमजोर करना।
    • संघ और राज्यों के बीच अविश्वास उत्पन्न करना।
    • संवैधानिक संघर्षों और शासन अक्षमताओं में वृद्धि करना।
    • यह भारत में प्रभावी बहु-स्तरीय शासन के लिए आवश्यक सहयोगात्मक ढाँचे को कमजोर करता है।

आगे की राह

  • विवेकाधीन शक्तियों का स्पष्ट सीमांकन: राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के दायरे को स्पष्ट रूप से परिभाषित और संहिताबद्ध करने की अत्यंत आवश्यकता है, या तो:
    • संवैधानिक स्पष्टीकरण के माध्यम से, या
    • प्रामाणिक न्यायिक दिशा-निर्देशों के माध्यम से।
      • यह अस्पष्टता को कम करेगा, दुरुपयोग की संभावना को न्यूनतम करेगा और राज्यों में समान संवैधानिक प्रथा सुनिश्चित करेगा।
  • संवैधानिक परंपराओं और मानकों का सुदृढ़ीकरण: औपचारिक प्रावधानों से परे, अलिखित संवैधानिक परंपराओं को सुदृढ़ करने पर बल दिया जाना चाहिए, जिनमें शामिल हैं:
    • राज्यपाल की राजनीतिक निष्पक्षता और निरपेक्षता।
    • निर्वाचित सरकारों के लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान।
    • सामान्य कार्यकारी मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत का पालन।
    • ऐसी परंपराएँ, संवैधानिक पदों के सुचारु और गरिमामय संचालन के लिए आवश्यक हैं।
  • राज्यपाल के पद में संस्थागत सुधार: सरकारिया आयोग और पुंछी आयोग जैसे निकायों की सिफारिशों का पुनरावलोकन सुधार के लिए एक मार्गदर्शिका प्रदान कर सकता है।
    • मुख्य सुझावों में शामिल हैं:
      • परामर्शात्मक और पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रियाएँ।
      • कार्यकाल की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
      • संस्थागत उत्तरदायित्व और विश्वसनीयता को बढ़ाना।
      • ये सुधार इस पद की वैधता और प्रभावशीलता को सुदृढ़ करेंगे।
  • समयबद्ध संवैधानिक कार्यप्रणाली सुनिश्चित करना: यह आवश्यक है कि ऐसे तंत्र स्थापित किए जाएँ, या तो न्यायिक रूप से विकसित अथवा विधायी रूप से निर्धारित, ताकि सुनिश्चित किया जा सके:
    • विधेयकों पर और मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सलाह पर समयबद्ध निर्णय।
    • ऐसे विलंबों की रोकथाम, जो शासन और नीति क्रियान्वयन को बाधित करते हैं।
    • अधिक दक्षता, प्रत्युत्तरशीलता और संवैधानिक अनुशासन।
  • निर्णय-निर्माण के लिए समय-सीमा निर्धारित करना: मंत्रिपरिषद की सिफारिशों पर राज्यपाल द्वारा कार्य करने के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित करने की आवश्यकता है, ताकि विलंब या “साइलेंट वीटो” (Silent Vetoes) से बचा जा सके।
    • जैसा कि पेरारिवलन मामले में देखा गया, दीर्घकालिक निष्क्रियता असंवैधानिक है और न्याय वितरण को बाधित करती है।
    • संहिताबद्ध प्रक्रियाएँ समयबद्ध निर्णय सुनिश्चित कर सकती हैं और संवैधानिक अनुशासन को बनाए रख सकती हैं।

निष्कर्ष

यह निर्णय कार्यकारी शक्ति, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और संघीय संतुलन के संवैधानिक सिद्धांतों की दृढ़तापूर्वक पुनः पुष्टि करता है, साथ ही स्थायी अस्पष्टताओं और संस्थागत संघर्षों को भी रेखांकित करता है। राज्यपाल के पद को निर्वाचित कार्यपालिका के साथ सामंजस्य में कार्य करने के लिए स्पष्ट विधिक मानदंड, सुदृढ़ संस्थागत प्रथाएँ और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान आवश्यक है, जिससे संविधान की भावना और अखंडता को बनाए रखा जा सके।

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